The Mysterious Bell – Chapter 1341
जेब में हाथ डाला।
घंटी ठंडी थी।
वो ठंडी इस तरह थी जैसे गरम पानी में डालकर रखी हो और फिर बहुत देर हो गई हो। मैंने उसे हथेली पर निकाला। अंधेरे में उसका पीतल कुछ नहीं दिख रहा था, बस उसका वज़न महसूस हो रहा था। मैंने उसे उँगलियों में घुमाया। कहीं से कोई आवाज़ नहीं आई।
मैंने मन में गिना — कितना हुआ होगा? दस बजे? ग्यारह?
तभी मुझे पापा का काग़ज़ याद आया जो सिपाही के जाने के बाद पापा ने मेरी जेब में डाल दिया था। मैंने उसे निकाला — रोटी वाला काग़ज़ नहीं, वो अलग था, वो पतला, जिस पर उन्होंने पेंसिल से लिखा था। मैंने उसे खिड़की की रोशनी में आँख के बहुत पास ले जाकर पढ़ा।
मैं कल सुबह तेरे सामने सच बोलूँगा।
मैंने उसे सीने से लगा दिया।
उसी वक़्त मुझे याद आया — मंच पर, उनके हाथ, वो काँपती उँगलियाँ। वो कह रहे थे कि मैं छिपा नहीं रहा, डर रहा था। और मैंने क्या किया था? मैंने आधी बात सुनी और आधी में अपनी नाराज़गी ओढ़ ली, जैसे सर्दी में मोटा कंबल ओढ़ लेते हैं और फिर किसी की आवाज़ नहीं सुनते।
मैंने घंटी को हथेली पर रखकर धीरे से कहा, "घंटी।"
कुछ नहीं।
"कल क्या होगा?"
हथेली पर पीतल हिला। बहुत हल्का, जैसे किसी ने नींद में करवट बदली हो। और फिर आवाज़ आई — इतनी धीमी कि मुझे लगा मैंने खुद सोचा है।
"कल सूरज तेरे बिना भी निकलेगा। पर सच तेरे बिना नहीं बोलेगा।"
मैंने आँखें बंद कर लीं।
"और अगर मैं यहीं रह गया?"
"तो भी।" घंटी ने कहा। "गली है न।"
मैं मुस्कुराया। ऐसा मुस्कुराया जैसे कोई थका आदमी मज़ाक सुनकर मुस्कुराता है — ज़्यादा खुशी नहीं, बस यह बता रहा हो कि सुन लिया।
तभी बाहर आवाज़ आई।
पहले तो मुझे लगा कि वो किसी ट्रक का हॉर्न है, या थाने के बाहर का कोई रेडियो। पर आवाज़ लंबी थी, और धातु जैसी थी। मैं खिड़की के पास गया। मेरी उँगलियाँ लोहे की जाली पर फिसलीं।
लाउडस्पीकर था।
गली के मुँह पर कहीं बड़ा लाउडस्पीकर लगाया गया था, जिससे आवाज़ सारे मोहल्ले में गूँज रही थी, और आवाज़ वही थी। वही आवाज़ जो हमेशा शहर के किसी न किसी कोने से समाजसेवा का भाषण देती है। वही मिठास, वही लय, वही धीरज।
रात की हवा में आवाज़ फैलती गई —
"नूर अस्पताल के मैदान में कल शाम सात बजे सभा होगी। ये सभा मैं बुला रहा हूँ। मैं रणवीर भारद्वाज, आपका सेवक। मैंने अपना सारा हिसाब आपके सामने खोलकर रखा है। पर वो सभा — वो सभा एक बात कम होकर होगी।"
आवाज़ एक पल रुकी। उस रुकावट में मुझे पता चल गया कि अगली लाइन मेरे लिए है।
"अंकुश यादव की कुर्सी वहाँ खाली रहेगी," आवाज़ आई। "क्योंकि वो आज रात कानून के सवालों में उलझा हुआ है। मुझे उससे बैर नहीं है। मुझे यही लगता है कि वो बहके हुए बच्चे की तरह है। पर जब सच को कोई न माने, तो सच भी खड़ा नहीं होता। कल शाम सात बजे आप सब आइए। कुर्सी खाली रहे, कोई बात नहीं। गली खाली नहीं होनी चाहिए।"
आवाज़ कट गई। और फिर वही दो धुनें, जो हर भाषण के बाद बजती हैं, और फिर खामोशी।
मैं खिड़की से सटा खड़ा रहा।
मेरी मुट्ठी भींच गई। नाखून हथेली में धँसे और उसमें घंटी थी, जिसका किनारा मेरी उँगली में लगा।
"खाली रहेगी," मैंने खिड़की से बाहर, अंधेरे से कहा, और अपनी आवाज़ भी नीची रखी ताकि मीरा न जागे। "कुर्सी खाली रहेगी, पर गली नहीं।"
मैंने घंटी को माथे से लगाया।
मुझे लगा था उस पर ठंडक मिलेगी। मगर अचानक वो गरम हो गई। एक बार में इतनी गरम कि मेरे माथे के रोंगटे खड़े हो गए और मेरा हाथ झटके से दूर चला गया।
मैंने उसे हथेली पर वापस रखा, और उसे देखता रहा।
