The Mysterious Bell – Chapter 1342
कुंडी खड़की।
मैंने सिर उठाया। दरवाज़े की लोहे की जाली में से सुबह की रोशनी छनकर आ रही थी, और उस रोशनी के बीच एक साया खड़ा था — छोटा, थोड़ा झुका हुआ, जिसके एक हाथ में पुरानी मोटी कॉपी थी।
मैं उठने को हुआ, पर घुटने जवाब दे गए।
माँ।
वो अंदर आईं। धीरे-धीरे, जैसे हर कदम पर पहले नाप ले रही हों कि ज़मीन अभी भी उनकी है या नहीं। दुबे अंकल पीछे खड़े थे और उनका हाथ माँ की कोहनी के पास हवा में था — न पकड़ा हुआ, न छोड़ा हुआ। बस हवा में टिका, जैसे कोई छड़ी पानी में टेकी जाए।
मैंने सोचा, अब आएगी डाँट। पहले शिकायत कि तूने यह क्या किया, फिर वो लंबी सूची जो हर माँ के पास होती है — तेरी उम्र क्या है, तेरे पास क्या है, तू किसके सपने देख रहा है। मैं मन ही मन तैयार हो गया। डाँट सुनने की आदत है, बचपन से है। डाँट में एक तरह का भरोसा होता है — मतलब अभी भी कोई है जो सोचता है कि मैं सुधर सकता हूँ।
पर माँ नहीं डाँटीं।
वो मेरे पास आईं, मेरे सामने खड़ी रहीं, और मेरा चेहरा देखने लगीं। बहुत देर तक। जैसे किसी पुरानी तस्वीर को पहचानने की कोशिश कर रही हों।
फिर उन्होंने अपनी साड़ी का पल्लू उठाया और मेरा चेहरा पोंछा। माथे से, आँखों के नीचे से, गाल से। मेरी दाढ़ी की कड़वाहट उस सूती कपड़े पर लग गई होगी, पर उन्होंने कुछ नहीं कहा।
"तेरे मुँह पर धूल है," वो बोलीं। "सारी रात जागा, तो मुँह धोया भी नहीं?"
"माँ, यहाँ नल नहीं है।"
"तो कहता, मैं ले आती।"
मैं हँसने की कोशिश करने लगा, पर हँसी आधी ही निकली। गला भर आया था। कमरे में बंद हवा थी, और उसमें माँ की साड़ी की गंध आ रही थी — हल्की कपूर जैसी, और उसके नीचे चूल्हे की तीखी सोंधी महक।
फिर उन्होंने अपनी कमर से एक कपड़े की पोटली खोली। छोटी सी, गाँठ लगी हुई। उसके अंदर से स्टील का टिफ़िन निकला।
"मैं कह रही थी, हाथ में टिफ़िन लेकर आऊँगी, तो ये दरोगा कहेगा — माँ रोटी लेकर आई है, भावुकता फैलाओ मत।" उन्होंने टिफ़िन मेरे हाथ में पकड़ा दिया। "तो पोटली में बाँधकर लाई। मेरी साड़ी के पल्लू में जो हो, उसे हर कोई देख नहीं सकता।"
"माँ—"
"खा।"
"पहले तू बैठ—"
"मैं बैठूँगी तो रोटी ठंडी हो जाएगी। तू खा, फिर मैं बैठूँगी।"
बबलू उसी वक़्त जागा। उसने आँखें मलीं, और जैसे ही माँ को देखा, एक झटके में औंधे पड़े से उठकर बैठ गया, जैसे किसी स्कूल में मास्टर आ गए हों।
"आंटी जी—" उसकी आवाज़ सूखी थी। "मैं—मैं यहाँ—"
"तू बैठा है," माँ ने कहा। "बस। बाकी बातें बाद में।"
मीरा भी जाग गई, और उसने एक पल में पूरा दृश्य पढ़ लिया। उसने बाल पीछे किए और चुपचाप दीवार से टिक गई। उसकी आँखें लाल थीं, पर वो कुछ नहीं बोली। मीरा जानती है कि कुछ पलों में कहने से ज़्यादा सुनने से बनता है।
तभी शालिनी ने आगे बढ़कर अपना मोबाइल मेज़ पर रखा। नहीं — उसने मोबाइल नहीं रखा, उसने एक काग़ज़ रखा। मेज़ पर, माँ के सामने, बिल्कुल बीच में।
"यह चंद्रेश ने सुबह फिर भेजा है," शालिनी ने कहा। "अदालत के काग़ज़ के नाम पर। नीचे उसका हस्ताक्षर है, ऊपर मुहर।"
मैंने काग़ज़ देखा, फिर माँ को देखा।
"पढ़ लूँ?" मैंने पूछा।
"धीरे पढ़," माँ ने कहा। "मैं सुनती जाऊँगी।"
मैंने पढ़ा। काग़ज़ में लिखा था कि अगर अंकुश यादव शहर छोड़कर अपने परिवार के साथ चला जाए, और साइकिल की घंटी उसके ओर से नियुक्त व्यक्ति को सौंप दे, तो नूर अस्पताल की ज़मीन का मुकदमा वापस, अस्पताल पहले की तरह चलेगा, और साइकिल गली में उस्ताद अली बक्श की दुकान भी अपनी रहेगी। कोई केस नहीं। कोई जेल नहीं। कोई पीछा नहीं। बस नीचे जगह पर एक हस्ताक्षर।
