The Mysterious Bell1343 / 1504

The Mysterious Bell – Chapter 1343

7 min read November 5, 2026

"मैं जानती हूँ तू क्या सोच रहा है," वो बोलीं। "तू सोच रहा है, माँ ये बात कह रही है, तो ये बात मेरे लिए आसान है। नहीं है। मैं बाईस साल से चुप थी। तेरे पापा ने काग़ज़ पर अंगूठा लगाया और मैंने मुँह नहीं खोला। मैंने भी उस काग़ज़ में हाथ डाला था, बेटा। मैंने बस अंगूठा नहीं लगाया। हाथ डाला — यह ज़्यादा बड़ी बात है। अंगूठा तो उँगली का निशान है। हाथ पूरा शरीर होता है।"

मੈंने देखा, उनकी उँगलियाँ कॉपी की जिल्द पर सफ़ेद पड़ गई थीं।

"तो आज मैं वो हाथ वापस ले रही हूँ," उन्होंने कहा। "अब ये काग़ज़ मेरे बेटे से ये नहीं कह सकता कि शहर छोड़ दे। मेरे यहाँ दाल में पानी नहीं मिलता, और बात में भी नहीं। अगर बेटा जेल जाएगा, मैं रोज़ दोपहर का टिफ़िन लेकर आऊँगी। पर जो काग़ज़ उससे उसकी आवाज़ माँग रहा है, वो मुझसे नहीं मिलेगा।"

शालिनी ने मुँह खोला और फिर बंद कर दिया। उसकी आँखें भर आई थीं, और वो काग़ज़ की तरफ़ देख भी नहीं रही थी। वो माँ की तरफ़ देख रही थी, जैसे कोई नई चीज़ सीख रही हो।

मीरा ने धीरे से कहा, "आंटी, मैं आपको कुछ बताना चाहती हूँ—"

"तू बैठ," माँ ने कहा। "तूने भी रात भर आँख नहीं मूँदी। तेरे कैमरे की बात बाद में। पहले रोटी।"

और उन्होंने टिफ़िन खोला। उसमें रोटियाँ थीं, गोभी की सूखी सब्ज़ी, और एक छोटा डिब्बा जिसमें गुड़ रखा था। माँ ने खुद रोटी तोड़ी और मेरी तरफ़ बढ़ाई। फिर बबलू की तरफ़ झुककर एक और टुकड़ा बढ़ाया।

बबलू ने हाथ पीछे खींच लिया। "आंटी जी, मैं— मैं वो आदमी हूँ जिसने—"

"तू वो आदमी है जिसने कल रात सबके सामने सच बोला," माँ ने कहा। "मुझे वही आदमी चाहिए। बाकी आदमी तू अपने साथ ले जा।"

बबलू ने रोटी ली। और फिर वो रोया — नाटकीय नहीं, बस ऐसे, जैसे कोई बहुत दिन बाद बैठा हो। उसने रोटी मुँह में रखी और उसी तरह आँसू बहते रहे। मैंने उसकी तरफ़ देखा भी नहीं, क्योंकि देखना उस वक़्त अपमान जैसा होता। मैंने अपनी रोटी पर ध्यान दिया।

रोटी गरम थी।

माँ ने कहा था कि ठंडी हो जाएगी, पर नहीं हुई। पोटली में बँधी थी, तो गरम बची रही। यही तो माँ का हिसाब है — जिसे लाख ढक दो, वो गरम रहता है।

खाते-खाते मैंने कहा, "माँ, तूने कॉपी क्यों लाई? ये तो घर पर रहती है। किसी को पढ़ने की ज़रूरत नहीं थी।"

माँ ने रोटी का टुकड़ा रख दिया।

"क्योंकि आज सुबह मैंने इसे खोला," वो बोलीं। "तेरे पापा सच बोलकर निकले, मैंने सोचा, अब मेरी बारी। मैं बैठी, कॉपी खोली, और सोचा — जो जो मैंने लिखा है, सब पढ़ूँगी, और जो गलत है, उसे अपनी ज़ुबान से सुधारूँगी।"

उन्होंने कॉपी उठाई। पुरानी मोटी कॉपी। जिल्द फटी हुई, किनारों से पीली, और हर पन्ने पर वो घिसी हुई स्याही जो सिर्फ़ बार-बार हाथ लगने से आती है।

"पहला पन्ना," वो बोलीं। "राशन का हिसाब। मेरी लिखाई। दूसरा — टिफ़िन के ग्राहक, किसने क्या दिया, किसका क्या बाकी। मेरी लिखाई। तीसरा — सब्ज़ी, तेल, मसाला। अब भी मेरी लिखाई। भोपाल में सात को मैं हमेशा आड़ा काटती हूँ, याद है? तेरे पापा कहते थे, तेरा सात अंग्रेज़ी के सात जैसा नहीं, तिरछा आदमी जैसा दिखता है।"

मैं हँसा। "याद है।"

"तो सात को मैं आड़ा काटती हूँ। हर पन्ने पर।" उन्होंने पन्ने पलटने शुरू किए। धीरे-धीरे। पन्ना दर पन्ना। "जो मैंने लिखा है, सब पहचान लिया। पीछे वो पन्ना भी, जिस पर मैंने पाँच साल पहले लिखा था कि तेरे पापा ने अंगूठा लगाया, और उसमें मेरी भी ग़लती है। वो भी मेरी लिखाई है। मैं उसे नहीं मिटाऊँगी। वो रहेगा।"

फिर वो रुकीं।

"और फिर," उन्होंने कहा, "आख़िरी पन्ना आया।"

