The Mysterious Bell1333 / 1504

The Mysterious Bell – Chapter 1333

7 min read November 5, 2026

"कि कुछ काम दूसरों के हाथ में देने पड़ते हैं," मैंने कहा। "अगर मैं अंदर हूँ, तो बाहर का काम मेरा नहीं है। बाहर का काम टिंकू का है। शबनम आपा का है। शालिनी का है। और तेरा है।"

मीरा ने मेरी तरफ़ देखा।

"तो मैं क्या करूँ?"

"तू मेरी कॉपी का नाम पढ़," मैंने कहा। "उसमें गली के सब नाम हैं। जो नाम मैंने लिखे हैं, वो काग़ज़ पर नहीं, उनके घरों में लिखे गए हैं। तू जब बाहर जाए, तो हर घर से एक लाइन लेकर आ। एक ही लाइन। सच की।"

"और अगर कोई न बोले?"

"तो उसका नाम भी लिख लेना," मैंने कहा। "कि ये नहीं बोला। सभा में जब नाम पुकारा जाएगा, तो सबको पता होगा कि कौन खड़ा हुआ और कौन नहीं।"

वो एक पल चुप रही।

"अंकुश," उसने कहा।

"हाँ।"

"तूने कभी सोचा है," उसने कहा, "कि उस औरत ने घंटी क्यों लौटाई?"

मैंने सोचा।

"नहीं," मैंने कहा।

"मैंने सोचा है," उसने कहा। "तीन रात से सोच रही हूँ। और मुझे लगता है वो औरत आज भी गली में है।"

मेरा शरीर ठंडा हुआ।

"क्यों?"

"क्योंकि," मीरा ने कहा, "उस औरत ने घंटी लौटाते वक़्त पापा को नहीं बताया कि घंटी क्या है। उसने सिर्फ़ लौटाई। अगर वो कहीं और से आई होती, तो वो जानती होती कि घंटी क्या करती है। पर उसने सिर्फ़ लौटाई। जैसे कोई चीज़ उधार ली हो और ब्याज़ के डर से लौटा दी हो।"

मैंने उसकी तरफ़ देखा।

"तू कह रही है कि वो हमारे बीच से है?"

"मैं कह रही हूँ," उसने कहा, "कि उसका नाम हमारी कॉपी में पहले से लिखा हो सकता है। और हमने उसे कभी नहीं पढ़ा।"

बाहर चौक में कुर्सी हिली।

मैंने खिड़की से झाँका।

दरोगा कमरे से बाहर आए थे और चौक में खड़े थे। रणवीर उनके पीछे था। दरोगा ने अपनी छड़ी उठाई और हमारे कमरे की तरफ़ चल पड़े।

मैं बेंच पर बैठ गया। मीरा मेरे बगल में।

दरवाज़े की जाली के पीछे दरोगा का चेहरा आया। पीला, थका, पर आँखें तेज़। वो एक पल मुझे देखता रहा, फिर मीरा को, फिर उसने अपनी छड़ी जाली पर टिका दी और धीरे से कहा —

"सुबह तक कोई नहीं मिलेगा।"

वो रुका।

"और कल पूर्णिमा है।" उसने एक बार रणवीर की तरफ़ देखा और फिर मेरी तरफ़। "सभा तो होगी।"

वो मुड़कर चल दिए।

मैंने अपनी जेब में घंटी दबाई, और घंटी ने पहली बार उस रात कुछ कहा। बहुत धीमे। इतना धीमे कि मुझे लगा मैंने सुना नहीं, गुनगुनाया है।

"होने दो।"

॥

“होने दो।”

तीन शब्द जेब में ऐसे बैठ गए जैसे गीली मिट्टी में पत्थर धँसता है। मैंने उँगलियों से घंटी को दबाया। ठंडी थी। नाम बोलने की ज़िद करती घंटी अब चुप थी, जैसे थक कर सो गई हो।

दरोगा की छड़ी की आवाज़ दूर होती गई। पहले वो चौक के पत्थरों पर टक-टक करती रही, फिर बरामदे में लिपट गई, और फिर सिर्फ़ बल्ब बचा।

पुराना बल्ब अब भी गुनगुना रहा था। उसकी पीली रोशनी में कमरे की धूल हवा में तैरती दिख रही थी, जैसे कोई पुराना काग़ज़ पानी में घुल गया हो और उसके अक्षर अब भी हवा में लिखे जा रहे हों।

मैं बेंच पर बैठा था। लोहे की बेंच। ऊपर से चिकनी, नीचे से ठंडी। पीछे कमरे की दीवार पर पुराने रजिस्टरों की गंध थी और फ़र्श पर मिट्टी के तेल की महक, जैसे यहाँ कभी कोई ट्रंक खोलकर रखता हो और भूल जाता हो।

मीरा मेरे बगल में थी। उसने घुटने सीने से लगाए थे और ठुड्डी उन पर टिकी थी। आँखें खुली थीं। खाली नहीं। कुछ गिन रही थी, मैं जानता था। वही जो वो हमेशा गिनती है — नाम, तारीख़ें, दरवाज़े, और कौन कब झूठ बोला।

मैंने कहा, “सुन।”

वो मेरी तरफ़ मुड़ी।

“मैंने तुझे कुछ कहा था,” मैंने कहा। “बाहर जाकर हर घर से एक लाइन ले आ।”

“याद है।”

“और तेरा फ़ोन राठौर ने ले लिया।”

