The Mysterious Bell – Chapter 1347
"मैं आपसे कुछ नहीं माँगने आया हूँ," पापा ने कहा। उनकी आवाज़ धीमी थी, पर साफ़। "मैं कुछ बताने आया हूँ।"
रणवीर ने काग़ज़ बंद किया और मेज़ पर रख दिया। वो पीछे झुके, कुर्सी पर।
"बताइए।"
"वो पन्ना।" पापा ने कहा। "जो आपने मुझसे लिया था। सात अंगूठों वाला। अस्पताल की ज़मीन वाला।"
रणवीर की मुस्कान कम नहीं हुई।
"वो पन्ना मेरे पास नहीं है," उन्होंने कहा।
"मुझे पता है।" पापा ने कहा। "पर मैं आपको बताने आया हूँ कि आज साँझ को, उस मैदान में, सबके सामने — जो अंगूठा मैंने डरकर लगाया था, वो मैं खुद बताऊँगा। किसको बताया था, कैसे बताया था, किसके डर से बताया था — सब।"
काजल ने कहा कि उस वक़्त रणवीर चुप रहा। पूरे तीन-चार सेकंड। और उन तीन-चार सेकंड में कमरे की हवा भारी हो गई।
फिर रणवीर हँसा।
"शंकर जी," उसने कहा, "आप अच्छे आदमी हैं। इमानदार। ऐसे आदमी अब कम बचे हैं।" वो आगे झुका। "पर इमानदार आदमी को एक बात पता होनी चाहिए — इमानदारी की भी एक क़ीमत होती है।"
"जानता हूँ," पापा ने कहा। "बाईस साल से चुका रहा हूँ।"
"नहीं चुकाए," रणवीर ने कहा। "बाईस साल से मैं आपको चुका रहा हूँ। सोचिए — अस्पताल का इलाज, आपकी बीवी की दवा, महीने का हिसाब। काग़ज़ पर आपका अंगूठा है, शंकर जी। और काग़ज़ पुराना होकर ख़त्म नहीं होता। वो और मज़बूत होता जाता है। समय के साथ उसकी स्याही गहरी होती जाती है।"
"तो आप उससे मुझे डराएँगे?"
"मैं आपको किसी चीज़ से नहीं डरा रहा।" रणवीर ने आवाज़ में नरमी डाली। "मैं आपको गिनकर बता रहा हूँ — इस गली में आपका घर है। आपकी बीवी बीमार है, उसका इलाज चल रहा है। आपकी बेटी नर्सिंग करती है, अगले साल उसकी परीक्षा है। आपके बेटे की दुकान का काग़ज़ आपके नाम पर नहीं है — जगदीश जी के नाम पर है, और उसके बाद… उसके बाद का क्या, ये आप जानते हैं।"
पापा चुप रहे।
"और बात सिर्फ़ आपकी नहीं है, शंकर जी।" रणवीर उठा और खिड़की की तरफ़ चला। "अगर आज शाम आप खड़े होकर सब बोल देंगे, तो मैं कुछ नहीं करूँगा — ये मैं आपको साफ़ बता रहा हूँ। पर कुछ चीजें खुद-ब-खुद हो जाती हैं। अस्पताल की छत पुरानी है। दुकान का काग़ज़ पुराना है। बेटी की परीक्षा के काग़ज़ होते हैं, और उनमें कभी-कभी गड़बड़ भी हो जाती है। आप समझदार हैं।"
फिर उसने मुड़कर देखा।
"आपकी चाय ठंडी हो रही है।"
काजल ने कहा कि पापा ने कुछ जवाब नहीं दिया।
वो उसी तरह खड़े रहे, फिर उन्होंने चारों तरफ़ देखा — कमरे में, उस आदमी की मेज़ पर, उसकी कुर्सी पर, उसकी मुस्कान पर — जैसे कोई आदमी किसी चीज़ की आख़िरी बार तौल रहा हो।
फिर उन्होंने चाबी उठाई और जेब में रख ली।
"मैं रुकूँगा नहीं," पापा ने कहा। "और रुकूँगा भी तो क्या करूँ? कुर्सी है, चाय है, और काग़ज़ है। तीनों आपकी तरफ़ हैं।"
वो मुड़े।
"पर शाम को," वो दरवाज़े पर रुककर बोले, "जब मैं उस मैदान में खड़ा होऊँगा, तो मेरे हाथ में ये तीनों नहीं होंगे। सिर्फ़ मेरी ज़ुबान होगी। और मेरी ज़ुबान ने बाईस साल में एक भी झूठ नहीं बोला — मैंने चुप रहना चुना, झूठ नहीं बोला। वो सबसे बड़ा फ़र्क़ है, साहब। आपके काग़ज़ आपके साथ रहें। मैं अपना सच अपने साथ ले जाऊँगा।"
और वो निकल गए।
रणवीर उस कमरे में अकेले रह गया, खिड़की के पास खड़ा, चाय ठंडी पड़ी रही।
काजल ने यह सब बताते हुए कहा कि यह सब उसे गार्ड ने बताया था, जो दरवाज़े के बाहर खड़ा था और जो सब सुन रहा था। गार्ड ने कहा था कि पापा बाहर आए, अपनी साइकिल पर बैठे, और चले गए — बिना पीछे देखे।
"काजल," मैंने फोन पर कहा, "पापा अब कहाँ हैं?"
