The Mysterious Bell – Chapter 1329
"अरे बहन," बबलू ने फुसफुसाया, "अभी के अभी। मतलब। तू समझ तो रही है।"
"मैं सब समझ रही हूँ," मीरा ने कहा।
बबलू ने मुँह बनाया। ऐसा मुँह जैसे किसी ने खट्टा नींबू चबा लिया हो। फिर वो चुप हो गया। पूरी तरह चुप। आदमी जब डरता है तो उसकी ज़ुबान भी उसके साथ छिप जाती है।
मनोज ने काग़ज़ आगे किया।
"सर, नुक़सान का हिसाब भी लगा लिया है। बक्से की सील टूटी है। एक बक्से का ढक्कन खुला है। अंदर की चीज़ें छेड़ी गई हैं।"
"छेड़ी नहीं गई हैं," मैंने कहा।
रणवीर ने भौंह उठाई।
"तो?"
"तो यह कि बक्से में सबूत है।"
बिजलीघर में एक पल के लिए ऐसी चुप्पी आई जैसे सबने साँस लेना बंद कर दिया हो।
फिर रणवीर हँसा।
इस बार हँसी बड़ी थी। खुली हुई। मंच वाली हँसी, जो भीड़ को बताती है कि अब मज़ाक ख़त्म हो गया है।
"सबूत?" उसने कहा। "अंकुश भाई, यह बक्सा सरकारी है। इसमें जो है, वो सरकार का है। सबूत तब होता है जब काग़ज़ हो, मुहर हो, गवाह हो। तुम्हारे पास क्या है?"
मैंने अपनी जेब में हाथ डाला। घंटी वहाँ थी। गरम। बहुत गरम। जैसे किसी ने उसे उबलते पानी में डुबोकर जेब में रख दिया हो।
"मेरे पास घंटी है," मैंने कहा।
"घंटी," रणवीर ने दोहराया, और उसके पीछे खड़े एक आदमी के होंठ हिले, जैसे वो हँसी रोक रहा हो।
"हाँ," मैंने कहा। "घंटी। और वो काग़ज़ों से नहीं बोलती, साहब। वो उस आदमी से बोलती है जो सच बोलता है।"
"बड़ी बात है," रणवीर ने कहा।
और फिर वो बक्से की तरफ़ बढ़ा।
उसके जूते धूल में ऐसे उतरे जैसे किसी तालाब में पत्थर। छह कदम। पाँच कदम। चार। वो आख़िरी बक्से के सामने रुका, थोड़ा झुका, और उसने हाथ बढ़ाया।
अंदर की तरफ़। टिन की तरफ़।
मैंने देखा। सबने देखा।
उसका हाथ टिन से एक इंच पहले रुक गया।
बस रुक गया। जैसे हवा ने उसकी कलाई पकड़ ली हो। उसने ज़ोर लगाया, उँगलियाँ फैलाईं, और उसकी उँगलियों की नोक काँपी। नाखून नीचे की तरफ़ झुके, और एक मिनट पहले जो मुस्कान उसके चेहरे पर थी, वो उतर गई। बिल्कुल नहीं। धीरे-धीरे उतरी, जैसे दीवार से प्लास्टर।
"सर?" मनोज ने धीरे से कहा।
रणवीर ने हाथ खींच लिया।
उसने अपनी हथेली देखी। पलटी। फिर जेब से सफ़ेद रूमाल निकाला और उँगलियाँ पोंछीं। रूमाल पर कुछ नहीं लगा था। पर वो फिर भी पोंछता रहा, जैसे उसे खुद से छिपाना हो कि उसका हाथ नहीं पहुँचा।
"धूल है," उसने कहा।
"धूल सबके लिए है, साहब," मैंने कहा।
उसने मेरी तरफ़ देखा। एक पल के लिए उसकी आँखों में कुछ ऐसा था जो मैंने पहले कभी नहीं देखा था। गुस्सा नहीं। डर भी नहीं। कुछ और। जैसे किसी ने उसके हाथ से उसकी अपनी चीज़ छीन ली हो, और वो यह जानता हो कि वो चीज़ असल में कभी उसकी थी ही नहीं।
और उसके पीछे, दीवार पर उसकी परछाईं ज़रा देर से आई। जैसे उसका शरीर तो अंदर आ गया हो, पर परछाईं दरवाज़े पर रुककर पहले बाहर देख लेती हो कि कहीं कोई देख तो नहीं रहा।
तभी पापा आगे बढ़े।
मैंने उन्हें रोकना चाहा, पर वो रुके नहीं। वो सीधे रणवीर के सामने आकर खड़े हो गए। उनका एक हाथ पीछे था, दूसरा कमीज़ की तरफ़। और उनकी आवाज़, जो बरसों से घर में चाय के भाप जितनी पतली थी, आज पत्थर जैसी निकली।
"साहब," उन्होंने कहा, "मेरा बेटा चोर नहीं है।"
बिजलीघर में फिर चुप्पी।
"और मैं भी चोर नहीं हूँ," पापा ने कहा। "ताला हमने नहीं तोड़ा। फाटक खुला था। अंदर आने की इजाज़त इस जगह के चौकीदार ने दी थी। और जो काग़ज़ आपने मुझसे बाईस साल पहले लिया था, उसका हिसाब भी मेरे पास है।"
रणवीर मुस्कुराया।
इस बार मुस्कान में मिठास नहीं थी। रस्सी थी।
"शंकर भाई," उसने कहा, "आप उम्र के उस मोड़ पर हैं जहाँ आदमी को अपनी इज़्ज़त सँभालनी चाहिए। आपका बेटा बोले, ठीक है। बच्चा है। पर आप।"
