The Mysterious Bell – Chapter 1327
गुमटी के पास बबलू खड़ा था।
मैंने उसे देखा तो रुक गया।
वो वही बबलू था — मोटा शरीर, गले में सोने की चेन, पर आज चेन नहीं थी। और कुर्ता वही था जो कल पहना था, झुर्रीदार, और आँखों के नीचे काले घेरे।
"तू यहाँ?" मैंने पूछा।
"कल रात से," उसने कहा।
"सोया नहीं?"
"सोया तो हूँ," बबलू ने कहा। "पर नींद में भी वही नाम सुनाई देता है।"
"कौन सा नाम?"
बबलू ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में वो डर था जो पहले कभी नहीं था — पहले उसकी आँखों में धमकी होती थी, अब सिर्फ़ सवाल।
"हरिप्रसाद," उसने धीरे से कहा।
मेरे पैर जैसे ज़मीन में गड़ गए।
"क्या कहा?"
"हरिप्रसाद," बबलू ने दोहराया। "मैंने यह नाम पहले सुना है। बहुत पहले।"
काजल ने मेरी बाँह पकड़ी।
"कब सुना?" मैंने पूछा।
बबलू ने गुमटी की तरफ़ देखा, फिर मेरी तरफ़।
"मुझे चाय पिला," उसने कहा। "फिर बताता हूँ।"
शबनम आपा ने बिना कुछ पूछे दो कटोरी चाय और एक कटोरी बबलू के सामने रखी। बबलू ने कटोरी दोनों हाथों से पकड़ी — जैसे किसी बर्तन को नहीं, किसी सहारे को पकड़ रहा हो।
"जब मैं साहब के दफ़्तार में नया नहीं था," बबलू ने कहा, "तब एक रात मैं काग़ज़ों की अलमारी के पास खड़ा था। साहब किसी से बात कर रहे थे — फोन पर। मैंने सिर्फ़ एक लाइन सुनी।"
"क्या?"
"साहब ने कहा — हरिप्रसाद का हिसाब अभी बाकी है।"
गुमटी में चूल्हे की आवाज़ थी, चाय की खौलती आवाज़, पर मुझे सब दूर लगा।
"कब की बात है?" पापा ने पूछा। उन्होंने पहली बार खुद बात शुरू की थी।
"दस साल पुरानी," बबलू ने कहा। "या बारह। मैंने उस रात सोचा कि कोई कारोबारी हिसाब होगा। पर साहब की आवाज़ में जो था, वो हिसाब की नहीं, किसी चीज़ के इंतज़ार की आवाज़ थी।"
मैंने अपनी कटोरी रख दी।
"बबलू," मैंने कहा, "तू मेरे साथ चलेगा?"
वो कुछ देर मेरी तरफ़ देखता रहा।
"साहब के खिलाफ़?" उसने पूछा।
"हाँ।"
"मेरी बीवी कहती है कि मैं बदल गया हूँ," बबलू ने कहा। उसकी आवाज़ में वो हल्की हँसी थी जो आदमी अपने आप पर हँसता है। "मैंने उसे कहा — नहीं, मैं वही हूँ। बस अब मुझे पता है कि मैं किसकी तरफ़ खड़ा था।"
उसने कटोरी रखी और उठ खड़ा हुआ।
"चल," उसने कहा।
बिजलीघर का फाटक खुला था — जैसे हमने छोड़ा था, वैसे ही। अंदर घुसते वक़्त हवा बदल गई। बाहर की धूप में जो गरमी थी, वो यहाँ नहीं थी। यहाँ हवा में एक ठंडक थी — सीलन जैसी नहीं, बल्कि उस तरह की जैसे किसी पुराने कमरे में बरसों से हवा न आई हो।
छह बक्से दीवार के साथ खड़े थे।
छठा बक्सा वहीं था। ढक्कन ज़रा खुला। और उसके सामने, धूल में, वो छोटा ज़ंग लगा टिन पड़ा था।
मैं रुक गया।
कल रात मैंने कहा था — इसे वहीं रहने दे। जहाँ यह आया है, वहीं।
पर अब, सुबह की रोशनी में, वो टिन कुछ और लग रहा था। जैसे वो चीज़ नहीं है, कोई दरवाज़ा है। छोटा सा, ज़ंग लगा, आधे नाम वाला दरवाज़ा।
"अंकुश," मीरा ने कहा। वो मेरे पीछे आ गई थी। "तू ठीक है?"
"हाँ," मैंने कहा।
और मैंने हाथ बढ़ाया।
मेरी उँगलियाँ टिन की तरफ़ गईं।
और रुक गईं।
मैंने अपनी आँखों पर विश्वास नहीं किया। मैंने फिर हाथ बढ़ाया। उँगलियाँ टिन की सतह से एक इंच पहले रुक गईं — जैसे हवा अचानक ठोस हो गई हो। जैसे किसी ने वहाँ काँच की पतली परत रख दी हो।
मैंने उँगली से उस जगह को छुआ।
कुछ नहीं था। हवा थी। पर हाथ आगे नहीं गया।
"मीरा," मैंने कहा, "हाथ देख।"
उसने हाथ बढ़ाया। उसकी उँगलियाँ भी वहीं रुक गईं।
"अंकुश," उसने कहा, "यह क्या है?"