और फिर घंटी ने वो कहा जो मैंने कभी नहीं सुना था। इतनी साफ़, इतनी धीमी, इतनी ठंडी कि जैसे कोई बहुत पुराना आदमी बैठकर अपना हिसाब समझा रहा हो।
"कल तेरे पास एक चीज़ होगी जो रणवीर के पास नहीं है," उसने कहा। "और वो चीज़ कोई जादू नहीं। तेरा पापा होगा।"
मैंने घंटी को हथेली में बंद कर लिया।
कमरे में सबसे तेज़ आवाज़ मेरी साँस थी।
और मेरी आँखें खुली की खुली रह गईं।
मैंने घंटी कान के पास ले जाकर फिर सुनी। वही आख़िरी लाइन, वही धीमापन, जैसे कोई पुराना टेप बार-बार घूम रहा हो।
कल तेरे पास वो चीज़ होगी जो रणवीर के पास नहीं है।
मैंने आँखें बंद कर लीं।
पापा। मंच पर खड़े, उँगलियाँ काँपती हुई, और वो कह रहे थे — मैं छिपा नहीं रहा, डर रहा था। मैंने आधी बात सुनी और आधी पर अपनी नाराज़गी ओढ़ ली। नाराज़गी भी क्या चीज़ है — एक मोटा कंबल, जिसमें बैठकर हम सुनना बंद कर देते हैं और फिर कहते हैं, ठंड हमारी गलती नहीं।
बबलू नींद में कुछ बड़बड़ाया। मीरा ने बिना जागे उसका सिर सहला दिया। और मैं दीवार से टिका बैठा रहा, आँखें लोहे की जाली पर, घंटी मुट्ठी में।
सुबह की पहली किरण जाली से फिसलकर मेरे घुटनों पर गिरी। उसी वक़्त कुंडी खड़की।
दुबे अंकल अंदर आए — हाथ में चाय के दो कुल्हड़, और नीली शर्ट, जिसके सितारे धोते-धोते फीके पड़ गए थे।
"उठ, सोया हुआ हीरो।"
"अंकल, ये वर्दी?" मैंने कहा।
"रिटायर हो गया हूँ, बेटा।" उन्होंने एक कुल्हड़ मेरी तरफ़ बढ़ाया। "पर वर्दी पहनता हूँ। ताकि ये थानेदार मुझसे उल्टा सवाल न पूछे। बिना वर्दी के आदमी से हर कोई पूछता है — तुम कौन हो? वर्दी देखकर सवाल पूछने की हिम्मत नहीं होती।"
मैं हँस पड़ा। चाय गले से उतरी और लगा कि रात की कोई गाँठ सीने से खुल गई।
"शालिनी बाहर खड़ी है," उन्होंने आवाज़ नीची करके कहा। "सुबह से। दो बार आई, दो बार लौट गई। कहती है, तेरे चेहरे पर वो नहीं देखना चाहती जो अभी है।"
"कौन सा?"
"जो हार मान लेता है।"
इतने में दरवाज़े पर शालिनी खुद खड़ी थी। हाथ में मोबाइल, आँखों में वो थकान जो रातभर जागने से आती है।
"चंद्रेश ने मुझे शहर से बाहर भेज दिया," वो अंदर आकर बोली। "कहा, किसी काम से जाना है। पर वो मुझे इस कमरे से दूर रखना चाहता था। उसने फ़ोन से नया काग़ज़ भेजा है। इस बार अदालत के लिए तैयार है।"
उसने मोबाइल मेरी तरफ़ सरका दिया।
मैंने पढ़ा। शहर छोड़ने का। घंटी सौंपने का। और बदले में अस्पताल तथा उस्ताद की दुकान बचाने का। नीचे साफ़ लिखा था — कोई केस नहीं, कोई जेल नहीं, बस एक हस्ताक्षर।
"अच्छा है," मैंने कहा और हँस दिया। "कम से कम इस बार झूठ पर अंगूठा नहीं, हस्ताक्षर माँग रहे हैं। तरक्की है।"
"अंकुश —"
"शालिनी, घंटी मेरी जेब में है, इस काग़ज़ में नहीं। और जो चीज़ जेब में है, उसे काग़ज़ नहीं ले जा सकता।"
"मना करेगा तो जमानत अदालत जाएगी। शाम तक सभा शुरू हो जाएगी। तू अंदर रहेगा, और रणवीर मंच पर।"
"तो शाम होने दो," मैंने कहा। "कुर्सी खाली हो सकती है। हाथ खाली नहीं रहेंगे।"
शालिनी कुछ कहने को मुँह खोला, फिर चुप कर गई। वो उठी, दरवाज़े तक गई, और कुंडी पर हाथ रखकर रुक गई।
फिर वो लौटकर आई। मेरे पास झुकी और इतनी धीरे बोली, जैसे खुद भी उस बात से डर रही हो।
"अंकुश, तेरी माँ बाहर खड़ी है।"
मैं उठने लगा।
"रुक। पहले सुन ले।" उसकी आवाज़ दबी थी। "उसके हाथ में टिफ़िन नहीं है। पुरानी हिसाब कॉपी है।"
मेरी मुट्ठी में घंटी एक बार ठंडी हुई, जैसे किसी ने बहुत दूर से अपनी बात याद दिला दी हो।
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