The Mysterious Bell – Chapter 1328
मेरा दिल भारी हो गया — ऐसे भारी जैसे किसी ने उस पर पत्थर रख दिया हो और कहा, इसे उठाकर चल।
मैंने हाथ बढ़ाया — फिर वहीं रुका।
"यह टिन तेरा है," मीरा ने कहा, मेरी तरफ़ देखकर। "ना?"
"पता नहीं," मैंने कहा।
"अंकुश—"
"मीरा," मैंने कहा, "मेरे पास अठारह अंक बचे हैं। घंटी कह रही है कि यह याद मेरी है। और मेरी सबसे प्यारी याद ताले में बंद है।" मैंने उसकी तरफ़ देखा। "अब तू बता — अगर यह मेरी याद है, तो यह टिन क्यों मेरे हाथ नहीं आ रहा? क्यों बीच में कोई दीवार है?"
मीरा ने कुछ नहीं कहा।
काजल ने कहा, "क्योंकि तूने अभी उसे खोला नहीं है।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा।
"क्या?"
"तूने ताला खोला नहीं," काजल ने कहा। "तूने सिर्फ़ चाबी गले में डाल रखी है।"
मैं कुछ देर उसे देखता रहा।
फिर मैंने अपनी जेब से वो काग़ज़ निकाला जो शटर पर लटका मिला था। मैंने उसे खोलकर पढ़ा।
बक्से से आने वाली चीज़ को उठाना मत। वो तेरी है भी और नहीं भी। और जब वो सभा में जाएगी — तू अपने नाम की जगह उसका नाम बोलेगा।
"अंकुश," बबलू ने कहा। "मुझे एक बात याद आ रही है।"
"क्या?"
"साहब के दफ़्तार में एक लॉकर है," बबलू ने कहा। "जिसे कोई नहीं छूता। मैंने एक बार पूछा तो साहब ने कहा — इसमें हिसाब नहीं, किसी की याद है।"
"किसकी?"
"मुझे नहीं पता," बबलू ने कहा। "पर अब लगता है कि मुझे पता था। बस मैंने उसे देखा नहीं।"
मैंने बक्से की तरफ़ देखा। छठा बक्सा। ढक्कन ज़रा खुला। अंदर अंधेरा।
"घंटी," मैंने कहा। "अगर मैं यह बक्सा ज़ोर से खोलूँ?"
"सत्तर अंक," घंटी ने कहा।
"मेरे पास अठारह हैं।"
"तो नहीं खुलेगा।"
"और अगर मैं ज़ोर लगाऊँ?"
घंटी ने कुछ देर सोचा।
"चाबी तेरे पास है," उसने कहा।
"तो?"
"पर ताला तेरा नहीं है।"
मैंने टिन की तरफ़ देखा। टिन वहीं पड़ा था। काग़ज़ की नाव, घंटी का टुकड़ा, तस्वीर की झलक।
मुझे अपनी माँ की हँसी फिर सुनाई दी — बहुत दूर, बहुत पुरानी, जैसे किसी दूसरे घर से आ रही हो।
मैंने आँखें बंद कर लीं।
जब खोलीं, तो मेरे गाल गीले थे।
मीरा ने मेरा हाथ पकड़ा।
"अंकुश," उसने कहा। "आज शाम सभा है।"
"मुझे पता है।"
"और हमारे पास इस टिन के सिवा कुछ नहीं है।"
"पता है।"
"तो?"
मैंने अपनी आँखें पोंछीं।
"तो," मैंने कहा, "हम सभा में जाएँगे और एक नाम लेंगे।"
"हरिप्रसाद?"
"नहीं," मैंने कहा। "उसका नाम तो रणवीर लेगा। हम लेंगे — उस औरत का नाम। उस औरत का, जिसने घंटी लौटाई थी। उस औरत का, जिसे रणवीर का डॉक्टर पागल कह रहा है।"
पापा ने मेरी तरफ़ देखा।
"बेटा," उन्होंने कहा, "तुझे उसका नाम पता है?"
"नहीं," मैंने कहा। "पर आज शाम तक पता चल जाएगा।"
और तभी — टूटी खिड़की से बाहर, बिजलीघर के फाटक की तरफ़ से, एक पीली रोशनी आई।
लंबी। घूमती हुई। जीप की रोशनी।
मैंने सुना — दो दरवाज़े खुले, फिर बंद हुए। फिर पैरों की आवाज़। फिर किसी ने फाटक पर हाथ रखा और वो चरमराया।
और फिर मैंने वो आवाज़ सुनी जो मैं पहचानता था।
आवाज़ में मिठास थी। वो मिठास जो बरसों से चली आ रही है और जिसकी आदत पड़ जाती है।
"यह सरकारी ज़मीन है।"
मेरी मुट्ठी कस गई।
"और ये तीनों चोर हैं।"
मैंने पीछे मुड़कर देखा। बबलू का चेहरा सफ़ेद था। काजल ने मेरा हाथ पकड़ लिया। पापा ने रेती जेब में डाली और आगे बढ़ गए — मेरे आगे, मेरे और दरवाज़े के बीच।
मीरा ने अपनी कॉपी निकाली।
और मैंने घंटी को जेब में रखा — वो गरम थी, बहुत गरम — और बाहर की तरफ़ चल पड़ा।
दरवाज़े पर रोशनी पड़ रही थी। पीली, सख़्त, जैसे किसी ने सूरज को ज़बरदस्ती अंदर घुसा दिया हो।
मैंने दरवाज़ा खोला।
रणवीर बाहर खड़ा था।
सफ़ेद कुर्ता। सफ़ेद जूते। हाथ जोड़े हुए। और उसके पीछे दो खाकी और चार आदमी।
और वो मुस्कुरा रहा था।
"अंकुश भाई," उसने कहा, "मैंने कहा था ना — मैं सीधा आऊँगा।"
मैंने उसकी आँखों में देखा।
और मैंने कहा, "आ गए।"
रोशनी और तेज़ हो गई। जीप का इंजन चल रहा था। और बिजलीघर की दीवारों में वो आवाज़ गूँज रही थी, जो सिर्फ़ मैं सुन सकता था — घंटी। धीमी। थकी हुई।
"एक नाम और बाकी है," उसने कहा।
"किसका?"
