The Mysterious Bell – Chapter 1339
"अंकुश," मीरा ने धीरे से कहा।
"कुछ नहीं होगा," मैंने कहा। "तू बैठ। बबलू के साथ रह।"
"अगर तू डेढ़ घंटे में न आए," मीरा ने कहा, "तो मैं खिड़की तोड़कर बाहर जाऊँगी।"
"उसकी ज़रूरत नहीं पड़ेगी," मैंने कहा।
"मैंने ये तय कर लिया है," उसने कहा। "तय करने के लिए तेरी इजाज़त नहीं चाहिए।"
मैं होंठ दबाकर मुस्कुरा दिया।
दरवाज़े की तरफ़ बढ़ा। बबलू ने मेरा हाथ पकड़ लिया। उसकी पकड़ सख़्त थी।
"अंकुश," उसने कहा। "वो काग़ज़ नहीं छोड़ना।"
"कौन सा?"
"जो पापा की लिखाई वाला है," उसने कहा। "मुझे पता है ऐसे काग़ज़ क्या करते हैं। मैंने तीस साल ऐसे काग़ज़ उठाए हैं। वो अगर तेरे पास से निकल गया, तो बाद में पछताएगा।"
"नहीं निकलेगा," मैंने कहा। "जेब में है।"
उसने हाथ छोड़ दिया।
गलियारा छोटा था। छत नीची थी। दीवारों पर सफ़ेदी उखड़ रही थी और उसके नीचे पुरानी नीली परत दिख रही थी — जैसे किसी ज़माने में ये पूरा थाना नीला रहा हो। फ़र्श पर पानी की एक लकीर थी जो किसी के पैरों से बनी थी, और ऊपर लटकते बल्ब की लाइट में ये लकीर तेज़ दिख रही थी।
सिपाही मेरे आगे-आगे चल रहा था। उसकी चप्पल चटक रही थी। मैं उसके पीछे था।
गलियारे के आख़िर में एक मोड़ था। उस मोड़ पर सिपाही अचानक रुका।
मैं भी रुक गया।
वो पलटा। उसने इधर-उधर देखा, जैसे यक़ीन कर रहा हो कि इस गलियारे में हम दो ही हैं।
फिर उसने एक कदम मेरे पास आकर, आवाज़ बहुत धीमी करके, लगभग फुसफुसाकर कहा —
"सुन।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा। उसकी आँखें मेरी आँखों पर थीं, और उनमें वो चीज़ थी जो डर नहीं थी। वो चीज़ शर्म थी।
"थानेदार तुमसे एक काग़ज़ पर अंगूठा चाहता है," उसने कहा।
मेरा पेट कड़ा हो गया।
"कौन सा काग़ज़?"
उसने होंठ भींचे। गलियारे के मोड़ से हवा आ रही थी, जिसमें पुरानी स्याही और गीली दीवार की गंध थी।
"वो काग़ज़ झूठा है," उसने कहा।
कुछ देर वो कुछ नहीं बोला। मैंने भी कुछ नहीं पूछा। मैंने बस उसकी तरफ़ देखा और इंतज़ार किया।
"मैंने उसे पढ़ा नहीं," उसने कहा। "पर जब किसी काग़ज़ पर थानेदार खुद अंगूठा माँगे और अंगूठे की स्याही खुद लाए, तो वो काग़ज़ सच नहीं होता। सच वाले काग़ज़ पर स्याही दफ़्तर से आती है।"
"तुम मुझे ये क्यों बता रहे हो?" मैंने पूछा।
उसने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में कुछ ऐसा था जैसे वो खुद से भी लड़ रहा हो।
"क्योंकि मेरी बहन की शादी है," उसने कहा। "और मैं इस नौकरी से उसे अच्छे घर में नहीं दे रहा। मैं सिर्फ़ उसे अपने घर में से जाने से रोक रहा हूँ।"
मैं चुप रहा।
"और एक बात," उसने कहा। "बाहर लोग बैठे हैं। सुबह से। कुछ औरतें हैं, कुछ बूढ़े। वो सब कुछ नहीं बोल रहे। बस बैठे हैं। थानेदार ने कहा है कि कोई अंदर नहीं जाएगा।"
"कौन बैठे हैं?" मैंने पूछा।
"मुझे नाम नहीं पता," उसने कहा। "पर एक औरत बार-बार तेरा नाम ले रही है। और एक बूढ़ा है, जो चुप बैठा है और अपने हाथों को देख रहा है।"
मेरा दिल ज़ोर से धड़का।
"वो बूढ़ा कैसा दिखता है?" मैंने पूछा।
"पतला," उसने कहा। "चश्मा टेप से बँधा है। नीली शर्ट।"
मैंने आँखें बंद कर लीं।
पापा।
"और वो औरत?" मैंने धीरे से पूछा।
"सफ़ेद बाल," उसने कहा। "काली ओढ़नी। हाथ में लाठी। और गले में पीतल की कोई चीज़ लटकी है, जो बजती है।"
मेरे रोंगटे खड़े हो गए।
"कौशल्या," मैंने धीरे से कहा।
सिपाही ने मेरी तरफ़ देखा।
"तुम उसे जानते हो?"
