The Mysterious Bell – Chapter 1332
थाने के सामने, जहाँ पच्चीस साल से वो नीली शर्ट में बैठते थे, वहाँ सिर्फ़ एक पुरानी ईंट पड़ी थी, जो उन्होंने कुर्सी के पैर के नीचे रखी थी, ताकि कुर्सी हिले नहीं।
कुर्सी नहीं थी, ईंट थी।
मेरे अंदर कुछ ठंडा हुआ।
और फिर मैंने पीपल की तरफ़ देखा।
पेड़ के पीछे, चार छोटे साये खड़े थे। एक साये के हाथ में कुछ था, जो कार्डबोर्ड जैसा दिख रहा था। टिंकू। उसने मेरी तरफ़ देखा और हाथ उठाया। नहीं, हाथ नहीं। उसने वो कार्डबोर्ड माइक उठाया, जिस पर उसने खुद पेंसिल से लिखा था — जोड़ स्कूल।
और उसने अपना मुँह खोला, बिना आवाज़ के, बहुत साफ़ होंठ हिलाकर कहा — "उस्ताद।"
मैंने सिर हिलाया।
सिर्फ़ एक बार।
मीरा ने भी देखा।
"बच्चे," उसने धीरे से कहा।
"हाँ," मैंने कहा। "मेरी कॉपी टिंकू के पास है।"
"कौन सी कॉपी?"
"वो जिसमें मैंने हिसाब लिखा था," मैंने कहा। "गली की कॉपी। अगर मैं कल सुबह तक न निकलूँ, तो वो कॉपी आगे जानी चाहिए।"
मीरा ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखें तेज़ थीं।
"तू निकलेगा," उसने कहा।
"अगर नहीं निकला—"
"तो भी," उसने कहा। "तो भी। तूने मुझे बताया था कि सभा के लिए उस औरत का नाम चाहिए। वो नाम मैं ढूँढूँगी। अगर तू अंदर है, तो मैं बाहर हूँ। ये तेरी सभा नहीं, गली की सभा है।"
जीप थाने के सामने रुकी।
ब्रेक लगते ही मैंने एक बार पीछे मुड़कर गली को देखा। गली जैसे साँस रोककर खड़ी थी। मुझे लगा अगर मैं कान लगाकर सुनूँ, तो सुनाई देगा कि दीवारें भी मेरा नाम ले रही हैं।
राठौर ने दरवाज़ा खोला।
"उतरो।"
हम उतरे।
थाने का चौक पीली ट्यूबलाइट में नहा रहा था। वही ट्यूबलाइट, जो हमेशा सिर्फ़ एक कोने तक पहुँचती है और बाकी कोने अंधेरे में छोड़ देती है। दीवार पर पुराना कैलेंडर टँगा था, जिसका आख़िरी पन्ना किसी ने नहीं पलटा। किसी को फ़र्क़ ही नहीं पड़ता कि महीना कौन सा है, जब हर महीना यहीं का हो।
पापा को एक तरफ़ बैठाया गया। बबलू को दूसरी तरफ़। और हमें — मुझे और मीरा को — एक छोटे कमरे में धकेल दिया गया।
वो जगह छोटी थी। मैंने दो कदम में एक दीवार से दूसरी दीवार तक पहुँच गया। एक लोहे की बेंच थी, जिसका रंग उतर चुका था और जिस पर पुरानी चित्रकारी थी — कोई नाम, कोई तारीख़, कोई दिल। एक बल्ब था, जो गुनगुनाता था, जैसे बूढ़ा आदमी अपने आप से बातें कर रहा हो। और एक खिड़की थी, जिस पर मोटी जाली थी और जिससे चौक का आधा हिस्सा दिखता था।
कमरे में एक पुरानी रजिस्टर की गंध थी। और उसके नीचे, हल्की सी, मिट्टी के तेल की गंध, जैसे यहाँ कभी लालटेन जलती रही हो।
दरवाज़ा बंद हुआ। ज़ंजीर खिंची। ताला लगा।
राठौर का चेहरा जाली के पीछे आया।
"सुबह तक कोई नहीं मिलेगा," वो बोला।
"किससे?" मैंने पूछा।
वो कुछ नहीं बोला।
"किससे नहीं मिलेगा?" मैंने फिर पूछा। "माँ से? उस्ताद से? शालिनी से? उस औरत से जिसका नाम हम ढूँढ रहे हैं?"
