The Mysterious Bell – Chapter 1330
"तीनों को ले चलो," उसने कहा। "शंकर यादव। अंकुश यादव। और बंसतलाल का बेटा।"
"मैं?" बबलू चीखा। "साहब, मैं तो आपका आदमी हूँ।"
"तुम्हारा नाम काग़ज़ पर आ गया है," रणवीर ने कहा। "अब काग़ज़ से नाम नहीं हटता, बेटा। काग़ज़ से नाम सिर्फ़ कटता है, और कटा हुआ नाम हमेशा दिखता रहता है।"
बबलू का मुँह खुला रह गया। और उस खुले मुँह में मैंने पहली बार वो डर देखा जो वो दूसरों में पैदा करता था।
छोटे खाकी ने मेरा हाथ पकड़ा। लंबे ने पापा का।
मैंने अपना हाथ खींचा तो पकड़ सख़्त हुई।
"अंकुश भाई," रणवीर ने कहा, "खींचोगे तो नुक़सान ज़्यादा होगा। और सुनो — काग़ज़ पर यह भी लिखा है कि रात को सरकारी जगह से मिली चीज़ों की सूची बनेगी। तो ये छह बक्से, ये टिन, ये सब बाहर जाएँगे।"
"ये बक्से आपके नहीं हैं," मैंने कहा।
"अभी तक नहीं थे," उसने कहा। "पर रात भर बहुत कुछ बदल जाता है।"
काजल मेरी तरफ़ लपकी।
"अंकुश," उसने कहा, और उसकी आवाज़ टूट रही थी, "मैं माँ को लेकर आऊँगी। मैं डॉक्टर इसरानी को बोलूँगी।"
"माँ को मत बोलना," मैंने कहा। "उनका बुखार अभी उतरा है।"
"पर—"
"काजल," मैंने कहा, "माँ को बोलना, पर मायके वाली बात मत बोलना। सिर्फ़ इतना कहना कि सुबह तक मैं आ जाऊँगा।"
काजल ने मेरा हाथ पकड़ा। उसकी उँगलियाँ ठंडी थीं।
मीरा मेरे सामने आई। उसकी कॉपी छाती से चिपकी थी, और उसकी आँखों में वो आग थी जो पाँच साल से दबी हुई थी और अब फिर जल रही थी।
"मैं थाने जाऊँगी," उसने कहा। "मैं शालिनी को फोन करूँगी। मैं सभा रुकवाऊँगी नहीं। अगर तुम नहीं रहे, तो भी सभा होगी।"
"मीरा," मैंने कहा, "सभा के लिए सिर्फ़ मुझे नहीं, उस औरत का नाम चाहिए। उस औरत का जिसने मेरे पापा को घंटी लौटाई थी।"
मीरा ने सिर हिलाया।
"मैं ढूँढूँगी," उसने कहा। "पूरा शहर ढूँढूँगी।"
"और शालिनी को बोलना," मैंने कहा, "कि उसका सात बजे वाला मिलना अभी भी ज़रूरी है।"
भैरों काका मेरे सामने आए। उन्होंने अपनी मोटी लाठी मेरे हाथ पर रखी और फिर उठा ली, जैसे आशीर्वाद दे रहे हों।
"बेटा," उन्होंने कहा, "मैं यहीं हूँ। इस फाटक पर। अगर ये बक्से हिलाने आए, तो पहले मुझे हिलाना पड़ेगा।"
"काका," मैंने कहा, "आप घर जाइए।"
"मेरा घर यहीं है," उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ में वो ज़िद थी जो सिर्फ़ बूढ़ों में होती है, "और मेरा घर किसी के तालों में नहीं बंद होता।"
खाकी मुझे खींचकर बाहर ले जाने लगा।
मैंने जेब में घंटी पकड़ी।
"सुन," मैंने धीरे से कहा, इतना धीरे कि सिर्फ़ घंटी सुन सके, "अब तू चुप मत रहना। मेरे पास अठारह अंक हैं। सत्तर नहीं हैं। पर तेरे पास इतना तो है ना कि मुझे बता दे कि मैं ग़लत नहीं हूँ?"
