The Mysterious Bell – Chapter 1336
“ये रख,” मैंने कहा। “ये उसकी सोच का सबसे साफ़ सबूत है। वो डर को बाँटता नहीं, खरीदता है।”
मीरा ने काग़ज़ लिया और अपनी जेब में रखा।
“दूसरा काम?” उसने पूछा।
“दूसरा— सुबह पापा जब सच बोलें, तो उनके पास कोई होना चाहिए जो उनका हाथ पकड़ सके। मैं रहूँगा। पर माँ को भी आना चाहिए।”
“माँ को?”
“हाँ,” मैंने कहा। “क्योंकि अगर पापा का सच माँ के बारे में है, तो माँ को वहीं होना चाहिए। सच जब बोला जाए, तो जिसके बारे में है, वो सामने होना चाहिए। वरना वो सच नहीं, शोर होता है।”
मीरा ने सिर हिलाया।
“और तीसरा?”
मैंने घंटी उठाई और उसे बल्ब के नीचे लाया।
“तीसरा ये,” मैंने कहा, “कि मुझे उस औरत का नाम पता करना है। जिसने घंटी लौटाई। और अगर नाम मेरी कॉपी में नहीं है, तो मैं उसे माँ की कॉपी में ढूँढूँगा। और अगर वहाँ भी नहीं है, तो पापा के उस सच में ढूँढूँगा जो वो कल सुबह बोलेंगे।”
घंटी धीरे से बजी।
एक बार। छोटी आवाज़।
और फिर उसने कहा—
“नाम अंदर है।”
“कहाँ अंदर?”
“जहाँ तू अब तक नहीं गया।”
बबलू ने धीरे से कहा, “अंकुश।”
“हाँ।”
“तेरी बातें सुनकर मुझे लग रहा है कि… कि मैंने इतने साल बेकार जिया।”
“नहीं,” मैंने कहा। “पर तूने इतने साल बेकार बिताए ज़रूर हैं। फ़र्क़ है दोनों में।”
उसने सिर झुका लिया।
“अब सो जा,” मैंने कहा। “सुबह लंबी है।”
“यहाँ कैसे सोऊँ?” उसने पूछा।
“बेंच पर लेट जा,” मैंने कहा। “मैं दीवार से टेक लगाकर बैठूँगा।”
“तू सो जा,” मीरा ने कहा। “मैं जागूँगी।”
“नहीं,” मैंने कहा। “मैं जागूँगा। तू सो जा। तुझे सुबह गली में जाना है, हर घर से एक लाइन लेनी है।”
मीरा ने कुछ कहना चाहा, फिर रुक गई। फिर वो बेंच के दूसरे सिरे पर बैठ गई और घुटनों पर सिर रख लिया।
बबलू दीवार के सहारे बैठा रहा।
मैंने घंटी जेब में रखी। मैंने वो काग़ज़ जेब में रखा जिस पर पापा की लिखाई थी — “मैं कल सुबह तेरे सामने सच बोलूँगा।”
मैंने रोटी पर से काग़ज़ हटाया। रोटी अब ठंडी हो रही थी। मैंने मीरा की तरफ़ बढ़ाया।
“ले,” मैंने कहा।
“तेरी है।”
“सबकी है,” मैंने कहा। “पापा ने जान-बूझकर दो रोटियाँ भेजी हैं। तीन लोग हैं।”
मीरा ने मुस्कुराकर आधी रोटी अपने हिस्से की ली। बबलू ने दूसरी आधी ली।
मैंने अपनी रोटी छोड़ दी।
“तू खा,” मीरा ने कहा।
“मैंने माँ से वादा किया था,” मैंने कहा, “कि रोटी उनके हाथ की खाऊँगा।”
“अंकुश।”
“कुछ नहीं,” मैंने कहा। “मैं ठीक हूँ।”
और मैं ठीक नहीं था।
पर उस कमरे में, उस बल्ब के नीचे, उन तीन लोगों के बीच मुझे पहली बार लगा कि अकेलापन अब उतना डरावना नहीं है। कोई साथ है। कोई बोल रहा है। कोई बबलू भी साथ है, जो चार घंटे पहले तक मेरा दुश्मन था। कोई मीरा है, जिसने अपना सबसे बड़ा दाग़ खुद खोलने का वादा किया। कोई पापा है, जो कल सुबह अपनी शर्म ओढ़कर खड़े होंगे।
और कहीं न कहीं, किसी और कोने में, कोई औरत है जो मुझे जानती है और जिसे मैं नहीं जानता।
मैंने दीवार पर सिर टिकाया।
बाहर चौक की घड़ी ने एक बार घंटा बजाया। फिर सिर्फ़ रात बची।
मैंने आँखें बंद कीं।
और घंटी जेब में धीरे से बोली—
“अब चार हाथ। चारों जाग रहे हैं।”
॥
रोटी का काग़ज़ मेरे हाथ में था। पतला, मैला, कोनों से मुड़ा हुआ। जिस काग़ज़ पर माँ ने रोटियाँ लपेटकर भेजी थीं, उसी की पीठ पर पापा ने कुछ लिखा था। पेंसिल से। छोटे अक्षरों में, ऐसे अक्षर जो लिखते वक़्त काँप रहे थे।
मैं कल सुबह तेरे सामने सच बोलूँगा।
मैंने उसे देर तक देखा। फिर पलटा। फिर देखा। काग़ज़ उसी तरह था। कुछ नहीं बदला। न कोई शब्द जुड़ा, न कोई मिटा। पर मुझे लगा जैसे वो काग़ज़ मेरे हाथ में नहीं, मेरे सीने पर रखा है।
बल्ब ऊपर गुनगुनाता रहा। कमरे में पीली रोशनी की एक परत जमी थी जिसमें दीवार पर मक्खियों की छोटी-छोटी परछाईं नाच रही थीं। कमरे में सीलन की गंध थी, पुरानी चटाई की गंध थी, और उस पर अचानक किसी ने चाय पी रखी थी, जिसकी महक धीरे-धीरे मर रही थी।
बबलू दीवार के सहारे बैठा था। उसकी आँखें खुली थीं, पर वो कहीं और देख रहा था। उसकी उँगलियाँ गोद में पड़ी थीं और आपस में उलझी हुई थीं, जैसे अलग-अलग सोच रही हों।
मीरा बेंच के दूसरे सिरे पर घुटनों पर सिर रखे बैठी थी। मुझे लगा सो गई है। फिर उसने धीरे से कहा, बिना सिर उठाए —
"तू सोया नहीं?"
