The Mysterious Bell1325 / 1504

The Mysterious Bell – Chapter 1325

7 min read November 5, 2026

उसने थाली में रखी रोटी नहीं छोड़ी — वो अपनी रोटी अपनी जेब में रखी और कतार से निकल गया। मज़दूरों ने उसे जाते देखा। कुछ ने नज़र नीची कर ली। कुछ ने रणवीर की तरफ़ देखा, और फिर ज़मीन की तरफ़।

हरिप्रसाद दीवार के उस पार चला गया, और परत में उसकी सिर्फ़ परछाईं बची थी — पतली, लंबी, और किसी के पीछे नहीं।

अब रणवीर अकेला था।

वो वहीं बैठा रहा, थाली के पास। उसने पैसे उठाए, गिने, और फिर एक नोट को हवा में उछाला और पकड़ा — जैसे मज़ाक कर रहा हो अपने ही हिसाब से।

और ठीक उसी पल — दीवार की टूटी छाया से कुछ निकला।

मैंने पहले सोचा वो धुआँ है। या धूल का बादल, जो ईंटों के ढेर से उड़ा हो।

पर नहीं।

वो एक परछाईं थी। लंबी। कालेपन में भी इंसान जैसी — पर बिना चेहरे। बिना आँख, बिना नाक, बिना मुँह। बस एक ठंडा साया, जो दीवार से अलग हुआ और चुपचाप रणवीर की तरफ़ बढ़ा।

उसकी चाल में कोई जल्दी नहीं थी। जैसे वो जानती हो कि जगह खाली है। जैसे वो बरसों से इसी पल का इंतज़ार कर रही हो।

और फिर वो रणवीर की पीठ से चिपक गई।

मैंने देखा — रणवीर ठिठका।

एक पल के लिए उसका चेहरा बदला। मुस्कान नहीं गई, पर उसके नीचे कुछ और आ गया — जैसे नींद में कोई चीज़ उसे छू गई हो।

उसने अपना कंधा सहलाया।

फिर वो हँसा।

और मुस्कान वापस आ गई — वही, पूरी, चमकदार, जिससे लोग उससे जुड़ जाते हैं।

पर अब मुझे दिख रहा था।

उस पीठ पर, उस मुस्कान के पीछे, वो ठंडी परछाईं खड़ी थी। चिपकी हुई। रणवीर ने उसे नहीं देखा। रणवीर ने उसे महसूस भी नहीं किया — बस कंधा सहलाया और पैसे गिनने लगा।

मैं चीखना चाहता था।

"रणवीर," मैंने कहना चाहा। "तेरी पीठ पर क्या है?"

मेरी आवाज़ नहीं निकली।

मैंने हाथ खींचा — बक्से से दूर, धुएँ से दूर, उस ठंडी परछाईं से दूर। मेरे हाथ घसीटे जा रहे थे, जैसे किसी ने कलाई में रस्सी बाँध दी हो।

और तभी — कान के बिल्कुल पास, इतनी ठंडी फुसफुसाहट हुई कि जैसे बर्फ़ की सुई अंदर डाल दी गई हो।

एक ही शब्द।

"टूटन।"

मैंने आँखें बंद कर लीं।

और फिर मीरा का हाथ मेरे कंधे पर पड़ा और उसने ज़ोर से खींचा।

"अंकुश!"

परत टूट गई।

मैं घुटनों पर गिरा।

ज़मीन ठंडी थी, धूल भरी थी, और मेरी साँस ऐसी चल रही थी जैसे मैं दौड़कर आया हूँ। मेरे हाथ काँप रहे थे। घंटी मेरी हथेली में दबी हुई थी और वो गरम थी — न जाने कब से।

"अंकुश," मीरा ने कहा, वो मेरे सामने बैठ गई। "देख मेरी तरफ़। देख।"

मैंने उसकी तरफ़ देखा।

"पानी," मैंने कहा।

भैरों काका दौड़कर गए। उनकी लालटेन ज़मीन पर गिरी और लुढ़क गई। मीरा ने अपनी क़मीज़ की बाँह से मेरा माथा पोंछा।

"तू ठीक है," उसने कहा। "तू यहीं है। गली में। बिजलीघर पर।"

"मीरा," मैंने कहा।

"हाँ।"

"वो परछाईं," मैंने कहा।

"कौन सी परछाईं?"

"जो दीवार से निकली," मैंने कहा। "जो रणवीर की पीठ से चिपक गई।"

मीरा कुछ देर मेरी तरफ़ देखती रही। फिर उसने बहुत धीरे से कहा:

"मैंने कुछ नहीं देखा। मैंने सिर्फ़ तुझे देखा। तेरी आँखें बंद हो रही थीं और तेरा हाथ बक्से की तरफ़ खिंच रहा था।"

पानी आया। मैंने पिया। पानी ठंडा था और उसने मेरे भीतर के सूखेपन को थोड़ा कम किया।

मैंने पीछे टेक लगाई और बक्से की तरफ़ देखा।

ढक्कन अब पूरा खुला था। और भीतर — अंधेरा। गहरा, ऐसा अंधेरा जो आँख से नहीं भरता।

"क्या देखा?" भैरों काका ने पूछा। उनकी आवाज़ में डर था, पर वो पूछ रहे थे। यही उनकी आदत थी — डरना अलग, और पूछना अलग।

मैंने साँस ली।

"हरिप्रसाद," मैंने कहा। "मैंने हरिप्रसाद को देखा।"

"क्या हुआ?" मीरा ने कहा।

"उसकी बहन की शादी तय थी," मैंने कहा। "उसने रणवीर से पूरा हिस्सा माँगा। रणवीर ने कुछ पैसे और दिए — जैसे कोई दया कर रहा हो। और हरिप्रसाद ने कहा — यह हिसाब नहीं, धोखा है।"

मैंने रुककर साँस ली।

"और फिर," मैंने कहा, "वो उठकर चला गया। कतार छोड़कर।"

भैरों काका ने अपना सिर नीचा कर लिया।

"बीस साल पहले," उन्होंने धीरे से कहा, "मैंने बिजलीघर पर रात में एक बार रणवीर को अकेले देखा था। वो खुद से बात कर रहा था। मैंने सोचा — पैसों की बात होगी।"

"पैसों की नहीं थी," मैंने कहा।

"क्या थी?"