मैंने पढ़ना बंद किया और काग़ज़ मेज़ पर वापस रख दिया।
"अच्छी पेशकश है," मैंने कहा। "देख माँ, ईमानदार लोग अब भी मिलते हैं। पहले ये अंगूठा माँगते थे, अब सिर्फ़ हस्ताक्षर माँग रहे हैं। मतलब सुधर रहे हैं। धीरे-धीरे लिखना-पढ़ना आ जाएगा।"
"अंकुश—" शालिनी ने धीमे से कहा।
"और एक बात," मैंने कहा, और मुट्ठी में पकड़ी घंटी मेज़ पर रख दी — हल्की सी खड़की, पीतल की रूखी आवाज़। "यह चीज़ मेरी जेब की नहीं है। मैं इसका रखवाला हूँ, ऐसा मुझे लगता था। पर आज सुबह लग रहा है, मैं इसका कुछ भी नहीं। यह पूरी गली की आवाज़ है। इसे मैंने न साधा, न खरीदा। इसे बेचने वालों में मैं नहीं हूँ, माँ। चाहे वो काग़ज़ हो या कोई और।"
माँ ने काग़ज़ उठाया।
उनकी आँखें कमज़ोर हैं। मुझे पता है। साल भर में फ़ासला कम होता जा रहा है — पहले दूर से पढ़ती थीं, अब काग़ज़ आँखों के पास ले जाती हैं। उन्होंने सफ़ेद धोती से आँखें पोंछीं, फिर काग़ज़ अपनी आँखों से एक हाथ पीछे किया, और उँगली उस पर रखकर हर लाइन पढ़ने लगीं।
खड़ी थीं। मैंने उन्हें बैठने का इशारा किया, पर वो नहीं बैठीं।
वो पहली बारी में सब पढ़ गईं, फिर दूसरी बार पढ़ीं। फिर काग़ज़ मेज़ पर उलटा रख दिया, जैसे उन्हें उसका मुँह नहीं देखना हो।
कमरा चुप हो गया।
दुबे अंकल दरवाज़े पर खड़े थे, और उनका हाथ अब भी कुंडी पर था। बाहर से दरोगा की आवाज़ आई — "बहुत हो गया, दुबे जी। आधा घंटा। उससे ज़्यादा नहीं।"
दुबे अंकल ने दरवाज़ा पूरा खोला और बाहर मुँह करके बोले, "दरोगा साहब, बात काग़ज़ की हो रही है। माँ ने बेटे को पहली बार अंगूठा नहीं, हस्ताक्षर दिखाए हैं। इतना तो करवा लो कि वो थोड़ी देर बैठ सके। बैठेगी तो दो बातें साफ़ होंगी, साफ़ हुईं तो तुम्हारा रजिस्टर भी मोटा होगा।"
दरोगा कुछ बड़बड़ाया। फिर कुर्सी घसीटने की आवाज़ आई, और दुबे अंकल ने कमरे के कोने से एक लकड़ी की पुरानी स्टूल माँ के पीछे रख दी।
"बैठ जाओ, बहन जी," उन्होंने कहा। "वर्दी नहीं पहनी है आज, पर कुर्सी थाने की है। इस कुर्सी पर बैठकर आदमी सच बोलता है। कम से कम आधा।"
माँ बैठीं।
और जब वो बैठीं, तब मुझे अचानक दिखा कि वो कितनी थकी हैं। माँ के चेहरे पर थकान कभी इतनी साफ़ नहीं दिखती थी। वो औरत हमेशा चलती रहती है — सुबह पाँच बजे चूल्हा, फिर टिफ़िन भरना, फिर ढक्कन गिनना, फिर हिसाब लिखना। उनके हाथ कभी खाली नहीं होते। और आज उनके हाथ में सिर्फ़ एक कॉपी थी।
"मैं सुन रही हूँ," उन्होंने कहा। "अब बोल। तू क्या करेगा?"
"माँ—"
"सीधा जवाब दे। ये काग़ज़ लेगा?"
"नहीं।"
"क्यों?"
"क्योंकि यह काग़ज़ मुझसे माँग नहीं रहा। यह मेरी माँ से माँग रहा है, मेरे पापा से माँग रहा है, उस्ताद से माँग रहा है, और सबसे बड़ी बात — यह उस गली से माँग रहा है, जिसने मुझे पाला। जो चीज़ एक आदमी की जेब में होती है, वो बेची जा सकती है। जो चीज़ पूरी गली की साँस में होती है, उसे कोई अकेला आदमी बेच कैसे सकता है? मेरे पास उसका काग़ज़ नहीं है, माँ।"
माँ ने सिर हिलाया। बहुत धीरे।
फिर उन्होंने वो किया जो मुझे उम्मीद नहीं थी। उन्होंने कॉपी उठाई और उसे अपने सीने से लगा लिया, जैसे बच्चा हो।
"सुन ले," वो बोलीं। आवाज़ न उँची थी, न धीमी। साफ़ थी, जैसे सुबह की दाल छानने वाली आवाज़। "मेरा बेटा कैद में रह सकता है। ईमान में नहीं रह सकता।"
मैंने कुछ कहना चाहा, पर घूँट गले में रुक गई।
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