घंटी गरम थी। बहुत गरम।
और फिर, बहुत धीमे, मेरी हथेली में उसने एक शब्द कहा।
"नाम।"
मैं मुस्कुराया। पहली बार उस रात।
बाहर निकलते वक़्त मैंने पीछे मुड़कर देखा।
बिजलीघर के अंदर रोशनी पड़ रही थी। छह बक्से चुप खड़े थे। उनमें से आख़िरी बक्से का ढक्कन अब भी एक हाथ की दरार तक खुला था। उस दरार में से धूल के कण रोशनी की तरफ़ तैर रहे थे, जैसे कोई बंद कमरे में साँस ले रहा हो।
मैंने सोचा, अगर सरकारी माल को हाथ लगाना जुर्म है, तो पहले उस आदमी का नाम लिखा जाना चाहिए जिसने इन बक्सों को यहाँ बीस साल से बंद रखा है।
फाटक के बाहर जीप खड़ी थी। उसके दोनों दरवाज़े खुले थे और उसकी पीली रोशनी धूल में एक लंबी सड़क जैसी बन गई थी।
खाकी ने मुझे जीप की तरफ़ धकेला।
और तभी रणवीर मेरे पास आया।
उसने अपना हाथ मेरे कंधे पर रखा। हल्का। बिल्कुल हल्का। जैसे कोई बूढ़ा अपने बेटे को रास्ता दिखा रहा हो।
मैंने उसका हाथ नहीं हटाया। हटाना चाहता था। बहुत चाहता था। पर मैंने सोचा, आज इसका हाथ हटाना मेरे हाथ में नहीं है। आज सिर्फ़ मेरी ज़ुबान मेरे हाथ में है।
वो मेरे कान के पास झुका।
उसकी साँस से साबुन और इलायची की खुशबू आई। और उसके नीचे, बहुत हल्की, जले हुए काग़ज़ की गंध।
"अंकुश," उसने फुसफुसाया, "तूने आज एक बात अच्छी कही थी।"
मैं चुप रहा।
"तूने कहा था," उसने धीरे से कहा, "कि उस औरत का नाम आज शाम तक पता चल जाएगा।"
मेरा शरीर ठंडा हो गया।
"तो सुन ले," उसने कहा। "पूर्णिमा वाली सभा अब तेरे बिना होगी, बेटा।"
और वो पीछे हट गया।
उसकी मुस्कान लौट आई थी। पूरी। साफ़। तस्वीर वाली।
जीप का दरवाज़ा बंद हुआ।
और मेरे हाथ में घंटी इतनी गरम हो गई कि मुझे लगा यह पीतल नहीं, कोई ज़िंदा चीज़ है जो मेरी हथेली में दाँत गड़ा रही है।
॥
जीप की पिछली सीट पर मैं बैठा था और मेरी जेब में जो चीज़ थी, वो बर्फ़ जैसी ठंडी थी।
घंटी।
न गरम, न ठंडी से गुनगुनी — ठंडी। बिल्कुल ठंडी। जैसे किसी ने उसे उठाकर कुएँ के पानी में डाल दिया हो और फिर वापस मेरी जेब में रख दिया हो।
मैंने उसे उँगलियों में दबाया।
कुछ नहीं।
जीप का इंजन चल रहा था और उसकी गरमाहट सीट के नीचे से मेरे पैरों तक आ रही थी, पर जेब में एक छोटी सी जगह ठंडी थी। इतनी ठंडी कि मुझे लगा मेरी जेब में छोटा सा जाड़ा बैठा है।
सड़क पर धूल उड़ रही थी। जीप की पीली रोशनी धूल में सीधी लकीर बना रही थी, जैसे किसी ने अंधेरे में चाक से रास्ता खींच दिया हो।
आगे की सीट पर पापा बैठे थे।
उनकी पीठ सीधी थी। बिल्कुल सीधी। जबकि हमेशा वो झुकी रहती है। आज वो सीधी थी, जैसे बाईस साल का बोझ उतर गया हो और उसकी जगह कुछ और आ गया हो। कुछ ज़्यादा भारी।
उनके बगल में राठौर बैठा था। वही लंबा खाकी। उसने मीरा का फोन अपनी जेब में रख लिया था और तब से एक बार भी पीछे नहीं देखा। ऐसे बैठा था जैसे पीछे कोई नहीं बैठा हो।
और मेरे बगल में मीरा थी।
वो अपने घुटनों को सीने से लगाकर बैठी थी, और उसके होंठ हिल रहे थे। धीरे-धीरे। मैंने ध्यान से सुना।
"मैंने छह साल में कभी सीधा प्रसारण नहीं छोड़ा," वो बोली। "एक बार भी नहीं। बाढ़ में भी नहीं। उस दिन भी नहीं जब मेरा कैमरा पानी में गिर गया था। पर आज…"
"मीरा।"
"मेरे हाथ में कैमरा था," उसने कहा, और उसकी आवाज़ में गुस्सा था। अपने ऊपर। "मैंने उसे बाहर ही छोड़ दिया। मैंने सोचा, पहले बात, फिर कैमरा। और बात होती रही, और मैं…"
"मीरा।"
"और फोन भी चला गया।" उसने अपनी खाली हथेली देखी, जैसे उसमें अभी भी कुछ हो सकता है। "छह साल का मेरा काम, मेरे पास से ऐसे निकल गया जैसे…"
वो रुक गई।
तभी बबलू बोला।
"मेरी नौकरी गई।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा। वो मेरी दूसरी तरफ़ बैठा था, और उसका मोटा शरीर सिकुड़कर आधा हो गया था। उसका पानदान नहीं था। सोने की चेन नहीं थी। गले में सिर्फ़ एक पतली लकीर बची थी, जहाँ चेन रहती थी, धूप में पसीने की वजह से चमक रही थी।
"मेरी नौकरी गई," उसने फिर कहा। "इज़्ज़त गई। सबके सामने मैंने कबूल किया कि मैं उस रात ग्यारह बजे वहाँ था। अब मुझे कौन रखेगा?"
"तू सबके सामने सच बोलकर मेरे काम का आदमी हो गया," मैंने कहा।
"हँस मत।"
"मैं हँस नहीं रहा।" मैंने उसकी तरफ़ देखा। "और कम से कम अब तेरी सोने की चेन ज़ब्त हो गई। सादा आदमी बन जाएगा।"
बबलू एक पल चुप रहा।
फिर उसका चेहरा टेढ़ा हुआ, और मुझे लगा वो चिल्लाएगा। पर वो चिल्लाया नहीं। उसकी आँखें भर आईं।
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