मैंने उनकी तरफ़ देखा।

"वो ठंडी परछाईं," मैंने कहा। "वो आज भी रणवीर के पीछे चलती है।"

मीरा ने मेरी तरफ़ देखा। भैरों काका तो जैसे जम गए।

"मैंने उसे देखा," मैंने कहा। "दीवार की छाया से निकली। यह नहीं कि झटके से आई — धीरे से आई, जैसे किसी ने बरसों का इंतज़ार किया हो। और रणवीर की पीठ से चिपक गई।"

"और रणवीर?" मीरा ने कहा।

"उसने महसूस किया," मैंने कहा। "एक पल के लिए। कंधा सहलाया। फिर मुस्कुरा दिया।"

मेरी आवाज़ नीचे चली गई।

"उसने उसे देखा नहीं," मैंने कहा। "और मुझे लगता है — उसने उसे कभी देखा ही नहीं। वो उसे लगता है कि वो चीज़ उसकी ताक़त है। वो उसे नहीं जानता कि वो चीज़ उसके पीछे चल रही है।"

भैरों काका ने कुछ कहना चाहा पर आवाज़ नहीं निकली। उन्होंने गला साफ़ किया, फिर बोले:

"अंकुश," उन्होंने कहा, "मैं तुझे एक बात बताता हूँ। बीस साल पहले मैंने रात में एक बार उसकी आवाज़ सुनी थी। वो किसी से बात कर रहा था। मैंने सोचा फ़ोन पर होगा। पर उसकी जेब में फ़ोन नहीं था।"

"क्या कह रहा था?"

"मैं पूरी बात नहीं सुन पाया," उन्होंने कहा। "सिर्फ़ दो शब्द — 'अभी और'। और फिर उसकी हँसी。"

मेरे कान में वो ठंडी फुसफुसाहट फिर गूँजी।

टूटन।

मैंने घंटी अपनी हथेली में दबाई।

"घंटी," मैंने कहा। "वो परछाईं — वो क्या है?"

घंटी ने इस बार जल्दी जवाब दिया। पर आवाज़ छोटी थी।

"जो तेरा है," उसने कहा, "वो जोड़ता है। जो उसका है, वो तोड़ता है।"

"वो रणवीर के साथ क्यों है?"

"क्योंकि," घंटी ने कहा, "उसने रणवीर को चुना। और रणवीर ने उसे अपनी मुस्कान से ढक दिया।"

मैंने माथा हाथ में लिया। मैं थक रहा था। अठारह अंक नहीं थे — मुझे लग रहा था थकान अंकों से नहीं, देखने से आई है।

"मीरा," मैंने कहा।

"हाँ।"

"कल सभा में," मैंने कहा, "मैं हरिप्रसाद का नाम बोलूँगा।"

"तू बोलेगा," उसने कहा। "पर एक बात पूछूँ?"

"पूछ।"

"उस परछाईं का नाम रणवीर को पता है क्या?"

मैंने उसकी तरफ़ देखा।

"नहीं," मैंने कहा। "और यही सबसे डरावनी बात है। वो जिसके पीछे चल रही है, वो उसे जानता ही नहीं। वो समझता है वो उसकी ताक़त है।"

मीरा ने अपनी कॉपी निकाली और कुछ लिखा।

"क्या लिख रही है?" मैंने पूछा।

"लिख रही हूँ," उसने कहा, "कि हरिप्रसाद का नाम कल सिर्फ़ रणवीर के ऊपर नहीं, उस चीज़ के ऊपर भी लिया जाएगा जो उसकी पीठ पर चिपकी है।"

मैंने उसकी तरफ़ देखा।

"तू कहाँ से लाई यह बात?"

"तेरी ही घंटी से सीखी," उसने कहा। "जो जोड़ता है, वो बोलता है। तो जो टूटता है — उसे भी नाम चाहिए।"

और तभी बक्से का ढक्कन चरमराया।

आवाज़ ऐसी थी जैसे बरसों की ज़ंग एक साथ खुल रही हो। हम सब पीछे हटे।

ढक्कन थोड़ा और ऊपर उठा।

और भीतर से — धीरे से, खिसकते हुए — एक छोटा टिन आगे आया।

बस इतना।

कोई आवाज़ नहीं। कोई चमक नहीं। कोई हवा नहीं।

सिर्फ़ एक छोटा टिन का डिब्बा, जो बक्से के अंधेरे से खिसककर किनारे पर आ गया, और वहीं रुक गया — जैसे उसने अपना काम कर दिया हो।

वेबसाइट पर अपनी पसंदीदा कहानियाँ मुफ्त पढ़ें और Story FM App पर उन्हीं कहानियों का शानदार Audio Experience लें।

यह कहानी Story FM app पर ऑडियो में भी सुनें — आगे के एपिसोड सबसे पहले वहीं आते हैं।

Audio mein suno

Apni raay likho