The Mysterious Bell – Chapter 1324
"अंकुश।"
मैं मुड़ा।
पापा दरवाज़े पर खड़े थे। कमीज़ पहन रखी थी, चश्मा कान पर टेप से बँधा हुआ, और हाथ में वो पुराना औज़ार — एक छोटी रिंच, जिसकी चमक बरसों पहले चली गई थी। उन्होंने शायद रात भर सोने की कोशिश की थी और नींद उनके पास भी नहीं आई थी।
"तुम उठ गए?" मैंने कहा।
"आ जा," उन्होंने कहा।
मैं उनके पीछे-पीछे आँगन में आया। भोर की ठंडक पैरों में लग रही थी। पीपल की लालटेन बुझी हुई थी और उसके नीचे की चबूतरी पर ओस जमी थी।
पापा चबूतरी के किनारे बैठ गए। मैं उनके पास बैठ गया।
"मीरा आई थी," उन्होंने कहा। "रात को। जब तू अंदर गया था।"
"क्या कहा?"
"कह गई कि भैरों काका ने खबर भेजी है," पापा ने कहा। "छठे बक्से का ढक्कन ज़रा खुला है। और भीतर से आवाज़ नहीं आ रही।"
मेरे पेट में कुछ ठंडा सा गया।
"खुला है?"
"हाँ," पापा ने कहा। "और भैरों काका कह रहे हैं कि सुबह होते ही तुझे वहाँ आना है। कह रहे हैं — बक्सा चुप है, और यह चुप्पी पहले कभी नहीं हुई।"
मैंने घंटी जेब से निकाली।
"घंटी," मैंने कहा।
कोई जवाब नहीं।
"घंटी," मैंने फिर कहा। "बक्से का ढक्कन खुला है। तुझे कुछ पता है?"
बहुत देर बाद — इतनी देर कि मैंने सोचा अब यह भी चुप हो गई — एक आवाज़ आई। धीमी। जैसे किसी ने बहुत दूर से, बहुत थककर, एक ही शब्द कहा हो।
"देखना।"
"क्या देखना?"
"जो छूट गया," घंटी ने कहा। "पहली परत में वो गया जो रणवीर ने लिया। दूसरी परत में वो देखना जो रणवीर ने दिया।"
"कीमत?"
"सत्तर में शामिल," घंटी ने कहा। "एक ही हिसाब। पर —"
"पर?"
"पर," घंटी ने कहा, "जो देखेगा, वो भूल नहीं पाएगा। और भूला हुआ आदमी सभा में खड़ा नहीं होता।"
फिर वो चुप हो गई।
मैंने पापा की तरफ़ देखा।
"अगर तू नहीं जाना चाहता," पापा ने कहा, "तो मत जा।"
"जाना है," मैंने कहा।
"तो फिर मुझे क्यों देख रहा है?"
मैं हँसा।
"क्योंकि," मैंने कहा, "अब मैं अकेला नहीं हूँ। और यह नई बात है। सोचने में वक़्त लग रहा है।"
पापा ने मेरे कंधे पर हाथ रखा।
"सोचने में वक़्त लगे," उन्होंने कहा, "पर सूरज का इंतज़ार मत कर।"
भोर में मैं और मीरा बिजलीघर की तरफ़ निकले।
मीरा चलते वक़्त ज़्यादा नहीं बोली। उसने अपना कैमरा इस बार घर पर ही छोड़ दिया था — मेरे कहने पर नहीं, अपनी मर्ज़ी से। उसने बस एक छोटी कॉपी और पेंसिल जेब में रखी थी।
"कैमरा क्यों नहीं लाई?" मैंने पूछा।
"क्योंकि यह सबूत नहीं है," उसने कहा। "यह सच है। और सच का काम कैमरा नहीं करता।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा।
"आज तू कुछ ज़्यादा ही समझदार लग रही है," मैंने कहा।
"और तू कुछ ज़्यादा ही चुप," उसने कहा।
"अठारह अंक बचे हैं," मैंने कहा। "चुप रहने में अंक नहीं लगते।"
वो हँसी। फिर हँसी थम गई, और उसने धीरे से कहा:
"अंकुश, कल मंच पर मेरी आवाज़ नहीं निकली थी।"
"पता है।"
"मुझे अपनी आवाज़ वापस चाहिए।"
"मिलेगी।"
"कैसे?"
