The Mysterious Bell – Chapter 1338
उसने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखें छोटी थीं, मोटे चेहरे पर पसीना था, होंठ फटे हुए थे।
"तुम्हारे साथ," उसने कहा।
मैंने कुछ नहीं कहा। मैंने सिर्फ़ हाथ बढ़ाया।
उसने पहले मेरे हाथ की तरफ़ देखा, फिर मेरी तरफ़, फिर अपने हाथ की तरफ़ — जैसे यक़ीन कर रहा हो कि ये हाथ अब भी उसके ही हैं।
फिर उसने हाथ बढ़ाया।
उसकी हथेली मेरी हथेली पर रखी। गरम थी। पसीने से भीगी हुई थी। और काँप रही थी।
मैंने उसे कसकर पकड़ा।
"अब सुन," मैंने कहा। "कल सुबह जब हम बाहर जाएँगे, तो तेरे ऊपर सबसे ज़्यादा सवाल होंगे। लोग कहेंगे कि ये वही है जो हमें डराता था। कोई तेरे मुँह पर थूकेगा। कोई पत्थर मारेगा। कोई कहेगा कि बबलू पांडे अब नाटक कर रहा है।"
"मुझे पता है," उसने कहा।
"तो फिर भी खड़ा रहेगा?"
उसने कुछ देर सोचा। फिर उसने वो कहा जो मैंने उससे कभी सोचा नहीं था।
"अंकुश," उसने कहा, "मेरी बीवी कहती है कि मैं बदल गया हूँ। मैंने उसे कभी यक़ीन नहीं दिलाया। अब मैं उसे गली के सामने खड़ाकर ये नहीं दिखाना चाहता कि मैं बदल गया हूँ। मैं उसे गली के सामने खड़ाकर ये दिखाना चाहता हूँ कि मैं अब भी डरता हूँ, पर अब डरकर किसी को नहीं डराता।"
मीरा ने धीरे से कहा, "ये काफ़ी है।"
बबलू ने उसकी तरफ़ देखा।
"काफ़ी क्या?"
"ये काफ़ी है," मीरा ने कहा। "सच बोलने के लिए बहादुर होना ज़रूरी नहीं। ईमानदार होना ज़रूरी है।"
बाहर चौक की घड़ी ने दो बार आवाज़ की। दूर कहीं एक कुत्ता भौंका, फिर चुप हो गया। कमरे के बाहर गलियारे में किसी के चप्पल की आवाज़ आई, फिर रुक गई।
मैंने घंटी जेब में रखी। फिर मीरा की तरफ़ देखा।
"तेरे पास अभी क्या है?" मैंने पूछा।
"नीली स्याही वाली कलम," उसने कहा। "रमा मैडम वाला पुराना काग़ज़, जो मैंने आज तक किसी को नहीं दिखाया। और बबलू का लाया टाइप किया हुआ काग़ज़।"
"काग़ज़ कल सभा में पढ़ेगी?"
"नहीं," उसने कहा। "काग़ज़ नहीं पढ़ूँगी। मैं खड़ी होकर कहूँगी कि पाँच साल पहले मैंने रमा मैडम के घर को एक आधी खबर से तोड़ा था। मुझे मालूम था कि खबर आधी है। फिर भी मैंने छाप दी, क्योंकि मुझे डर था कि कोई और छाप देगा।"
"और बाद में?"
"बाद में मैंने उस काग़ज़ को कभी नहीं निकाला," उसने कहा। "मैंने उसे फाइल में दबा दिया और खुद को ये समझा दिया कि मैं अब अच्छी पत्रकार हूँ। अच्छी पत्रकार नहीं थी मैं। मैं बस तेज़ थी। तेज़ होना और सच्चा होना, दो अलग चीज़ें हैं।"
"ये सभा में बोलेगी?"
"हाँ।"
"रमा मैडम के सामने?"
वो रुकी। उसने होंठ भींचे। फिर उसने कहा, "उनके सामने। वो आएँगी तो सही।"
"अगर न आएँ?"
"तो भी बोलूँगी," उसने कहा। "माफ़ी माँगने के लिए सामने वाले का होना ज़रूरी नहीं होता। होना तो अच्छा होता है। पर ज़रूरी नहीं।"
मैंने सिर हिलाया।
"अब तेरी बारी," मीरा ने कहा। "तू सभा में क्या बोलेगा?"
मैंने सोचा। देर तक सोचा।
"मैं ये बोलूँगा," मैंने कहा, "कि मैंने घंटी को जादू समझा था। और मैं ये बोलूँगा कि जब मैंने घंटी को जादू समझना बंद किया, तब समझ आया कि ये सिर्फ़ एक आवाज़ है जो मुझे याद दिलाती है कि मैं इंसान हूँ। और इंसान का काम ये नहीं कि वो अकेले सब ठीक करे। इंसान का काम ये है कि वो दूसरों के साथ बैठे।"
बबलू ने धीरे से कहा, "ये बात सभा में कहेगा?"
"हाँ।"
"तो फिर तेरी दादा की घंटी का क्या होगा? लोग कहेंगे कि ये तो सिर्फ़ घंटी है।"
"लोग कहेंगे," मैंने कहा। "और मैं उन्हें रोकने नहीं जाऊँगा। क्योंकि जब तक लोग कह रहे हैं, तब तक वो सुन रहे हैं। और जो सुन रहा है, उसके दिल में एक दरवाज़ा खुला है।"
कुछ देर हम तीनों चुप बैठे रहे।
फिर मैंने कहा, "एक बात और।"
"क्या?"
