The Mysterious Bell – Chapter 1346
"थाने? तू अभी-अभी वहाँ से आया है।"
"इसलिए तो," मैंने कहा। "वहाँ एक आदमी है जो सच बता सकता है।"
माँ ने एक पल मेरी आँखों में देखा। फिर उन्होंने सिर हिलाया।
"अच्छा।"
मुझे लगा वो बहस करेंगी। वो नहीं कीं। यही सबसे डरावनी बात थी।
मैंने मुड़कर बबलू को देखा।
"तू साथ चलेगा?"
बबलू ने एक पल सोचा।
"मेरी चेन ज़ब्त है। मेरा पानदान ज़ब्त है। और मैं अपने ही किए पर शर्मिंदा हूँ।" उसने अपना पेट सहलाया। "हाँ, चलूँगा।"
"अच्छा।"
"पर अंकुश—"
"क्या?"
"मैं क्या कहूँगा वहाँ?"
"तू जो सच है, वो कह।"
"सच यही है कि मैं रणवीर का हाथ था।"
"तो यही कह।"
बबलू ने अपना मुँह खोला, फिर बंद कर दिया।
मीरा ने मेरी कलाई पकड़ी।
"मैं भी चलूँगी।"
"नहीं।"
"अंकुश, मेरी मोबाइल थाने में है —"
"इसलिए तो नहीं चलेगी," मैंने कहा। "मीरा, अब तू थाने में जाएगी तो वो तुझे फिर अंदर बंद कर देंगे। और मेरे पास इतना वक़्त नहीं है कि मैं तुझे बाहर निकालता फिरूँ।"
वो रुकी।
"तो मैं क्या करूँ?"
"तू उस्ताद के पास जा। उन्हें सब बता। और हाँ — जो अंकडा दुकान में मिला है, वो अपने दिमाग़ में बिठा ले।"
"मत आना?"
"हाँ।"
मीरा ने सिर हिलाया।
मैं चल पड़ा।
थाने की सीढ़ियाँ चढ़ते वक़्त मेरे पैर भारी लग रहे थे। अजीब बात है ना — जब इंसान किसी को ढूँढने निकलता है, तो उसके पैर हल्के होने चाहिए। पर मेरे पैर भारी थे। क्योंकि मेरे दिल को पता था कि मैं जिसे ढूँढ रहा हूँ, वो मुझे नहीं चाहता।
वो कह गया है — मत आना।
थाने के कमरे में दरोगा नहीं थे। चौकी पर एक जवान बैठा था, जिसे मैंने पहले नहीं देखा। उसने मुझे देखा और अपनी कुर्सी छोड़ दी।
"तुम?"
"मुझे कादिर से मिलना है।"
"वो बाहर है।"
मैं बाहर गया। थाने के पीछे वाली गली में सीमेंट की बोरियों पर कादिर बैठा चाय पी रहा था। उसने मुझे देखा तो कप नीचे रख दिया।
"अंकुश?"
मैं उसके सामने खड़ा हो गया।
"कादिर, मुझे पूछना है।"
"पूछ।"
"कि मेरे पापा कहाँ हैं।
कादिर ने एक पल मुझे देखा। उसके हाथ में आधी पी चाय का कप था और उसने उसे धीरे से बोरी पर रख दिया, ऐसे जैसे कोई भारी चीज़ ज़मीन पर उतार रहा हो।
"अंकुश—"
"कादिर, मैं थक गया हूँ।" मैं उसके सामने ज़मीन पर बैठ गया। "दो दिन से हर आदमी मुझे आधी बात बताकर चला जाता है। तू सीधा बोल। मुझे झेलने की आदत है।"
कादिर ने चारों तरफ़ देखा। थाने के पीछे वाली गली सूनी थी, बस किसी दूर की दुकान से रेडियो की आवाज़ आ रही थी और नाली में पानी किसी चीज़ से टकराकर लगातार आवाज़ कर रहा था।
"आज दोपहर में," उसने धीमे से कहा, "एक आदमी भारद्वाज भवन गया था।"
मेरा दिल एक पल के लिए रुक गया।
"कौन?"
"पता नहीं।" उसने सिर हिलाया। "पर गेट का गार्ड जो बता रहा था, उसके मुताबिक़ — पुराना कुर्ता, झुकी कमर, हाथ में कुछ लटकता हुआ। और बाहर एक पुरानी साइकिल खड़ी थी।"
मेरे हाथ ठंडे हो गए।
"वो गार्ड उसे नहीं जानता था," कादिर ने आगे कहा। "उसने नाम पूछा। उस आदमी ने कहा — शंकर यादव। फिर गार्ड ने सूची देखी और उसे अंदर जाने दिया।"
"सूची?"
"हाँ। भवन के गेट पर एक सूची रखी होती है। जिन-जिन को आना होता है, उनके नाम पहले से लिखे होते हैं।"
मैं कुछ देर चुप बैठा रहा।
सोचो ज़रा। मेरे पापा का नाम उस सूची में पहले से लिखा था। उन्हें बुलाया गया था। वो अपनी मर्ज़ी से नहीं गए थे। उन्हें बुलाया गया था, और वो गए थे — अकेले, बिना किसी को बताए, अपनी पुरानी साइकिल पर।
"वो अंदर गए?" मैंने पूछा।
"गए। दोपहर के करीब गए थे। फिर लौटकर आए तो गार्ड ने देखा कि उनका चेहरा बदला हुआ था। वो कुछ नहीं बोले। साइकिल पर बैठे और चले गए।"
"कब?"
