The Mysterious Bell – Chapter 1326
मैंने मीरा की तरफ़ देखा। उसने भैरों काका की तरफ़ देखा। फिर हम दोनों ने बक्से की तरफ़ देखा।
"अंकुश," मीरा ने धीरे से कहा।
"हाँ।"
"यह हमने नहीं माँगा था," उसने कहा।
"पता है," मैंने कहा।
मैंने एक कदम आगे बढ़ाया।
टिन छोटा था — दो हथेली से बड़ा नहीं। ऊपर से ज़ंग ने ऐसा पकड़ा था कि रंग पहचानना मुश्किल था। पर एक कोने पर, बहुत महीन खुरचाई में, कुछ लिखा दिख रहा था।
मैंने झुककर देखा।
एक नाम।
आधा नाम।
और उसके नीचे वो निशान — दो लकीरें और बीच में बिंदु।
मेरे हाथ रुक गए।
"हरिप्रसाद," मैंने धीरे से कहा।
और टिन, मेरी आवाज़ सुनकर, ज़रा सा हिला — इतना ज़रा कि जैसे उसने साँस ली हो।
मीरा ने मेरा हाथ पकड़ा।
"अंकुश," उसने कहा, "इसे अभी मत छू।"
"क्यों?"
"क्योंकि," उसने कहा, "यह हमारी माँग पर नहीं आया। यह खुद आया है। और जो चीज़ खुद आती है, वो पहले कीमत बताती है।"
मैंने घंटी की तरफ़ देखा।
"घंटी," मैंने कहा।
"सुन रही हूँ," घंटी ने कहा। आवाज़ पहले से साफ़ थी, जैसे अंधेरे में कोई दीया जलाया गया हो।
"इसकी कीमत?"
घंटी कुछ देर चुप रही।
फिर उसने कहा, और उसकी आवाज़ में कुछ था जो मैंने पहले कभी नहीं सुना:
"कीमत नहीं।"
"तो?"
"यह तोहफ़ा है," घंटी ने कहा।
मैंने टिन की तरफ़ देखा। छोटा, ज़ंग लगा, आधे नाम वाला।
"किसकी तरफ़ से?" मैंने पूछा।
घंटी ने जवाब नहीं दिया।
बस एक बार बजी — हल्की, थकी हुई, और उस बजने में एक आवाज़ बनी जो मैंने पहले कभी नहीं सुनी थी। जैसे बहुत पुराना आदमी किसी बहुत दूर की गली से एक नाम सुना रहा हो।
और फिर वो चुप हो गई।
मैंने धूल से अपने घुटने झाड़े। मीरा ने मेरी बाँह पकड़ी।
"अंकुश," उसने कहा। "यह टिन हम ले जा रहे हैं?"
मैंने टिन की तरफ़ देखा।
"अभी नहीं," मैंने कहा। "इसे वहीं रहने दे। जहाँ यह आया है, वहीं। अगर इसे हम ले गए और यह किसी का है — तो फिर हम भी उसी हिसाब में आ जाएँगे।"
"फिर?"
"फिर," मैंने कहा, "हम इसे सभा में लाएँगे। जब हरिप्रसाद का नाम सबके सामने लिया जाएगा — तब यह भी अपनी जगह पर आएगा।"
मैंने बक्से की तरफ़ पीठ की और बाहर चल पड़ा।
पर जाते-जाते मैंने एक बार पीछे देखा।
बक्से का ढक्कन ठीक उसी जगह था जहाँ हमने छोड़ा था। टिन भी वहीं था। पर ढक्कन का साया — सूरज की उस पहली किरण में, जो पूरब से आकर बक्से पर पड़ने लगी थी — कुछ अलग था।
साया थोड़ा बड़ा था।
जितना बक्से का नहीं होना चाहिए।
मैं मुड़कर चल पड़ा और मीरा से कहा:
"आज रात सोने से पहले," मैंने कहा, "तू अपने दरवाज़े के नीचे देख लेना।"
"क्यों?"
"क्योंकि," मैंने कहा, "आज से हर दरवाज़े पर कुछ रखा जाएगा। कुछ टूटा हुआ। और हमें तय करना है कि उसे उठाएँगे या नहीं।"
मीरा ने मेरी तरफ़ देखा।
"तू कल सभा में अकेला खड़ा होगा?" उसने पूछा।
"नहीं," मैंने कहा।
"कौन होगा साथ?"
