The Mysterious Bell – Chapter 1331
"तू भी," उसने कहा, और उसकी आवाज़ टूट रही थी, "तू भी उन्हीं में से है। मैंने सोचा था तू अलग है। तू भी मेरी चेन पर हँस रहा है।"
और फिर वो रोने लगा।
सच में रोया। जीप में बैठा, मोटा आदमी, जिसने दो महीने पहले मेरा गला पकड़ा था, जिसने चूड़ियों की गुमटी उलटी थी, जिसकी जेब से मीरा को चबाया हुआ पान निकलता था — वो ऐसे रो रहा था जैसे स्कूल का बच्चा हो जिसका टिफ़िन किसी ने छीन लिया हो।
मैं चुप हो गया।
मुझे लगा मैंने ज़्यादा कह दिया। मज़ाक की भी एक हद होती है, और मेरा मज़ाक हमेशा उस हद के पास जाकर रुकता है। आज वो रुका नहीं।
"बबलू भाई," मैंने कहा।
"छोड़।"
"बबलू भाई।"
"बोलता है अब।" उसने अपनी आँखें पोंछीं, पर उसका हाथ उसके पास कोई रुमाल नहीं मिला, तो उसने कलाई से पोंछा। "जब सब कुछ चला गया, तब भाई-भाई कर रहा है।"
मैंने गहरी साँस ली।
"चेन नकली थी," बबलू ने अचानक कहा।
मीरा ने सिर उठाया।
"क्या?"
"नकली थी।" बबलू ने अपनी गर्दन छुई, जहाँ चेन रहती थी। "नए बाज़ार से ली थी, चार सौ रुपये में। ऊपर सोने जैसी परत चढ़ी थी। अंदर पीतल।" उसने सूँघा। "हाँ, वो तो पता था।"
"फिर तूने…" मीरा शुरू कर रही थी।
"क्योंकि लोग चेन देखते हैं, भाई।" बबलू ने उसकी तरफ़ देखा। "चेन देखकर लोग सोचते हैं — ये आदमी साहब का आदमी है। चेन देखकर दुकानदार दाम बढ़ा देता है, और चेन देखकर आदमी डरता है। तुम्हें क्या पता, मीरा मैडम। तुम तो अपने कैमरे से देखती हो।"
वो एक पल रुका।
"और आज सबके सामने," उसने धीरे से कहा, "मैंने पहली बार सच बोला।"
उसकी आवाज़ बदल गई।
"पहली बार, अंकुश।" उसने अपनी हथेलियाँ खोलीं और उन्हें देखने लगा, जैसे उसने भी अंदर देखा हो। "उनतीस साल में पहली बार। मैंने सोचा था सच बोलने पर आसमान गिरेगा। कुछ नहीं गिरा। बस आवाज़ काँपी, और लोगों ने मुझे देखा, और मैं…"
वो रुक गया।
"और मैं अंदर से हल्का हो गया," उसने कहा। "ये सच है? सच बोलने पर आदमी हल्का हो जाता है?"
मैंने उसकी तरफ़ देखा।
"मुझे नहीं पता," मैंने कहा। "मैं आज तक इतना सच एक साथ नहीं बोला।"
तभी जीप एक गड्ढे में गई और हम तीनों उछले। बबलू का सिर छत से लगा और उसने कुछ बड़बड़ाया।
और हम हँस पड़े।
सच में हँसे। तीनों। जीप में, खाकी के आगे, बंद होती सड़क पर, बिना किसी वजह के। मीरा की आँखों में आँसू थे और वो हँस रही थी। बबलू हँस रहा था और उसकी हँसी में चेन नहीं थी, पान नहीं था, सिर्फ़ एक बूढ़ा बच्चा था।
राठौर ने पीछे मुड़कर देखा।
"चुप," वो बोला।
हम चुप हुए।
पर उस एक पल में कुछ बदल गया था। मैंने महसूस किया, पर समझ नहीं पाया। बाद में समझा।
जब आदमी अपने डर को हँसी में बदल देता है, तो डर वो नहीं रहता जो पहले था। वो आधा हो जाता है।
मैंने अपनी जेब में हाथ डाला।
घंटी अब भी ठंडी थी। पर अब वो बर्फ़ जैसी नहीं थी। ठंडी थी, धातु की तरह। जैसे किसी कमरे का हिस्सा। जैसे किसी चीज़ की सतह, जिसने अभी तय नहीं किया कि वो ज़िंदा है या नहीं।
मैंने उसे अपनी हथेली में लिया और अपनी साँस से गरम करने की कोशिश की।
"सुन," मैंने धीरे से कहा, "मैं तुझे नहीं छोड़ूँगा।"
कुछ नहीं।
"अठारह अंक हैं," मैंने कहा। "पता है मुझे। तूने बताया था। सत्तर नहीं हैं। टिन खोलने के लिए सत्तर चाहिए। पर मैं तुझसे कुछ माँग नहीं रहा। मैं सिर्फ़ तुझे बता रहा हूँ कि मैं तुझे छोड़ूँगा नहीं।"
घंटी ने कुछ नहीं कहा।
पर उसने खुद को थोड़ा और गरम किया। बहुत थोड़ा। इतना जितना किसी दूसरे का हाथ होता है।
मैंने उसे वापस जेब में रखा।
मीरा ने मेरी तरफ़ देखा।
"क्या हुआ?"