"करीब दो बजे के आसपास।"
मैंने अपनी कलाई देखी। चार बज चुके थे।
कादिर ने मेरी तरफ़ नहीं देखा। वो ज़मीन की तरफ़ देख रहा था, जैसे उसे भी ये सब बताने में तकलीफ़ हो रही हो।
"अंकुश—"
"क्या?"
"वो गार्ड कह रहा था कि उस आदमी के हाथ में कुछ था। इतना छोटा कि दूर से दिखता नहीं था। पर जब वो अंदर जा रहा था, तो उसकी मुट्ठी बंद थी। और जब वो बाहर आया, तो मुट्ठी खुली थी।"
मैं उठ खड़ा हुआ।
मेरी कुर्सी पीछे हटकर धूल में खिसक गई।
"अंकुश—" कादिर ने मेरी बाँह पकड़ ली।
"मुझे जाना है।"
"अभी नहीं।"
"कादिर—"
"सुन तो ले!" उसने पहली बार आवाज़ उठाई। फिर फौरन धीमी कर दी, आसपास देखा, और मुझे बोरियों पर वापस बैठा दिया। "अंकुश, तू अभी वहाँ गया तो साहब के आदमी तुझे फिर पकड़ लेंगे। तू अभी-अभी बाहर आया है। दरोगा ने तुझे काग़ज़ी रोक में रखा था, असली कारण कुछ और था — ये तू भी जानता है और मैं भी।"
"तो मैं क्या करूँ? बैठा रहूँ?"
"तू सुन तो ले पहले।"
मैं चुप हो गया।
कादिर ने आवाज़ और धीमी की।
"तेरे पापा अंदर गए। बाहर आए। अपनी साइकिल पर बैठे। और चले गए। वो वहीं नहीं रुके। वो रोए नहीं, चिल्लाए नहीं, किसी से झगड़ा नहीं किया। इतना ही नहीं, अंकुश — वो लौटकर गए हैं। अपनी मर्ज़ी से गए, और अपनी मर्ज़ी से लौटे हैं। अगर साहब ने उन्हें रोकना होता, तो रोक लेते। उन्होंने नहीं रोका। अब तू सोच — क्यों?"
मैंने सोचा। और मेरा पेट अंदर से जम गया।
"क्योंकि साहब को भी उनसे कुछ चाहिए," मैंने धीमे से कहा।
"हाँ।"
"और पापा ने उन्हें वो चीज़ दे दी या नहीं दी — ये हमें नहीं पता।"
"नहीं पता।"
मैं फिर उठा। इस बार कादिर ने मुझे नहीं रोका।
"मैं दुकान जा रहा हूँ," मैंने कहा। "अगर पापा कहीं हैं, तो वहीं होंगे।"
कादिर ने सिर हिलाया।
"मैं साथ चलता हूँ—"
"नहीं।" मैंने उसका कंधा थपथपाया। "तू यहीं रह। किसी को पता नहीं चलना चाहिए कि तूने मुझे कुछ बताया। और कादिर—"
"हाँ?"
"शुक्रिया।"
वो मुस्कुराया — वैसी मुस्कान जो हँसी नहीं होती, सिर्फ़ एक इंसान का दूसरे इंसान के लिए थोड़ा नरम पड़ जाना।
मैं थाने के सामने से निकला और गली की तरफ़ चल पड़ा।
अब सुनो, उस दोपहर भारद्वाज भवन में जो हुआ, वो मुझे शाम को काजल ने फोन पर बताया। और उस वक़्त मैं थाने की बाहर वाली बेंच पर बैठा था, हाथ में वो पीतल का टुकड़ा पकड़े जिस पर खुरचकर लिखा था — मत आना।
काजल बोल रही थी, और मैं सुन रहा था, और मुझे लग रहा था कि वो जो बता रही है, वो मेरे सामने हो रहा है।
पापा भवन पहुँचे। गेट पर गार्ड ने उन्हें रोका, नाम पूछा, सूची देखी। फिर उन्हें अंदर भेज दिया। सीढ़ियाँ — सफ़ेद पत्थर की चौड़ी सीढ़ियाँ, जिन पर हर क़दम की आवाज़ गूँजती है। दूसरी मंज़िल। दरवाज़ा खुला। रणवीर अपनी मेज़ के पीछे बैठा था, हाथ में कुछ काग़ज़ था जिस पर वो झुका हुआ था।
उसने सिर उठाया। और मुस्कुराया।
काजल ने कहा कि गार्ड ने यह भी बताया कि साहब उस दोपहर बहुत अच्छे मूड में थे। उन्होंने पापा को देखकर कहा — आइए, शंकर जी, आइए। बैठिए।
कुर्सी खींची गई। पापा नहीं बैठे।
"चाय लगवाऊँ?" रणवीर ने पूछा था। "आप मेरे पुराने मेहमान हैं, शंकर जी। आपकी चाय में चीनी कम, और अदरक ज़्यादा — है ना?"
पापा खड़े रहे।
काजल ने कहा कि पापा के हाथ में एक चाबी थी। पुरानी। बड़ी। काली लोहे की। उन्होंने उसे मेज़ पर नहीं रखा। हाथ में ही पकड़े रहे।
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