"मैं आपका भाई नहीं हूँ," पापा ने कहा।
रणवीर के चेहरे पर कुछ हुआ। बहुत छोटा। बहुत तेज़। जैसे आईने पर खरोंच पड़ जाए और फिर तुरंत मिट जाए।
तभी पीछे से लाठी की आवाज़ आई।
टक। टक। टक।
भैरों काका।
वो बाहर की तरफ़ से आ रहे थे। उनकी टिन की लालटेन हवा में झूल रही थी, हाथ में मोटी लाठी थी, और उनकी कमर पहले से ज़्यादा झुकी हुई थी। पर वो चल रहे थे। खाकी वालों के बीच से चलकर, बिल्कुल बीच में, और फिर वो रणवीर के सामने आकर रुके।
"साहब," भैरों काका ने कहा, "मैं इस बिजलीघर का चौकीदार हूँ।"
रणवीर ने उन्हें देखा, जैसे कोई रास्ते में पड़ी ईंट देखता है।
"बीस साल से," भैरों काका ने कहा। "जिस दिन मुझे यहाँ से हटाया गया था, उस दिन भी मैं चौकीदार था। आज भी हूँ। सरकारी रजिस्टर में मेरा नाम लिखा है, और मेरे पास चाबी है।"
"काका," रणवीर ने कहा, और उसकी आवाज़ में वो चीनी लौट आई जो बच्चों को टॉफ़ी देते वक़्त होती है, "आपकी उम्र में आपको यहाँ खड़े नहीं होना चाहिए। आपकी झोपड़ी उसी ज़मीन पर है ना?"
काका का हाथ लाठी पर कसा।
"टिन की है, साहब," उन्होंने कहा। "टिन की झोपड़ी है। उखाड़ दीजिए। पर इन लोगों को मैंने अंदर बुलाया है। मैं गवाह हूँ।"
मनोज ने क्लिपबोर्ड पर कुछ लिखा।
"सर," उसने धीरे से कहा, "चौकीदार का नाम काग़ज़ में नहीं है।"
"क्योंकि काग़ज़ बदल गया है," काका ने कहा, और उनकी आवाज़ काँपी, पर पैर नहीं।
"काका," रणवीर ने कहा, "आप जानते हैं, मुझे झगड़ा पसंद नहीं है। मैं तो बस उन बच्चों की मदद करता हूँ जो काग़ज़ के चक्कर में फँस जाते हैं। आप घर जाइए। रात ठंडी है।"
"मैं ठंडी रात में बीस साल से सो रहा हूँ, साहब," काका ने कहा। "आज नहीं सोऊँगा।"
रणवीर चुप हो गया।
और वो चुप्पी मुझे उसकी हँसी से ज़्यादा डरावनी लगी।
तभी मीरा ने अपना मोबाइल निकाला।
"यह सब रिकॉर्ड हो रहा है," उसने कहा। "मेरा चैनल है, मेरे पास तीन सौ दर्शक हैं, और आप जो कर रहे हैं, वो बात आज रात ही बाहर जाएगी।"
लंबे खाकी ने दो कदम में उसका हाथ पकड़ लिया।
"मोबाइल दीजिए।"
"हाथ लगाइए मत," मीरा ने कहा। "यह मेरी चीज़ है।"
"यह सबूत है," खाकी ने कहा। "ज़ब्ती में जाएगा।"
"किस धारा में?"
खाकी को जवाब नहीं आया। उसने मोबाइल खींच लिया। मीरा का हाथ एक पल हवा में रह गया, जैसे किसी ने उसकी उँगलियाँ अचानक खाली कर दी हों।
मीरा ने उसकी छाती पर लगी पट्टी देखी।
"राठौर जी," उसने धीरे से कहा। "आपका नाम राठौर है, है ना? मैं याद रखूँगी।"
खाकी ने नज़र चुरा ली। उसका जबड़ा कसा, पर वो कुछ नहीं बोला।
तभी मुझे बक्से के पीछे से फुसफुसाहट सुनाई दी।
"अरे, मेरा पानदान भी छीन लो, साहब। चेन भी।"
बबलू।
मीरा ने पलटकर देखा।
बबलू ने तुरंत हाथ जोड़ लिए।
"मैंने कुछ नहीं कहा," उसने कहा। "मैं तो यहाँ पहली बार आया हूँ।"
"बबलू भाई," मैंने कहा, "आपने कल गुमटी पर खुद बताया था कि आप इस बक्से के सामने खड़े थे।"
बबलू ने मेरी तरफ़ ऐसी नज़र की जैसे मैंने उसकी कमीज़ की जेब से पैसे निकाल लिए हों।
"अंकुश भैया," उसने फुसफुसाया, "तू मेरी जान लेने पर तुला है क्या?"
"आपकी जान साहब ले रहे हैं," मैंने कहा। "मैं तो बचा रहा हूँ।"
बबलू के चेहरे पर एक पल को कुछ ऐसा उभरा जो डर से बड़ा था। शर्म। फिर वो बक्से के पीछे पूरा सिमट गया।
रणवीर ने खाकी की तरफ़ उँगली उठाई।
वेबसाइट पर अपनी पसंदीदा कहानियाँ मुफ्त पढ़ें और Story FM App पर उन्हीं कहानियों का शानदार Audio Experience लें।
यह कहानी Story FM app पर ऑडियो में भी सुनें — आगे के एपिसोड सबसे पहले वहीं आते हैं।
Audio mein suno