"नहीं," मैंने कहा। "पर आज के बाद जानूँगा।"
सिपाही ने गलियारे के मोड़ की तरफ़ देखा, जहाँ से दरोगा की खाँसने की आवाज़ आ रही थी।
"तो सुन," उसने जल्दी से कहा। "मैं तुम्हें रोक नहीं सकता। मैं तुम्हें ये भी नहीं बता सकता कि उस काग़ज़ में क्या लिखा है। पर इतना बता सकता हूँ — अगर तुमने आज अंगूठा लगा दिया, तो कल सुबह जो भी सभा होगी, उसमें तुम्हारा नाम भारद्वाज कंस्ट्रक्शन के काग़ज़ों में लिखा जाएगा।"
"मैं अंगूठा नहीं लगाऊँगा," मैंने कहा।
"थानेदार इसी पर खेल रहा है," उसने कहा। "वो जानता है कि तुम अंगूठा नहीं लगाओगे। उसे यही चाहिए। उसे तुम्हारा इनकार चाहिए।"
मैं रुक गया।
"मतलब?"
"मतलब ये," उसने कहा, "कि अगर तुम अंगूठा नहीं लगाओगे, तो वो कहेगा कि तुमने सहयोग नहीं किया। और फिर वो सुबह तक तुम्हें यहीं रखवा देगा। और सुबह तुम्हारी सभा तुम्हारे बिना हो जाएगी।"
मेरा मुँह सूख गया।
वो सही कह रहा था। यही तो रणवीर ने कहा था — कि पूर्णिमा वाली सभा अब तेरे बिना होगी।
मैंने सिपाही की तरफ़ देखा।
"तुम्हारा नाम क्या है?" मैंने पूछा।
वो कुछ देर चुप रहा। फिर उसने धीरे से कहा, "राठौर मेरे साथ वाले का नाम है। मेरा नहीं।"
"तुम्हारा?"
"मुझे अभी नहीं बताना," उसने कहा। "जिस दिन तुम्हारी सभा में सब अपना सच बोलेंगे, उस दिन मैं भी बोलूँगा।"
"तुम्हारा सच क्या है?"
उसने मेरी तरफ़ देखा। इस बार उसकी आँखों में शर्म नहीं थी। सिर्फ़ थकान थी। वो थकान जो आदमी के चेहरे पर बरसों में बैठती है, जब वो रोज़ ऐसी नौकरी करके घर लौटता है जिससे वो खुद शर्मिंदा हो।
"मेरा सच ये है," उसने कहा, "कि मैंने अपनी नौकरी से ज़्यादा अपनी वर्दी की इज्ज़त बचाई है। और मेरी वर्दी कभी ईमानदार नहीं रही।"
फिर वो सीधा खड़ा हो गया और आवाज़ सामान्य कर ली।
"थानेदार जी," उसने ऊँची आवाज़ में कहा, "लाया हूँ।"
गलियारे के मोड़ से आवाज़ आई, "भेज दे अंदर।"
सिपाही ने मेरी तरफ़ देखा और आँखों से इशारा किया।
मैं उसके साथ आगे बढ़ा।
और जैसे ही मैं उस मोड़ से मुड़ा, मुझे जेब में घंटी महसूस हुई। वो गरम थी। बहुत गरम नहीं। बस इतनी कि मेरी जाँघ को सहला रही हो।
और बहुत धीमे, इतने धीमे कि मैंने किसी को बताया नहीं, उसने कहा —
"अब सबके सामने सच बोलना।"
मैंने आँखें ऊपर कीं। छत पर एक बल्ब लटक रहा था, जिसमें रोशनी बहुत कम थी। अंदर दरोगा की मेज़ पर पीला लिफ़ाफ़ा रखा था, और उसके बगल में स्याही की डिब्बी, और एक काग़ज़ जिसका ऊपर का कोना मुड़ा हुआ था।
दरोगा ने मेरी तरफ़ देखा और सिर हिलाया।
"आ जाओ, बेटा," उसने कहा। "बैठ जाओ।"
मैं बैठ गया।
और मेरी जेब में, पापा की पर्ची के ऊपर, घंटी ठंडी होती गई।
जैसे उसने अपना काम कर दिया हो।
बाहर गलियारे के उस पार, मुझे लगा, कोई चुप बैठा है। कोई लाठी के सहारे। कोई चश्मे को टेप से ठीक कर रहा है।
और कोई तीसरे आदमी के जूते सीढ़ी पर चुपचाप रख रहा है।
मैंने काग़ज़ की तरफ़ देखा।
और मैंने पहली बार तय किया कि आज मैं अकेले नहीं उठूँगा।
॥
दरोगा की मेज़ पर लटकता बल्ब धीरे-धीरे हिल रहा था, जैसे हवा भी अंदर आने से डर रही हो। उसकी रोशनी पीली और कमज़ोर थी, इतनी कि मेज़ पर रखा पीला लिफ़ाफ़ा सफ़ेद दिखने लगे। मैं कुर्सी पर बैठा था, और कुर्सी का एक पाया छोटा था, इसलिए बैठते ही वो चरमराई — जैसे कोई बूढ़ा आदमी उठने से पहले कराहता है।
दरोगा ने अपनी कुर्सी खींची और बैठ गया। उसने चश्मा नहीं पहना था, इसलिए उसकी आँखें छोटी दिख रही थीं। सामने मेज़ पर स्याही की डिब्बी खुली थी, और उसके ढक्कन पर स्याही की एक पुरानी परत जमी थी, जो किसी ने बरसों से नहीं पोंछी थी।
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