The Mysterious Bell – Chapter 1351
"यही समझ नहीं आया।" कादिर ने एक पल रुककर कहा। "पर मुझे लगा वो गिन रही थी। जैसे कोई आदमी गुस्से में लोगों को गिनता है — एक, दो, तीन।"
मेरी मुट्ठी में घंटी ने उस वक़्त कुछ नहीं कहा। पर उसकी सतह पर एक हल्की गरमाहट उभरी, और फिर गायब हो गई — जैसे किसी ने दूर से हाथ उठाकर इशारा किया हो और वापस कर लिया हो।
"कादिर भाई," मीरा ने कहा, और उसकी आवाज़ रात के धुएँ जैसी थी। "मेरा मोबाइल?"
कादिर ने दरवाज़े की तरफ़ देखा।
"राठौर ने ज़ब्त किया है। दरोगा की मेज़ पर है। मैं उठा नहीं सकता।" उसने दोनों हाथ जेब में डाले। "मैं इतना कह सकता हूँ — अभी तक नहीं खोला गया। राठौर इसे देखता नहीं। उसे डर है कि भीतर क्या निकलेगा।"
"और तुम?" मीरा ने पूछा। "तुम्हें डर नहीं?"
कादिर ने उसकी तरफ़ देखा, और पहली बार उसके चेहरे पर वो चीज़ दिखी जो सिपाही के चेहरे से उस वक़्त निकलती है जब वर्दी और आदमी दोनों एक साथ थक जाते हैं।
"डर है," उसने कहा। "नहीं तो मैं चाय लेकर क्यों आता? अंकुश से दो चीज़ें पूछनी थीं — एक, उसकी माँ को कोई और हमला तो नहीं करेगा, और दो, साली-ससुर वाली बात भी है कि मुझे सात बजे उस मैदान में होना है। पर जब मैंने दरवाज़ा खोला, और तुझे इस तरह दीवार से टिका देखा — तो मेरे मुँह से सिर्फ़ 'तेरे पापा' निकला।"
वो मुड़ा और चला गया। दरवाज़ा फिर बंद हुआ, चरमराती कुंडी की आवाज़ के साथ।
मीरा उठी। उसने पानी पिया, गिलास मेज़ पर रखा, अपने बाल पीछे किए, और फिर एक बात बोली जो मुझे उससे ही उम्मीद थी, और फिर भी अजीब लगी — "अंकुश। अब जो पन्ना पापा ने लिखा है, वो गली का सबसे बड़ा सबूत है। उस पर मोहर भी पहले से है। इसे अब किसी सभा में सिर्फ़ दिखाना नहीं है — इसे कानूनी तौर पर एक सांचे में डालना है। और यह मेरे हाथ में नहीं है, क्योंकि मेरा फोन ज़ब्त है।"
"फोन ज़ब्त है, तू नहीं," मैंने कहा।
"मुझे पता है," वो बोली। "मैं हूँ। पर एक बात है, अंकुश।" उसने खिड़की की तरफ़ देखा। "अब मुझे इन दीवारों के पीछे ही नहीं, इन दीवारों के बाहर भी रहना पड़ेगा। तेरा वो सीधा प्रसारण वाला आइडिया — वो अब सिर्फ़ आइडिया नहीं है। वो मेरा एकमात्र हथियार है। और मैं उस हथियार को तेरी कुर्सी के नीचे नहीं, अपने हाथ में लूँगी।"
उसने अपनी छोटी नीली स्याही वाली कलम जेब से निकाली और मेरी तरफ़ बढ़ाई।
"तू जो बोलेगा, मैं वो लिखूँगी। फिर हम दोनों गिनेंगे।"
मैंने कलम ली। उस पर पुरानी स्याही के धब्बे थे, कई साल पुराने। मुझे उस पुराने किराने वाले काका की याद आई जिसने अपनी दुकान बेचने का काग़ज़ कभी नहीं लिखा था और दाल की बोरी के नीचे दबाए बैठा था। सच की आदत होती है — शुरू में गिरवी रखने की, फिर बोरी के नीचे दबाने की, फिर एक दिन अचानक उछलकर बाहर आने की।
"लिख," मैंने कहा। "एक — पापा का रजिस्टर, उस पन्ने पर लाल स्याही, और उस पर पहले से रणवीर की मोहर।"
उसने लिखा।
"दो — वो रजिस्टर अब दुकान के पीछे के लोहे के संदूक में नहीं है। पापा ने कहा था कि उसे हटा दिया है। मुझे नहीं पता कि उन्होंने सच कहा या झूठ। पर सभा से पहले मुझे उस संदूक तक पहुँचना है।"
"तीन?"
मैंने घंटी देखी।
"तीन — घंटी आज कुछ नहीं बोली। इसका मतलब यह नहीं कि वो ख़त्म हो गई। इसका मतलब यह हो सकता है कि आज बोलने का काम और किसी का है।"
मीरा ने सब लिखा। फिर उसने रुककर पूछा — "और जो चार हाथ?"