“लिया तो,” उसने कहा। “पर वो मेरा फ़ोन नहीं, मेरी कमाई थी। और वो भी काग़ज़ पर लिख दी।”

मैं हँस पड़ा। हँसी फूटी कमरे की चुप्पी में, बल्ब के नीचे, और उसके साथ ही साथ मुझे लगा कि यहाँ हँसना गुनाह है। पर थाने में गुनाह का हिसाब होता है। अंदर वाला हिसाब किसी के पास नहीं होता।

तभी बाहर दरवाज़े की कुंडी खुली।

मैंने सिर उठाया।

जाली के पीछे एक सिपाही की शक्ल आई। वो वही लंबा राठौर नहीं था। ये छोटा था, गोल चेहरे वाला, और उसकी आँखें जैसे इस काम से पहले ही थक चुकी थीं। उसने दरवाज़ा थोड़ा खोला और बिना कुछ कहे अंदर एक आदमी को धकेला।

वो आदमी लड़खड़ाकर अंदर आया, दीवार से टकराया और वहीं बैठ गया। सिपाही ने दरवाज़ा फिर बंद किया, कुंडी चढ़ाई और चला गया।

बबलू।

वो दीवार से चिपककर बैठा था। सफ़ेद कुर्ता अब सफ़ेद नहीं था। गले में सोने की चेन नहीं थी, पानदान नहीं था, मोटी उँगलियों से वो अब अपनी ही हथेली दबा रहा था। और उसके हाथ काँप रहे थे।

सच में काँप रहे थे। मैंने ऐसे काँपते हाथ पहले कभी नहीं देखे थे — किसी की पीठ में डर होता है, पैरों में थकान होती है, पर हाथ तभी काँपते हैं जब आदमी के अंदर कुछ ऐसा हो जो उसको अब भी पीछे से पकड़े हुए हो।

मीरा ने मेरी तरफ़ देखा। मैंने आँख से कहा — अभी चुप।

हम तीनों चुप बैठे रहे।

बाहर चौक में किसी ने किसी से कुछ कहा, फिर दो पैरों की आवाज़ गई, फिर कुत्ता भौंका — एक बार, लंबा, जैसे नींद में। फिर थाने का रजिस्टर खुलने की आवाज़ आई, पन्ना पलटा, और कलम की चरमराहट।

और फिर वो रात जैसे पूरी तरह थाने के अंदर आ गई।

बबलू ने पहले अपना गला साफ़ किया। फिर उसने घुटने सीधे किए और घुटनों पर हाथ रखे। हाथ अब भी काँप रहे थे, और वो उन्हें जाँघों से दबाकर रोकने की कोशिश कर रहा था।

“अंकुश।”

मैं चुप रहा।

“अंकुश, सुन।”

“सुन रहा हूँ,” मैंने कहा।

वो कुछ देर मेरी तरफ़ देखता रहा। फिर उसने नज़र फ़र्श पर डाल दी, जैसे वहाँ किसी और से बात कर रहा हो।

“मैंने,” उसने कहा, और उसकी आवाज़ फँसी हुई थी, “मैंने दो महीने पहले वो बक्सा खुला देखा था।”

कमरे की हवा एक पल रुक गई।

मैंने पीठ सीधी की।

“कौन सा बक्सा,” मैंने पूछा, हालाँकि मुझे पता था।

“वही,” उसने कहा। “बिजलीघर का। आख़िरी वाला। छठा।”

मीरा ने घुटने ज़मीन पर रखे और बबलू की तरफ़ झुकी।

“सब बता,” उसने कहा। “शुरू से।”

बबलू ने एक लंबी साँस ली। उस साँस में उसका पूरा शरीर हिला।

“उस रात साहब ने मुझे कहा था कि बिजलीघर के पास जाकर देख आ कि फाटक पर कोई आदमी खड़ा तो नहीं है। बस इतना। और मैं गया। रात लगभग दस बजे की बात है। अंधेरा था। मैंने सोचा, देख आऊँगा, आ जाऊँगा, कुछ नहीं है तो साहब को बता दूँगा।”

“और तूने क्या देखा?” मैंने पूछा।

“मैं फाटक तक पहुँचा,” उसने कहा, “और फाटक अंदर से ज़रा खुला था। मैंने सोचा, अंदर जाऊँ। पैर रखते ही मुझे रोशनी दिखी। पीली नहीं। हरी जैसी। पर हरी भी नहीं। ऐसी जैसे पुराने काँच में से जलती अगरबत्ती देखो।”

वो रुका। उसने अपनी हथेली देखी, जैसे उसमें कुछ चिपका रह गया हो।

“और साहब?” मीरा ने पूछा।

“साहब वहीं थे,” बबलू ने कहा। “बक्से के सामने खड़े। हाथ जोड़े हुए नहीं। बस खड़े। और बात कर रहे थे।”

“किससे?” मैंने पूछा।

वो चुप हो गया।

“बबलू,” मैंने कहा। “किससे?”

“उसके सामने कोई नहीं था,” उसने कहा।

मैंने मीरा की तरफ़ देखा। मीरा ने मेरी तरफ़।

“मतलब?” मैंने पूछा।

“मतलब यह कि बक्सा खुला था,” बबलू ने कहा, और उसकी आवाज़ धीमी हो गई, “और साहब उस खुले बक्से से बात कर रहे थे। जैसे कोई अपने भाई से बात करता है। जैसे कोई अपने बाप से। जैसे कोई अपने आप से।”

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