"तेरा।"
और मैंने उसकी मुस्कान देखी — वो मुस्कान जो बरसों से उसकी आदत है, जिसे वो हर तस्वीर में पहनता है, जिसे उसने आज भी पहन रखा है।
मैंने कहा, "तो फिर उस नाम को भी आज लेना पड़ेगा।"
रणवीर की मुस्कान ज़रा सी हिली।
बस ज़रा सी।
और मैंने जेब में घंटी को और कसकर पकड़ लिया।
॥
रोशनी पहले मेरे जूतों पर पड़ी। फिर घुटनों पर। फिर आँखों पर। इतनी तेज़ कि बिजलीघर की पुरानी दीवार भी एक पल को सफ़ेद दिखने लगी, जैसे किसी ने उस पर चूना फेर दिया हो।
रणवीर दरवाज़े के ठीक बीच में खड़ा था। जैसे यह दरवाज़ा उसी के नाप का बना हो। सफ़ेद कुर्ता, सफ़ेद पैंट, सफ़ेद जूते। जूतों पर धूल का एक कण भी नहीं। मैंने सोचा, इस आदमी की धूल भी इससे डरती है।
और उसके पीछे दो खाकी खड़े थे। एक लंबा, एक छोटा। उनके पीछे चार आदमी, जिनके हाथ खाली थे और आँखें सिर्फ़ सामने।
मनोज सबसे आगे आया। हाथ में क्लिपबोर्ड, क्लिपबोर्ड पर काग़ज़, काग़ज़ पर कुछ लिखा हुआ, और उसके कुर्ते की जेब पर वही नीली गोल मोहर।
"अंकुश भाई," रणवीर ने कहा, हाथ जोड़े हुए, "मैंने कहा था ना, मैं सीधा आऊँगा।"
"आ गए," मैंने कहा।
"अंदर आने की इजाज़त है?"
"आप इजाज़त लेने वाले आदमी नहीं लगते।"
वो हँसा। छोटी, साफ़ हँसी। वैसी हँसी जैसे किसी शादी में बड़ा भाई छोटे की शरारत पर हँस देता है और सब समझ जाते हैं कि माफ़ नहीं किया।
"तुम्हारी ज़ुबान अच्छी है," उसने कहा। "बस जगह ग़लत चुन ली।"
फिर वो अंदर आया।
उसके जूतों की आवाज़ सीमेंट पर ऐसी हुई जैसे कोई ठेकेदार नई इमारत नाप रहा हो। उसने एक बार दीवार देखी, एक बार छत, और फिर उसकी नज़र बक्सों पर पड़ी। छह बक्से, दीवार के साथ बराबर अंतर पर। और आख़िरी बक्से का ढक्कन एक हाथ की दरार तक खुला।
"यह सरकारी ज़मीन है," उसने कहा।
आवाज़ वैसी ही मीठी। जैसे गुड़ की चाशनी में कोई धीमा ज़हर घोल दे।
"यह पुराना बिजलीघर कई साल से बंद है। सरकारी रिकॉर्ड में इसका नाम है। बंद जगह में रात को घुसना, ताला खोलना, सरकारी माल को हाथ लगाना।"
वो रुका और मनोज की तरफ़ देखा।
मनोज ने क्लिपबोर्ड खोला और पढ़ने लगा, जैसे स्कूल में बच्चा तुकबंदी सुना रहा हो।
"सर, रात ग्यारह बजकर चालीस मिनट पर तीन लोग। शंकर यादव। अंकुश यादव। और बंसतलाल का बेटा।"
मेरे पीछे से एक आवाज़ आई।
"हैं?"
बबलू।
वो आख़िरी बक्से के पीछे से आधा सिर निकालकर खड़ा था। उसका सिर इस तरह हिल रहा था जैसे भीतर कोई कबूतर फड़फड़ा रहा हो। माथे पर पसीना, गले की सोने की चेन कमीज़ के अंदर घुसी हुई, और हाथ में पानदान ऐसे पकड़ा हुआ जैसे कोई बच्चा मिठाई की डिब्बी छिपा रहा हो।
"मैं?" बबलू ने कहा। "मैं कहाँ, साहब? मैं तो यहाँ पहली बार आया हूँ। कसम से। पहली बार।"
मीरा ने उसकी तरफ़ देखा।
सिर्फ़ देखा। घूरा भी नहीं। बस देखा।
बबलू का मुँह एक पल में बदल गया। पहले वो कुछ कहने को हुआ, फिर होंठ भींचे, फिर आँखें नीची कर लीं और बक्से के पीछे आधा और सरक गया।
"पहली बार?" मीरा ने धीरे से कहा, इतना धीरे कि सिर्फ़ आसपास वाले सुनें।
वेबसाइट पर अपनी पसंदीदा कहानियाँ मुफ्त पढ़ें और Story FM App पर उन्हीं कहानियों का शानदार Audio Experience लें।
यह कहानी Story FM app पर ऑडियो में भी सुनें — आगे के एपिसोड सबसे पहले वहीं आते हैं।
Audio mein suno