"पता नहीं," मैंने कहा। "पर मुझे तीन का अंदाज़ा है। मेरा, पापा का, तेरा। चौथा—"
मैं नहीं कह पाया, क्योंकि उसी वक़्त दरवाज़े की कुंडी हिली और कमरे में दुबे अंकल आए — अपनी वो नीली शर्ट, जिसे उन्होंने रिटायरमेंट के बाद भी नहीं छोड़ा, और अपने हाथ में चाय का दूसरा कप।
"अंकुश," वो बोले, और उनकी आवाज़ में वो धूप थी जो शाम को दीवार से उतरती है। "कादिर कह रहा था कि इन दोनों को आज कोई नहीं मिलने वाला था, और मुझे मिलने वाले थे। तो मैंने सोचा — चलो, एक चाय देते हैं।"
"दुबे अंकल, आप ड्यूटी पर हैं?"
"बेटा," उन्होंने कहा, और कुर्सी खींचकर बैठे, "मैं पच्चीस साल से ड्यूटी पर नहीं हूँ। मैं तेरे पापा की गवाही पर हूँ। और यह बात सिर्फ़ मेरे और उस पीपल के बीच है।"
उन्होंने चाय का कप उठाया, एक घूँट लिया, और फिर कप हवा में ही रोककर बोले — "कादिर!"
कादिर दरवाज़े के बाहर से आया।
"रिटायर हो चुके सिपाही को आधा कप तो बनता है। इतना भी नहीं मिलेगा?" दुबे अंकल ने कहा, और उनकी आवाज़ में वो हल्की शरारत थी जो किसी बूढ़े आदमी के पास ही सबसे ज़्यादा होती है।
कमरे में पहली बार हँसी हुई।
कादिर हँसा, मीरा हँसी, बबलू ने अपनी चादर सिर से हटाई और उसने भी हँसने की कोशिश की। और मैं — मैं भी हँसा, यह सोचकर कि कैसी अजीब जगह है यह भी, जहाँ रात भर की गिरफ़्तारी के बाद चाय और हँसी का भी एक हिस्सा बच जाता है।
फिर शालिनी आई।
और उसके चेहरे को देखकर हँसी दीवार से टकराकर गिर गई।
उसके हाथ में एक काग़ज़ था। छोटा, सफ़ेद, जिसके किनारे नए निकले हुए थे — जैसे किसी फाइल से अभी खींचा गया हो। उसने वो काग़ज़ मेरी तरफ़ बढ़ाया और कुछ नहीं बोली। मैंने लिया।
और पढ़ते हुए मेरी छाती में जो हुआ, वो शब्दों में नहीं आता। पर मैं कोशिश करता हूँ।
काग़ज़ पर चंद्रेश सक्सेना की सुंदर, गोल, मीठी लिखाई में साफ़-साफ़ लिखा था — कोई केस नहीं, कोई गिरफ़्तारी नहीं, कोई अदालत नहीं। अस्पताल पहले जैसा चलेगा। उस्ताद अली बक्श की दुकान बची रहेगी। घंटी भारद्वाज कंस्ट्रक्शन को सौंपी जाए। अंकुश यादव शहर छोड़कर चला जाए। हस्ताक्षर के बाद सब साफ़।
मैंने काग़ज़ मोड़ा। बिना पढ़े। बिना शालिनी की आँखों में देखे।
"अंकुश," शालिनी ने कहा। "पहले सुन ले।"
"मैंने सुन लिया।"
"वो इससे भी बड़ा काग़ज़ भेज सकता था। यह उसका सबसे नरम प्रस्ताव है। मैं वकील हूँ — मैं जानती हूँ कि कब कोई साँप ज़हर नहीं देता। जब वो ताकत दिखाने से डरता है।"
"शालिनी," मैंने कहा। "यह काग़ज़ तेरे हाथ में आया तो एक कारण से आया — ताकि तू इसे मेरे सामने रखे और मैं इसे पढ़कर सोचूँ। अगर वो मुझे डराना चाहता, तो वो बबलू भेजता, फोन करता, धमकी भेजता। उसने तुझे भेजा — शहर की सबसे साफ़ वकील को। यह काग़ज़ डराने के लिए नहीं है, यह मुझे भीतर से पिघलाने के लिए है। यह कहने के लिए कि देख, इतना साफ़ प्रस्ताव, इतना नरम — अब तो मान जा।"
"तो तू नहीं मानेगा?"
"मैं घंटी नहीं बेचूँगा," मैंने कहा। "और घंटी बेचने की बात से भी बड़ी एक बात है, शालिनी।" मैंने उसकी तरफ़ देखा। "शहर छोड़ देने की बात। यह मेरे पापा के उस अंगूठे से भी बड़ा झूठ है, जो उन्होंने डरकर लगाया था। क्योंकि झूठ सबको पता है। पर 'शहर छोड़ो' का मतलब होता है — भाग जाओ। और भागना अपनी गली को छोड़ना नहीं होता। अपनी गली को उस आदमी के हाथ में यह कहकर छोड़ना होता है कि हम हार गए।"
शालिनी ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में वो डर था जो तब होता है जब कोई वकील जानता है कि उसका मुवक्किल जीत नहीं सकता और उसे यह भी पता है कि वो अपने मुवक्किल को सच नहीं बता पाएगा।
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