"नहीं।"
"क्यों?"
"सोच रहा हूँ।"
"क्या?"
मैंने काग़ज़ सामने रख दिया।
"ये सोच रहा हूँ कि पापा ने ये रोटी के नीचे क्यों रखा। ऊपर क्यों नहीं?"
मीरा ने सिर उठाया।
"क्यों?"
"क्योंकि ऊपर रखते तो सिपाही पहले पढ़ लेता," मैंने कहा। "नीचे रखा, ताकि रोटी खोलने वाला पढ़े।"
"तो पापा जानते थे कि रोटी तुझ तक पहुँचेगी?" मीरा ने पूछा।
"पापा ये भी जानते हैं कि मैं भूखा रहूँगा," मैंने कहा। "इसीलिए रोटी भेजी। और ये भी जानते हैं कि मैं रोटी खाने से पहले काग़ज़ पढ़ूँगा।"
मीरा ने धीरे से कहा, "तेरे घर में सब लोग एक-दूसरे को इतना पढ़ते कैसे हैं?"
"पढ़ते नहीं हैं," मैंने कहा। "डरते हैं। और जब आदमी घर के लोगों से डरता है, तो वो उन्हें शब्द से ज़्यादा पढ़ने लगता है।"
बबलू ने पहली बार बीच में आकर कहा, "ये सच है।"
हम दोनों ने उसकी तरफ़ देखा।
"मैं अपनी बीवी के हाथ की चाय पीता था," बबलू ने कहा, "और जानता था कि आज चाय में शक्कर कम है। इसका मतलब आज कहीं पैसा फँसा है। कभी पूछा नहीं। बस पी लेता था।"
"क्यों नहीं पूछा?" मीरा ने पूछा।
"क्योंकि पूछने पर जवाब आता," बबलू ने कहा। "और जवाब का सामना करना पड़ता।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा। आँखों में दम नहीं था, पर थकान नहीं थी। डर था। वही डर, जो अब भी उसकी हड्डियों में बैठा था।
मैंने काग़ज़ मोड़कर जेब में डाला और पीछे दीवार से टेक लगा ली।
"पापा ने एक बार कहा था," मैंने धीरे से कहा, "कि डर विरासत में नहीं आता।"
"मतलब?" मीरा ने पूछा।
"मतलब ये कि डर बाप-दादा से नहीं मिलता," मैंने कहा। "डर घटना से आता है। कोई चीज़ होती है, और उसके बाद तेरे अंदर एक कोना बन जाता है जो उस चीज़ से हमेशा डरता है। फिर तू वही डर अपने बेटे में डाल देता है — इस डर से कि कहीं वो भी वही गलती न करे। और बेटा वो गलती नहीं करता, पर डर ज़रूर पकड़ लेता है।"
बबलू ने धीरे से कहा, "मेरे अब्बा ने मुझे कभी ये नहीं बताया कि हम गरीब क्यों हैं। बस ये बताया कि जो है, उसी में खुश रहो।"
"और तूने क्या किया?" मैंने पूछा।
"मैंने सोचा, अगर खुश रहने से पेट नहीं भरता, तो डरकर पेट भरूँगा," बबलू ने कहा। "और मैंने किसी को नहीं डराया। मैं तो खुद हर सुबह डरकर उठता था। लोगों को डराता था, क्योंकि डर सबसे सस्ता हथियार है। इसमें खर्चा नहीं होता।"
मीरा ने कहा, "और सबसे महँगा भी। क्योंकि बाद में इसका हिसाब सिर्फ़ तू भरता है।"
बबलू ने सिर नीचे कर लिया।
मैंने घंटी जेब से निकाली और हाथ में रखी। वो ठंडी थी, पर बर्फ़ जैसी नहीं। जैसे किसी ने उसे कुछ देर पहले छुआ हो और छोड़ दिया हो।
"सुनो," मैंने कहा। "कल पूर्णिमा की सभा है।"
"हाँ," मीरा ने कहा।
"ये सभा घंटी का तमाशा नहीं होगी," मैंने कहा। "मैं नहीं जाने वाला वहाँ घंटी लेकर खड़ा होने। मैं नहीं जाने वाला कोई करामात दिखाने।"
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