"कल किसी को भी घंटी को हाथ में लेकर नहीं खड़ा होना है। न मैं, न तू, न बबलू, न टिंकू। घंटी चुप रहेगी। उस दिन सिर्फ़ लोगों की आवाज़ चलेगी।"
"क्यों?" बबलू ने पूछा।
"क्योंकि जिस दिन गली अपना सच खुद बोलेगी, उस दिन उसे किसी पीतल के टुकड़े की ज़रूरत नहीं पड़ेगी," मैंने कहा। "और अगर उसे ज़रूरत पड़ी भी, तो वो अंदर से आएगी। बाहर से नहीं।"
घंटी जेब में धीरे से हिली। जैसे किसी ने सिर हिलाया हो।
मीरा ने कहा, "अब सो जा।"
"तू सो," मैंने कहा।
"नहीं," उसने कहा, "आज मैं जागूँगी। और सुन।"
"क्या?"
उसने अपना थैला उठाया, उसमें से एक छोटा काग़ज़ निकाला, और मेरी तरफ़ बढ़ा दिया।
"ये क्या है?"
"रमा मैडम के पास रखा मेरा लिखा काग़ज़," उसने कहा। "पाँच साल पुराना। इसे मैंने आज तक किसी को नहीं दिया। अब तेरे पास रख रही हूँ।"
"क्यों?"
"क्योंकि अगर कल मुझे कुछ हो जाए," उसने कहा, "तो ये काग़ज़ किसी के पास तो होना चाहिए। और मैं नहीं चाहती कि मेरा सच मेरे साथ मरे।"
मैंने काग़ज़ लिया। हल्का था। मुड़ा हुआ। कोने से फटा हुआ।
"इसे नहीं पढ़ूँगा," मैंने कहा।
"पढ़ लेना," उसने कहा। "कल सुबह पढ़ लेना।"
मैंने उसे जेब में रखा — उसी जेब में जहाँ पापा की पर्ची थी और घंटी थी।
फिर मैं दीवार से टेक लगाकर बैठ गया, और ऊपर बल्ब को देखता रहा।
बबलू कुछ देर में दीवार के सहारे झुक गया और उसकी साँस धीमी पड़ गई। नींद आ गई थी। उसके होंठ हिल रहे थे, जैसे नींद में भी कुछ कह रहा हो।
मीरा बेंच पर बैठी थी, घुटने सीने से लगाए, और दीवार पर एक जगह देख रही थी।
मैंने पापा की पर्ची फिर निकाली और उसके अक्षरों को देखता रहा।
मैं कल सुबह तेरे सामने सच बोलूँगा।
मुझे लगा कि ये सिर्फ़ पापा का वादा नहीं है। ये मेरा भी वादा बन चुका है। कल सुबह मुझे भी कुछ बोलना है। कोई एक बात। और वो बात ये है कि मैं अब तक डरकर चल रहा था, और अब मैं डर के साथ चलूँगा। साथ में। डर को पीछे नहीं छोड़ूँगा। क्योंकि जो डर को पीछे छोड़ता है, डर उसके घर में घुस जाता है। जो डर को साथ लेकर चलता है, डर रास्ते में थक जाता है।
मैंने आँखें बंद कर लीं।
कुछ देर बाद मुझे लगा जैसे मैं सो गया हूँ, पर सोया नहीं था। बस बीच में एक अंधेरा आया और फिर मैंने खुद को उसी दीवार के सहारे बैठा पाया, और बल्ब अब भी गुनगुना रहा था।
और फिर दरवाज़े की कुंडी बाहर से खुली।
आवाज़ छोटी थी। धातु की, धीमी। पर उस रात की चुप्पी में वो आवाज़ ऐसी लगी जैसे किसी ने कान के पास बजा दी हो।
मीरा ने सिर उठाया। बबलू की आँख खुल गई और वो दीवार से सटकर बैठ गया।
दरवाज़ा आधा खुला। बाहर गलियारे की पीली रोशनी आई और उस रोशनी में एक सिपाही खड़ा था। वही जवान सिपाही, पतला, जो शाम को थाने में कुर्सी पर बैठा था।
उसके हाथ में कोई काग़ज़ नहीं था। बस चाबी थी, जिसे वो उँगली पर घुमा रहा था।
उसने अंदर नहीं देखा। उसने सिर्फ़ आवाज़ दी।
"अंकुश यादव।"
मैं खड़ा हो गया।
"हाँ।"
"थानेदार बुला रहे हैं," उसने कहा। "बयान के लिए।"
"अभी?"
"अभी।"
मीरा उठ खड़ी हुई।
"मैं साथ चलूँगी," उसने कहा।
"नहीं," सिपाही ने कहा। "सिर्फ़ ये।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा। उसका चेहरा रोशनी से बाहर था, सिर्फ़ गर्दन और कंधे दिख रहे थे। उसकी उम्र ज़्यादा नहीं थी। पर जिस तरह वो खड़ा था, उससे लग रहा था कि वो खुद भी इस बात से खुश नहीं है कि वो यहाँ खड़ा है।
मैंने घंटी जेब में ठीक से रखी। पापा की पर्ची भी। मीरा का काग़ज़ भी।
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