"मुझे नहीं पता।"
"मैं छू नहीं पा रही हूँ।"
"मैं भी नहीं।"
काजल ने भी कोशिश की। पापा ने भी। बबलू ने भी।
किसी का हाथ आगे नहीं गया।
और फिर — मुझे कुछ दिखा।
टिन की सतह पर, जैसे टिन नहीं, कोई खिड़की हो।
मैंने अंदर देखा।
टिन के अंदर एक छोटी काग़ज़ की नाव थी। सफ़ेद काग़ज़, मुड़ी हुई, जैसे बरसात के पानी में तैरने के लिए बनाई गई हो। उसके एक कोने से पीतल की चमक आ रही थी — घंटी का टुकड़ा। बहुत छोटा। और उसके पीछे, और अंदर, किसी चीज़ की झलक — जैसे कोई तस्वीर हो, पर बहुत धुँधली।
और तभी मुझे आवाज़ सुनाई दी।
दूर से। बहुत दूर से। जैसे कोई पुरानी गली से आ रही हो।
हँसी।
माँ की हँसी।
वो हँसी जो मैंने बरसों से नहीं सुनी थी। माँ जब हँसती थीं, तो हँसी के बाद एक छोटी सी आवाज़ आती थी — जैसे साँस लेने की आवाज़, बीच में। वो आवाज़ भी थी।
मेरा गला सूख गया।
और फिर पापा की आवाज़ आई। बहुत धीमी। बहुत पुरानी।
"धीरे चला," पापा ने कहा। "धीरे चला। गिरेगा।"
मैं जानता हूँ यह आवाज़। मैं इसे जानता हूँ।
बरसात का दिन था। मैं छह-सात साल का था। पापा की साइकिल थी। मैं उसकी सीट पर खड़ा था और पापा हँस रहे थे और माँ दरवाज़े पर खड़ी होकर हँस रही थी और मैं "छोड़ दो, छोड़ दो" चिल्ला रहा था।
माँ की हँसी। पापा की आवाज़। काग़ज़ की नाव। बरसात।
मेरी आँखें भर आईं।
और मैं उसी पल समझ गया।
यह टिन कोई टिन नहीं है।
यह वो याद है।
यह उस ताले में बंद वो याद है जिसकी चाबी मेरे गले में है।
मैं पीछे हटा। मेरा हाथ काँप रहा था। मैंने अपनी जेब में हाथ डाला और घंटी निकाली। वो गरम थी।
"घंटी," मैंने कहा।
"सुन रही हूँ।"
"यह टिन," मैंने कहा। "इसके अंदर क्या है?"
घंटी ने कुछ देर सोचा। सोचने की आवाज़ कैसी होती है? मुझे नहीं पता। पर मुझे लगा कि घंटी सोच रही है।
"कुछ भी नहीं," उसने कहा। "सब कुछ।"
"यह कैसा जवाब है?"
"जवाब नहीं है," घंटी ने कहा। "सच है।"
मीरा ने झुककर टिन की तरफ़ देखा — छूने की कोशिश नहीं की। बस देखा।
"अंकुश," उसने कहा। "यहाँ कुछ खुरचा है।"
"क्या?"
"साइड में।" उसने उँगली से हवा में इशारा किया — टिन के कोने की तरफ़। "देख।"
मैंने देखा।
टिन की बाजू पर, ज़ंग के नीचे, कोई चीज़ खुरची हुई थी। नाखून से नहीं — किसी नुकीली चीज़ से। धीरे-धीरे, बार-बार।
हरिप्रसाद।
आधा नाम। बाकी ज़ंग खा गया था। पर जो बचा था, वो साफ़ पढ़ा जा सकता था।
"हरिप्रसाद," मैंने धीरे से कहा।
बबलू ने कदम बढ़ाया।
"यही नाम," उसने कहा। "यही नाम साहब ने कहा था। हरिप्रसाद का हिसाब अभी बाकी है।"
मैंने घंटी हाथ में उठाई और उसकी सतह पर देखा। पीतल पर, पुराने निशान के बगल में, कुछ उभरा।
"घंटी," मैंने कहा, "यह याद किसकी है?"
घंटी रुकी।
फिर उसने वो कहा जो मैंने सुना और जिस पर मुझे यक़ीन नहीं हुआ।
"तेरी।"
मैं सुन्न रह गया।
"मेरी?" मैंने कहा। "मेरी याद ताले में बंद है। पर यह टिन — यह हरिप्रसाद का है।"
"हरिप्रसाद का नाम है," घंटी ने कहा। "याद तेरी है।"
"मैं हरिप्रसाद को जानता भी नहीं।"
"अब जानता है।"
मैंने पापा की तरफ़ देखा।
वो वहीं खड़े थे, रेती हाथ में, आँखें टिन पर।
"पापा," मैंने कहा। "यह—"
"मुझे नहीं पता, बेटा," पापा ने कहा। "पर एक बात कहूँ?"
"कहो।"
"जब तक तू उस ताले को नहीं खोलेगा," पापा ने कहा, "तब तक हर याद तुझे इसी तरह मिलेगी। अधूरी। किसी और के नाम के पीछे छिपी हुई।"
मैंने टिन की तरफ़ फिर देखा।
काग़ज़ की नाव। घंटी का टुकड़ा। तस्वीर की धुँधली झलक।
मेरी माँ की हँसी। मेरे पापा की आवाज़। मेरा बचपन।
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