The Mysterious Bell – Chapter 1344
बाहर कुर्सी फिर चरमराई। फिर कदमों की आवाज़ आई — भारी, पर थकी हुई, जैसे कोई रात भर सोया न हो। दरवाज़े की कुंडी खुली और दरोगा ने अंदर झाँका। उनके हाथ में वही पीला लिफ़ाफ़ा था, जो मेज़ से उठाकर लाए थे।
“क्या है दुबे जी? सुबह-सुबह।”
“सुबह नहीं, दरोगा जी,” दुबे अंकल ने धीरे से कहा। “शाम हो गई है, और आपने अभी तक इस काग़ज़ पर एक लाइन नहीं लिखी।”
दरोगा अंदर आए। कमरे में जगह कम थी। माँ बेंच पर बैठी थीं, मीरा कोने में खड़ी थी, बबलू ज़मीन पर बैठा अपने घुटनों को सीने से लगाए हुए था, और मैं दरवाज़े के पास खड़ा था।
शालिनी ने अपनी काली फाइल खोली और वह काग़ज़ निकाला।
“दरोगा जी,” उसने कहा, आवाज़ बहुत सीधी, बहुत साफ़। “यह काग़ज़ आपने सुबह मेरे सामने मेज़ पर रखा था। मैंने इसे पढ़ा है। चार बातें हैं।”
दरोगा ने उसकी तरफ़ देखा, फिर लिफ़ाफ़े की तरफ़।
“पहली बात,” शालिनी ने उँगली रखी, “इस काग़ज़ पर कहीं भी अंकुश का अंगूठा नहीं है। काग़ज़ के नीचे अंगूठे की जगह बनी है, स्याही की एक गोली भी नहीं लगी।”
दरोगा ने काग़ज़ खोलकर देखा।
“दूसरी बात,” शालिनी ने कहा, “कोई गवाह नहीं है। बाईस साल पहले के काग़ज़ों पर गवाह के नाम थे, यहाँ कुछ भी नहीं। जिस काग़ज़ पर अंगूठा ही नहीं, उस पर गवाह किस बात के?”
कमरे में चुप्पी थी, पर वो चुप्पी जैसी नहीं थी — वो कुछ भारी हो रही थी, जैसे छत के पंखे के नीचे हवा भी सो गई हो।
“तीसरी बात,” शालिनी ने कहा, “इस पर तारीख़ है, और समय नहीं। कहीं भी नहीं। बयान में समय सबसे पहले लिखा जाता है, और यहाँ वो जगह खाली है, जैसे किसी ने जान-बूझकर उँगली रोक ली हो।”
दरोगा ने काग़ज़ पलटा। मैं उनके चेहरे को देख रहा था। गुस्सा आने वाला था, साफ़ दिख रहा था, आँखों के नीचे की मांसपेशी काँप रही थी।
“और चौथी बात?” उन्होंने पूछा, आवाज़ थोड़ी ऊँची।
शालिनी ने एक कदम आगे बढ़ाया। “चौथी बात यह है, दरोगा जी कि जिस दफ़्तार की मुहर इस काग़ज़ पर लगी है, वो मुहर इस काग़ज़ पर लगी नहीं। यह सादा पीला काग़ज़ है। इसे कबूलनामा कहना वैसा ही है जैसे खाली थाली को खाना कह देना।”
कमरे के बाहर किसी ने खाँसा।
मैंने दरवाज़े की तरफ़ देखा। खाकी वर्दी में वही जवान सिपाही खड़ा था — कादिर। वो अंदर नहीं आया। बस दरवाज़े की चौखट पर खड़ा रहा, हाथ पीछे बँधे, और उसकी आँखों ने एक बार दरोगा की तरफ़ देखा, फिर काग़ज़ की तरफ़, फिर बिल्कुल नीचे ज़मीन की तरफ़।
बस एक पल। एक पल भी नहीं — आधा पल।
पर दरोगा ने देख लिया। उनका हाथ जो लिफ़ाफ़े की तरफ़ बढ़ रहा था, वो रुक गया। उन्होंने कादिर की तरफ़ देखा, और कादिर ने सिर हिलाया।
न हाँ में। न ना में। बस धीरे से, जैसे कोई बोल नहीं रहा हो, बस अपनी गर्दन को सच की तरफ़ सीधा रख रहा हो।
दरोगा ने लंबी साँस ली।
“ठीक है,” वो बोले। “ठीक है।”
और उन्होंने वो काग़ज़ अपने हाथ से दराज़ में पटका। इतनी ज़ोर से पटका कि लकड़ी की आवाज़ कमरे में गूँज गई और बबलू चौंककर उठ बैठा। फिर दरोगा ने दराज़ बंद किया, चाबी घुमाई, और अपनी कुर्सी की तरफ़ मुड़े।
“दुबे जी,” वो बोले, आवाज़ अभी भी सख़्त थी।
दुबे अंकल ने अपनी नीली शर्ट के बटन सीधे किए और सामने आकर खड़े हो गए।
“मैं पूछने की जगह पर नहीं हूँ,” दुबे अंकल ने कहा, बहुत शांत। “मैं तो रिटायर आदमी हूँ, अपनी कुर्सी पर बैठता हूँ। बस इतना कह रहा हूँ — मैंने पच्चीस साल थाने में बिताए हैं। मुझे पता है, कौन सा काग़ज़ रात में बनता है और कौन सा सुबह।”