राठौर ने मुझे देखा, और मुझे लगा वो कुछ कहेगा। पर उसने कुछ नहीं कहा। वो हट गया।
मैं बेंच पर बैठ गया।
मीरा खिड़की के पास गई और जाली पकड़कर झाँकने लगी।
"अंकुश," उसने धीरे से कहा।
"हाँ।"
"इधर आ।"
मैं गया।
खिड़की से चौक दिखता था, और चौक के उस पार, थाने के अंदर वाला कमरा, जिसका दरवाज़ा खुला था और जिसमें रोशनी थी।
वहाँ रणवीर खड़ा था।
वो हँस नहीं रहा था। हँसने से ज़्यादा बुरा होता है जब कोई मुस्कुरा रहा हो। वो मुस्कुरा रहा था। उसका सफ़ेद कुर्ता रोशनी में चमक रहा था और उसके हाथ जुड़े थे। हाथ जुड़े हुए, जैसे हर तस्वीर में होते हैं। जैसे वो किसी के आगे खड़ा हो, माफ़ी माँग रहा हो।
वो दरोगा के सामने खड़ा था।
दरोगा की कुर्सी उस चमरमाती कुर्सी पर थी, जिसकी एक टाँग छोटी थी और जो हिलने पर चरमराती थी। उनके हाथ में स्टील का गिलास था, आधी ठंडी चाय वाला, और उनकी मेज़ पर एक मोटी फाइल थी, जिसके ऊपर नीली मोहर के साथ कुछ और भी था।
रणवीर ने उनकी मेज़ पर एक काग़ज़ रखा।
दरोगा ने उसे खोला। देखा। फिर हँसे। फिर चाय पी। फिर अपनी मेज़ की दराज़ खोली और उसमें रख दिया। और उस दराज़ में एक और काग़ज़ था, जो पहले से था, किसी और का।
रणवीर ने अपना हाथ दरोगा के कंधे पर रखा। एक पल। सिर्फ़ एक पल। और फिर उन्होंने कुछ कहा, और दरोगा फिर हँसा।
मेरे हाथ मुट्ठी में बंद हो गए।
"देख रही है?" मैंने धीरे से कहा।
"हाँ," मीरा ने कहा। और उसकी आवाज़ में कुछ ऐसा था जो मैंने पहले कभी उसमें नहीं सुना था। "इसे रिकॉर्ड करना चाहिए था।"
"रिकॉर्ड नहीं होगा," मैंने कहा। "पर देखा गया है।"
उसने मेरी तरफ़ देखा।
"मेरी आँखें," मैंने कहा, "उधार की नहीं हैं। ये मेरी हैं। और ये देख चुकी हैं। और जो देख लिया जाता है, वो मिटता नहीं। दरोगा जी ने कहा था — कटा हुआ नाम हमेशा दिखता रहता है। ठीक है। तो फिर ये भी दिखता रहेगा।"
मीरा ने मेरा हाथ पकड़ा।
"अंकुश।"
"हाँ।"
"मैं झूठ नहीं बोलूँगी," उसने कहा। "मुझे डर लग रहा है।"
मैंने उसका हाथ नहीं छोड़ा।
"मुझे भी," मैंने कहा। "और मैं यही सीख रहा हूँ कि डर के साथ बैठना पड़ता है। डर को हराना नहीं पड़ता। बस उसे बगल में बैठाकर अपना काम करना पड़ता है।"
तभी बबलू की आवाज़ बाहर से आई, दूसरे कमरे से, दबी हुई।
"साहब!"
वो ज़ोर से बोला, जैसे कोई गुहार लगा रहा हो।
"साहब, मैंने कुछ नहीं किया। मैं तो… मैं तो आपका आदमी हूँ। साहब, मेरी चेन भी ले ली। मेरा पानदान भी ले लिया। साहब…"
कोई जवाब नहीं आया।
फिर एक आवाज़ आई, बहुत शांत, बहुत धीमी, बहुत साफ़।
रणवीर की आवाज़।
"बबलू," उसने कहा, "तुमने अपना काम कर दिया।"
"साहब—"
"अब मेरा काम है," रणवीर ने कहा। "तुम आराम करो।"
और बबलू चुप हो गया।
बिल्कुल चुप। जैसे उसने सुना हो कि उसका आराम किस चीज़ में है।
मैंने अपनी जेब में हाथ डाला।
घंटी अब भी ठंडी थी। पर उसने कुछ कहा नहीं। बिल्कुल नहीं।
मैंने उसे अपनी हथेली में रखा, माथे से लगाया, उँगलियों से रगड़ा, हिलाया। कुछ नहीं।
"सुन," मैंने धीरे से कहा। "मैं जानता हूँ तू मुझसे नाराज़ है। मैं जानता हूँ मैंने आज बहुत कुछ गँवाया। पर तू चुप मत रह। अगर तू चुप है, तो बताने के लिए कम से कम इतना तो कह दे कि तू है।"
कुछ नहीं।
"तू है ना?"
घंटी ने कोई जवाब नहीं दिया। पर गरम भी नहीं हुई। जैसे किसी ने उसका मुँह बंद कर दिया हो। जैसे घंटी अंदर से किसी और कमरे में बैठी हो, जिसकी दरवाज़ा बंद है और जिसकी चाबी भी उसी कमरे के अंदर है।
मैंने उसे वापस जेब में रखा और बेंच पर पीठ टिकाकर बैठ गया।
दीवार पर लिखी थी, पुरानी स्याही में, किसी की लिखाई। मैंने पढ़ा।
"अगर बाहर जाना है, तो पहले अंदर आना पड़ेगा।"
मैंने अपनी आँखें मूँद लीं।
मीरा मेरे बगल में बैठ गई।
"अठारह अंक," उसने कहा।
"हाँ।"
"और टिन खोलने के लिए सत्तर चाहिए।"
"हाँ।"
"तो फिर आज रात?" उसने पूछा। "आज रात हम क्या करेंगे?"
मैंने आँखें खोलीं।
"आज रात," मैंने कहा, "हम पहली बार कुछ नहीं करेंगे।"
उसने सिर उठाया।
"क्या?"
"मैंने हमेशा कुछ किया," मैंने कहा। "हर बार मैंने सोचा — मुझे करना है। मुझे जोड़ना है। मुझे दौड़ना है। आज पहली बार मैं कुछ नहीं कर सकता। और शायद यही सबसे ज़रूरी सबक है।"
"कौन सा?"
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