मैंने देखा कि उनकी उँगलियाँ उस पन्ने को छूते हुए काँप रही हैं।

"माँ—"

"मैंने ये पन्ना कभी लिखा ही नहीं।"

कमरा बिल्कुल चुप हो गया।

दुबे अंकल अब भी दरवाज़े पर खड़े थे, और उन्होंने कुंडी पर टिका हाथ हटा लिया। मीरा ने अपनी नीली स्याही वाली कलम एक पल को जेब से निकाली और फिर वापस रख दी। बबलू ने रोटी रख दी।

मैंने कॉपी माँ से ली।

वो आख़िरी पन्ना कार्ड जैसा मोटा था। बाकी पन्ने पतले थे, पीले पड़े थे — यह अपेक्षाकृत साफ़ था, जैसे बाद में जोड़ा गया हो। रेखाएँ भी मिलती नहीं थीं। माँ की कॉपी की रेखाएँ हल्की नीली थीं, और इस पन्ने पर रेखाएँ स्याह थीं, जैसे किसी और कापी से निकालकर उधर ही सिल दिया गया हो।

और उस पन्ने पर — एक नाम था।

कटा हुआ। आधा। बीच से तिरछा फाड़ा हुआ, और फिर भी वो पन्ना सिला हुआ था, जैसे किसी ने नाम को फाड़ा हो, फिर पूरा पन्ना इस कॉपी में सी दिया हो।

नाम के शुरू के दो अक्षर बचे थे — 'पू' — और अंत में एक मात्रा का हिस्सा, जो 'मा' जैसा दिखता था। बीच का सब गायब।

और नाम के नीचे, बहुत अलग लिखाई में, किसी और की कलम से, छोटी-छोटी साफ़ लकीरों में एक तारीख़ लिखी थी।

तीन शब्द थे वहाँ।

पूर्णिमा की रात।

मेरा हाथ रुक गया।

मैंने उँगली उस लिखाई पर रख दी, जैसे छूकर पता करना चाहता हूँ कि स्याही अभी गरम है या पुरानी। स्याही पुरानी थी — काग़ज़ में जमी हुई, फटी नहीं, पपड़ी नहीं। किसी ने यह लिखा था, बहुत पहले। पर पूर्णिमा — पूर्णिमा तो आज है। आज शाम सात बजे। सभा। नूर अस्पताल का खुला मैदान।

मैंने पन्ना करीब किया।

"माँ, ये लिखाई किसकी है?"

माँ ने देखा। फिर उन्होंने आँखें बंद कर लीं, जैसे किसी पुराने कमरे में घुसकर अंधेरे में हाथ टटोल रही हों।

"मालूम नहीं," वो बोलीं। "पर यह लिखाई मुझे जानी-पहचानी लगती है। और यही डर सबसे बुरा है, बेटा — जब अपनी ही चीज़ पर किसी और का हाथ पहचान लो और नाम याद न आए।"

"माँ, ये कॉपी तेरे पास कब से है?"

"तीस साल से। शादी के बाद से। ये मेरे मायके की कॉपी है — तेरे नाना के हिसाब की कॉपी, जिसे उन्होंने मुझे दिया था। मैंने उसके पहले पन्ने में अपना नाम लिखा और आगे अपना हिसाब लिखना शुरू किया। उसके बाद यह हर दिन मेरे हाथ में है। हर दिन।"

"तो कोई इसे बिना तेरे जाने खोल ही नहीं सकता," मैंने कहा।

"नहीं खोल सकता," माँ ने कहा। और उनकी आवाज़ में कुछ ऐसा आया जो मैंने पहले कभी नहीं सुना — न डर, न गुस्सा, बस एक ठंडी समझ। "इसीलिए मैं पूछ रही हूँ, बेटा। जो पन्ना मैंने कभी लिखा ही नहीं, वो मेरी कॉपी में आया कैसे?"

मैंने पन्ना पलटा। पीठ पर भी कुछ था। धुँधली पेंसिल से दो लकीरें और बीच में एक बिंदु। वही निशान। वही, जो चूल्हे के पीछे वाले दरवाज़े पर है। वही, जो घंटी के छल्ले पर है। वही, जो पीपल के कोटर में पड़ी पीतल की डिब्बी पर था।

मेरी मुट्ठी में घंटी हल्की गरम हुई।

"माँ," मैंने धीरे से कहा। "ये निशान मैं जानता हूँ।"

"तो जान ले एक और बात," माँ ने कहा, और उन्होंने कॉपी मेरे हाथ से वापस ले ली, और अपने सीने से लगा ली। "मैंने ये पन्ना नहीं लिखा। फिर ये मेरी कॉपी में किसने डाला?"

दुबे अंकल ने दरवाज़े की तरफ़ देखा। बाहर दरोगा की कुर्सी फिर चरमराई।

मैंने माँ की तरफ़ देखा — उनका सीना कॉपी से दबा हुआ था, और उनकी आँखें अब भी बंद थीं।

और मेरी मुट्ठी में घंटी ने एक शब्द कहा।

हाथ।

॥

घंटी ने “हाथ” कहा और मेरी मुट्ठी में गरमाहट रह गई। माँ की कॉपी उनके सीने से चिपकी थी, और उनकी आँखें अब भी बंद थीं, जैसे वो उस पन्ने को देखना ही नहीं चाहतीं।

दुबे अंकल ने दरवाज़े की तरफ़ से मुड़कर कहा, “दरोगा जी, एक मिनट।”

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