"कुछ नहीं," मैंने कहा। "तू अपना बता। अब आगे क्या?"
मीरा ने खिड़की से बाहर देखा।
"अब?" उसने कहा। "अब सोचना होगा।"
"कितना सोचने को मिलेगा?"
"जितनी देर में हमें अंदर बंद कर देंगे," उसने कहा।
और उसके ठीक बाद, मुझे अपने अंदर से एक बात निकालनी पड़ी, जो चारों तरफ़ से दबा रही थी।
"मीरा," मैंने कहा।
"हूँ।"
"बबलू भाई," मैंने कहा।
दोनों ने मेरी तरफ़ देखा।
"मैं माफ़ी माँग रहा हूँ," मैंने कहा।
बबलू ने मुँह बनाया।
"किस बात की?"
"इस बात की कि मैंने तुम दोनों को अपने साथ खींच लिया।" मैंने अपने घुटनों की तरफ़ देखा। "तुम्हारा इस काम से कोई लेना-देना नहीं था, बबलू भाई। तू तो बस… तू तो साहब का आदमी था। अपनी चेन, अपना पान, अपना हिसाब। मैंने तुझे बीच में घसीट लिया। और तू भी, मीरा। तेरा कैमरा था, तेरा चैनल था, तेरा नाम था। अब तेरा फोन भी नहीं है।"
मीरा एक पल चुप रही।
फिर उसने अपनी तरफ़ का दरवाज़ा खटखटाया, जैसे कोई चाय की गुमटी पर बेंच पकड़कर बैठ जाए।
"सुन," उसने कहा। "मुझे याद है तूने मुझे कहा था — चलो?"
"हाँ।"
"तूने मुझे भेजा था?" उसने पूछा। "या मैंने खुद कहा था कि चलो?"
मैंने सोचा।
"तूने कहा था," मैंने कहा।
"तो फिर माफ़ी किस बात की?" उसने कहा। "मैं वहाँ अपनी मर्ज़ी से गई थी। अपने काम से। और मेरा काम अभी खत्म नहीं हुआ है। मेरा फोन उनके पास है, पर मेरा दिमाग़ मेरे पास है। और मैंने कान सिर्फ़ सुनने के लिए नहीं रखे हैं।"
वो खिड़की से बाहर देखने लगी, और उसकी आवाज़ धीमी हो गई।
"माफ़ी मत माँग," उसने कहा। "अब आगे सोच।"
बबलू ने अपनी गर्दन खुजाई।
"और मैं?" उसने कहा। "मैं क्या सोचूँ? मैं तो कुछ नहीं हूँ। मैं तो इनके…" उसने आगे की तरफ़ इशारा किया, राठौर की तरफ़ नहीं, शायद बाहर किसी की तरफ़, "इनका कुत्ता था।"
"कुत्ते भी अच्छे होते हैं," मैंने कहा।
"हाँ, पर कुत्तों को जेल नहीं होती।"
"तू जेल में नहीं है," मीरा ने कहा।
"मैं जीप में हूँ," बबलू ने कहा। "ये पहला कदम है।"
और फिर आगे से, जाली के पीछे से, पापा की आवाज़ आई।
"बेटा।"
हम तीनों चुप हो गए।
"मैं बाईस साल चुप रहा," पापा ने कहा। उनकी आवाज़ सूखी थी, पर साफ़। "तुम्हारी माँ से चुप, तुमसे चुप, उस्ताद से चुप। हर सुबह दुकान खोलता और हर शाम बंद करता, और लगता कि अगर मैं बोलूँगा तो घर गिर जाएगा।"
वो रुके।
"आज मैंने बोल दिया," उन्होंने कहा, "और घर नहीं गिरा।"
मैंने जाली में अपनी उँगली डाली।
"पापा।"
"अब तुम्हारे साथ चुप नहीं रहूँगा," उन्होंने कहा। "अगर इनकी काग़ज़ी पूछताछ में कुछ हो, अगर ये तुम्हें डराएँ, तो मुझे बुलाना। मैं आगे आ जाऊँगा। बाईस साल पहले मैं आगे आ सकता था और नहीं आया। अब आऊँगा।"
उन्होंने अपना हाथ जाली पर रखा। मैंने अपना हाथ उनके हाथ के नीचे रखा। जाली के दोनों तरफ़ हाथ थे, और बीच में सिर्फ़ लोहे की जाली थी, जो सबसे पतली दीवार होती है और सबसे मोटी भी।
जीप ने गली का मुँह लिया।
मैंने गर्दन घुमाकर बाहर देखा।
साइकिल गली।
शाम की जगह रात हो चुकी थी और फिर भी गली कहीं से जाग रही थी। उस्ताद की दुकान का शटर बंद था, पर उसके ऊपर लगे नए लोहे के ताले की परत पीली रोशनी में चमक रही थी। शबनम आपा की गुमटी पर कुछ नहीं जल रहा था। चूल्हा बंद था। उसका चूल्हा। वो चूल्हा जो सुबह पाँच बजे जलता था, जो कभी नहीं बुझता था।
दुबे अंकल की कुर्सी।
वो खाली थी।
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