दरोगा ने उनकी नीली शर्ट देखी। उनके चेहरे का रंग थोड़ा और गहरा हुआ, और फिर, बड़ी अजीब बात हुई — उनकी आवाज़ नीची हो गई। एकदम नीची। जैसे किसी ने रेडियो का वॉल्यूम धीरे से कम कर दिया हो।
“दुबे जी,” वो बोले, “ये काम मेरे हाथ में नहीं है। मैं सिर्फ़ मुहर देखता हूँ। ऊपर से जो आता है, वो काग़ज़ पर आता है। मैं उस काग़ज़ से आगे नहीं देख सकता।”
“तो मत देखिए,” दुबे अंकल ने कहा। “पर जिस काग़ज़ में मुहर ही नहीं, उस पर अपनी मुहर मत लगाइए। यही मैं कह रहा हूँ।”
दरोगा कुछ कहते, तभी बाहर से किसी के चलने की आवाज़ आई। छोटा सिपाही अंदर आया, हाथ में एक मुड़ा काग़ज़ था, और उसके चेहरे पर वो भाव था जो लोग तब लाते हैं जब वो कोई बुरी खबर देने आ रहे हों।
“सर,” उसने कहा, “भारद्वाज भवन से फोन आया था।”
दरोगा ने काग़ज़ लिया। पढ़ा। फिर उन्होंने मेरी तरफ़ देखा।
“सुन लो,” वो बोले। “साहब का संदेश है — अंकुश यादव आज रात हस्ताक्षर कर दे, तो सुबह तक सब कुछ ठीक हो जाएगा। सब कुछ। कोई केस नहीं, कोई काग़ज़ नहीं, कोई सवाल नहीं।”
कमरा चुप हो गया।
और मुझे कुछ अजीब लगा। इतनी सी बात थी, पर मेरे भीतर कहीं एक तार खिंच गया। क्योंकि “सब कुछ ठीक हो जाएगा” — यह वाक्य सबसे बड़ा झूठ होता है, जब कोई उसे बहुत आसानी से बोल दे।
मैंने अपनी जेब में हाथ डाला। घंटी ठंडी थी। पूरी ठंडी। जैसे बोल रही हो, अब तू बोल।
मैंने दरोगा की आँखों में देखा।
“दरोगा जी,” मैंने कहा, “मैं नहीं करूँगा।”
वो रुके।
“क्या नहीं करोगे?”
“हस्ताक्षर नहीं करूँगा। न आज रात, न कल सुबह, न कभी। जो काग़ज़ मैंने लिखा ही नहीं, उस पर मैं अपना नाम क्यों डालूँ?”
“अंकुश,” दरोगा ने कहा, और उनकी आवाज़ में अब वो सख़्ती लौट रही थी, “सोच-समझकर बोलो। तुम अंदर हो। बाहर साहब हैं। और साहब का मतलब तुम जानते हो।”
“जानता हूँ,” मैंने कहा। “इसीलिए नहीं करूँगा।”
माँ ने तब पहली बार आँखें खोलीं। उन्होंने कॉपी अपनी गोद में रखी, फिर अपनी साड़ी का पल्लू सीधा किया, फिर धीरे से उठकर खड़ी हो गईं। उनकी आँखों में वो चीज़ थी जो मैंने पहले कभी नहीं देखी थी — बुखार की कमज़ोरी थी, पर उसके नीचे एकदम साफ़, एकदम चमकदार गुस्सा।
“दरोगा जी,” माँ ने कहा, “मेरा बेटा नहीं करेगा।”
“सुशीला जी—”
“और सुनिए,” माँ ने कहा, और उन्होंने अपनी पोटली खोली। उसमें टिफ़िन था। उन्होंने ढक्कन खोला, उसमें से दो रोटियाँ निकालीं, और कादिर की तरफ़ बढ़ा दीं।
कादिर एक कदम पीछे हटा।
“अंटी, मैं—”
“ले लो,” माँ ने कहा, बहुत सीधे। “तू सुबह से यहाँ खड़ा है। तेरी आँखें बता रही हैं कि तूने कुछ नहीं खाया।”
कादिर ने मेरी तरफ़ देखा, जैसे पूछ रहा हो कि ले लूँ? मैंने हल्का सा सिर हिलाया।
उसने रोटी ली। हाथ जोड़े। और तभी माँ ने कहा, “मेरे यहाँ दाल में पानी नहीं मिलता, और बात में भी नहीं। याद रखना।”
कादिर पहले रुका। फिर हँस पड़ा। एक छोटी सी हँसी, जो कमरे में गूँजी और जिससे दरोगा की भौंहें और चढ़ गईं।
“अंटी,” कादिर ने कहा, रोटी को दोनों हाथों में पकड़े हुए, “मेरी अम्मी भी यही कहती थीं। फ़र्क़ बस इतना है कि वो डाँटकर कहती थीं।”
“तो तेरी अम्मी समझदार है,” माँ ने कहा, और पोटली से एक और रोटी निकालकर मेरी तरफ़ बढ़ा दी। “तू भी खा। भूखा आदमी सोच नहीं पाता, सिर्फ़ डरता है।”
मैंने रोटी ली। भूख असल में नहीं थी, पर माँ के हाथ की रोटी से मना करना मेरे बूते में नहीं था। एक बड़ा हिस्सा तोड़कर मुँह में रखा।
और अजीब बात — उस एक कौर से मेरा दिमाग़ अचानक साफ़ हो गया। जैसे रात भर की धुंध उतर गई हो।
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