काजल एक पल रुकी।
"दुकान पर आए थे," उसने कहा। "चुपचाप आए। शटर उठाया। अंदर गए। मैं भी पीछे-पीछे गई थी। वो बैठ गए, पुराने औज़ार वाले ट्रंक के पास, और ट्रंक खोला। फिर उसमें से एक रजिस्टर निकाला — पुराना, पीली जिल्द वाला — और उसे खोलकर बैठ गए।"
"क्या पढ़ रहे हैं?"
"नहीं पढ़ रहे।" काजल की आवाज़ धीमी हो गई। "लिख रहे हैं।"
"क्या लिख रहे हैं?"
"पता नहीं। पर उनका हाथ काँप रहा है, भैया। इतना काँप रहा है कि कलम काग़ज़ पर टिक नहीं रही। वो बार-बार रुकते हैं, फिर लिखते हैं, फिर रुकते हैं। और — और एक बात है—"
"क्या?"
"उस रजिस्टर के जिस पन्ने पर वो लिख रहे हैं, उसी पन्ने पर एक गोल नीली मोहर भी लगी है।"
मेरी छाती में एक ठंडी सुई सी चुभी।
"कैसी मोहर?"
"गोल। नीली। और मोहर के अंदर कुछ लिखा है, पर मैं दूर से नहीं पढ़ पाई। पर भैया —" उसकी आवाज़ टूटी, "वो मोहर भारद्वाज कंस्ट्रक्शन की मोहर जैसी दिख रही है।"
मैं चुप हो गया। कुछ देर के लिए मेरे मुँह से कोई आवाज़ नहीं निकली। मैंने सिर्फ़ अपने दिल को सुना, जो बहुत तेज़ चल रहा था — और अपनी मुट्ठी में घंटी को, जो बहुत ठंडी थी।
"भैया?" काजल ने कहा। "तू सुन रहा है?"
"सुन रहा हूँ।"
"वो क्या लिख रहे हैं? ऐसा क्या है जिसे लिखते वक़्त उनका हाथ इस तरह काँप रहा है?"
मैंने उसे बताया नहीं। मैंने कहा कि मैं आ रहा हूँ।
फोन रखते वक़्त मेरे हाथ में घंटी थी और उसकी सतह पर मेरी उँगलियों की गर्मी जमा हो रही थी। मैंने उसे धीरे से हिलाया।
आवाज़ आई — बहुत धीमी, बहुत दूर से, पर साफ़।
"अब पहला पन्ना।"
रात। अभी दोपहर थी। और घंटी कह रही थी कि यह कोई पन्ना नहीं, यह किसी हिसाब की शुरुआत है।
मैं दुकान की तरफ़ दौड़ा।
But wait, this is 443 and the outline says the ending is Kajal calling mother to say father wrote something in red ink on a page of the register with Ranveer's stamp. So the phone call should be Kajal-to-mother, not Kajal-to-Ankush. Let me adjust.
Actually, re-reading the outline:
"अंत में काजल माँ को फोन पर बताती है कि पापा ने रजिस्टर के एक पन्ने पर लाल स्याही से कुछ लिखा है और उसी पन्ने पर रणवीर की मोहर भी लगी है।"
So Kajal calls mother, and Ankush overhears or mother tells Ankush. Let me adjust.
Since the narration is from Ankush, and Kajal called mother, Ankush can be nearby hearing the call, or mother told him. Let me have Ankush be present when mother receives the call, or have mother relay it. Actually, if Ankush is at the police station and mother is with him (as per episode 442 end – mother was at the police station), then Kajal could call mother, and Ankush overhears.
Wait, but the outline of 443 says Ankush is at the police station and Kadir tells him about father. Then scene shifts to Bhardwaj Bhavan. Then back to shop: Shankar opens register, Kajal scared. Then at end, Kajal calls mother.
So I can have Ankush at the police station, and then have Kajal call mother, and mother telling Ankush, or Ankush being right next to mother when she gets the call.
Actually, in my draft above I had Kajal call Ankush. Let me change to make Kajal call mother, and Ankush is near mother or hears about it.
Let me revise. Maybe mother is with Ankush when he's out of the police station.
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