मैंने जेब में हाथ डाला और घंटी निकाली।
वो गरम थी।
"जो सत्तर खर्च कर सके," मैंने कहा, "वो हमेशा नहीं बचता। कभी-कभी खर्च हो जाने के बाद ही असली मालिक मिलता है।"
मीरा ने कुछ नहीं कहा।
बस मेरे साथ चल पड़ी।
और हम जब गली में पहुँचे, तो सूरज पूरा निकल चुका था। पीपल के नीचे चबूतरी सूख रही थी, और अंकुश की बंद पड़ी दुकान के शटर पर सुबह की पहली रोशनी पड़ रही थी।
पर शटर पर, ऊपर के कोने में, कुछ था — एक पतला सा काग़ज़, जो फटा नहीं, गीला नहीं, बस लटका हुआ था।
मैंने दौड़कर उसे उतारा।
उस पर नीली स्याही में लिखा था:
"बक्से से आने वाली चीज़ को उठाना मत। वो तेरी है भी और नहीं भी। और जब वो सभा में जाएगी — तू अपने नाम की जगह उसका नाम बोलेगा।"
मैंने पीछे की तरफ़ देखा।
वहाँ कोई नहीं था। आँगन से माँ की आवाज़ आई:
"अंकुश, चाय बन गई है।"
मैंने वो काग़ज़ जेब में रखा, और घंटी को साथ रखकर अंदर चला गया — यह जानते हुए कि आज सभा में एक और नाम लिया जाएगा।
जो अभी तक किसी ने नहीं लिया।
॥
चाय गरम थी, पर मेरे हाथ ठंडे थे।
माँ ने कटोरी मेरी तरफ़ सरका दी और कहा, "पी। ठंडी हो गई तो फेंक दूँगी।"
मैंने कटोरी उठाई। भाप उठ रही थी। आँगन में सुबह की धूप पीपल की पत्तियों में से छनकर आ रही थी और मिट्टी पर लंबी-लंबी लकीरें बना रही थी।
काजल मेरे सामने बैठी थी और मेरी तरफ़ देख रही थी, जैसे मैं कोई ऐसा काम करने जा रहा हूँ जो वो जानती है और मैं नहीं।
"क्या?" मैंने पूछा।
"कुछ नहीं," उसने कहा। "बस तेरा चेहरा देख रही हूँ।"
"मेरा चेहरा रोज़ ऐसा ही है।"
"नहीं," काजल ने कहा। "आज कुछ अलग है।"
माँ चूल्हे के पास से बोलीं, "अलग क्या है? लड़का सुबह से भूतों की गली से लौटा है, उसका चेहरा अलग ही होगा।"
मैंने चाय पी। गरम थी, और गले से नीचे उतरते वक़्त लगा जैसे किसी ने अंदर कुछ ठीक कर दिया हो।
पापा दरवाज़े के पास बैठे थे। उनके हाथ में वही पुरानी रेती थी और वो उसे बिना देखे रगड़ रहे थे। रगड़ने की आवाज़ आ रही थी — खरखर, खरखर — जैसे कोई बहुत पुरानी बात बार-बार दोहरा रहा हो।
"पापा," मैंने कहा।
उन्होंने सिर उठाया।
"मैं फिर बिजलीघर जा रहा हूँ।"
रेती रुक गई।
माँ ने चूल्हे की तरफ़ से मुड़कर देखा। उनके हाथ में चिमटा था और चिमटे से पानी टपक रहा था।
"अभी?" माँ ने पूछा। "सुबह-सुबह?"
"सभा से पहले," मैंने कहा। "एक बार।"
"क्यों?"
मैंने जेब से वो पतला काग़ज़ निकाला, जो शटर पर लटका मिला था। मैंने उसे माँ की तरफ़ बढ़ा दिया।
माँ ने हाथ पोंछकर पढ़ा। उनके होंठ हिले, पर आवाज़ नहीं निकली। फिर उन्होंने काग़ज़ पापा की तरफ़ बढ़ाया।
पापा ने पढ़ा। फिर उन्होंने काग़ज़ मोड़कर अपनी कमीज़ की जेब में रख लिया।
"यह काग़ज़ मेरे पास रहेगा," उन्होंने कहा।
"पापा—"
"मैंने बाईस साल एक काग़ज़ जेब में रखकर बिताए हैं," पापा ने कहा। "अब एक और रख लूँगा। फ़र्क यह है कि यह वाला मैंने नहीं लिखा।"
काजल ने कटोरी मेज़ पर रखी और उठ खड़ी हुई।
"मैं भी चलूँगी," उसने कहा।
"नहीं।"
"अंकुश—"
"काजल," मैंने कहा, "तू माँ के पास रह।"
"मैं हर बार माँ के पास रहती आई हूँ," उसने कहा। आवाज़ तेज़ थी, पर आँखें गीली थीं। "हर बार। जब तू मंच पर खड़ा था, मैं यहाँ थी। जब घंटी चुप हुई, मैं यहाँ थी। अब मुझे भी जानना है कि उस बक्से के अंदर क्या है।"
माँ ने चिमटा रख दिया।
"ले जा," माँ ने कहा।
"माँ—"
"ले जा," माँ ने दोहराया। "और सुन — तीनों साथ चलो। कोई अकेला नहीं।"
मैंने माँ की तरफ़ देखा। उनका चेहरा वैसा था जैसा बुखार के बाद होता है — पतला, थका हुआ, पर आँखों में वो चीज़ लौट आई थी जो पिछले कुछ दिनों से बुझी हुई थी।
"माँ," मैंने कहा, "तू ठीक है ना?"
"मैं ठीक हूँ," उन्होंने कहा। "और तू सुन — आज सभा में जो भी हो, तेरे पापा तेरे साथ खड़े होंगे। मैं भी आऊँगी।"
"माँ, तेरी दवा—"
"दवा मेरे साथ चलेगी," उन्होंने कहा। "मैं किसी के डर से घर में नहीं बैठूँगी। अब नहीं।"
काजल ने मेरी तरफ़ देखा और कुछ नहीं कहा। उसकी आँखों में वो चीज़ थी जो कह रही थी — देखा? मैंने कहा था ना।
हम निकले।
गली में सुबह का वक़्त था और धूल अभी ठंडी थी। पीपल के नीचे चबूतरी पर कोई नहीं था। शबनम आपा की गुमटी का चूल्हा जल रहा था और धुआँ पतली लकीर बनाकर ऊपर जा रहा था।
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