मैंने बिजलीघर के पुराने बोर्ड की तरफ़ देखा, जो अब आगे पेड़ों के बीच दिख रहा था।
"जब तू किसी की चीख़ नहीं, अपनी बात बोलेगी," मैंने कहा। "बात में चीख़ ज़्यादा देर नहीं टिकती। बात टिकती है।"
भैरों काका फाटक पर हमारा इंतज़ार कर रहे थे। उनके हाथ में फिर वही पुरानी लालटेन थी जो आग के नाम पर बिल्कुल खाली थी।
"आ गए," उन्होंने कहा। "बक्सा चुप है। दो घंटे से।"
"पहले गुनगुनाता था?" मैंने पूछा।
"गुनगुनाता नहीं," भैरों काका ने कहा। "कुछ सा बोलता था। जैसे कोई बुज़ुर्ग रात भर अपने आप से बात करता रहे। पर आज — सन्नाटा।"
मैंने फाटक खोला। छहों बक्से अपनी जगह पर खड़े थे, पर आज एक भी धूल नहीं हिल रही थी। छठे बक्से का ढक्कन ज़रा खुला था — एक हाथ जितना फ़ासला — और उस फ़ासले से बाहर कुछ आ नहीं रहा था।
मैंने घंटी जेब से निकाली।
"मैं छूने वाला हूँ," मैंने कहा।
"अंकुश," मीरा ने कहा।
"मीरा," मैंने कहा। "अगर मैं घसीटने लगूँ, बाहर खींच लेना। खींचते वक़्त यह मत सोचना कि मुझे दर्द हो रहा होगा। बस खींचना।"
"कैसे पता चलेगा कि घसीट रहा है?"
"मेरी आँखें बंद हो जाएँगी," मैंने कहा। "और हाथ पकड़ लेगा।"
मैंने बक्से को छुआ।
पहले कुछ नहीं हुआ।
फिर — हवा ठंडी हो गई। इतनी ठंडी कि साँस दिखने लगी, और उस साँस में एक पुरानी गंध घुली हुई थी। चूना। पसीना। और सुबह की रोटी।
और फिर परत खुल गई।
धूप।
ऐसी धूप जो सिर के ऊपर से सीधी आती हो। ईंटों का ढेर, आधी बनी दीवार, और रेत में गड़े लोहे के सरिये।
एक ठेका। पुराने बाज़ार के बाहर। जहाँ अभी नई बस्ती है।
मज़दूरों की कतार। तीस — पैंतीस आदमी। कुछ ईंट ढो रहे थे, कुछ मसाला मिला रहे थे। और एक तरफ़, थाली में रोटियाँ, और उस थाली के पास बैठे दो जवान आदमी।
एक रणवीर था।
मैंने उसे पहचान लिया। चेहरा अभी इतना सफ़ेद नहीं था, बाल घने थे, पर आँखें — वही। वही हल्की दूरी, वही मुस्कान, जो किसी को अपना बनाती है और किसी को अपनी जगह बताती है।
दूसरा हरिप्रसाद था।
मैंने उसे देखा और मेरा दिल एक पल को रुक गया। हरिप्रसाद पतला था, पर मज़बूत — कंधे चौड़े, बाँहें ईंटों से सधी हुईं, और दाहिने हाथ की उँगली पर सूखे खून वाला पतला कपड़ा बँधा हुआ, जैसा बबलू के बक्से में देखे गए उस पुराने निशान के साथ जाता है।
वो रोटी तोड़ रहा था, पर खा नहीं रहा था।
रणवीर मज़े से खा रहा था।
"हरि," रणवीर ने कहा। "रोटी ठंडी हो रही है।"
"मेरी बहन की शादी तय हो गई है," हरिप्रसाद ने कहा।
रणवीर ने रोटी का टुकड़ा मुँह में रखा और चबाते हुए देखा।
"अच्छी बात है," उसने कहा। "कब?"
"अगले महीने," हरिप्रसाद ने कहा। "और मुझे पूरा हिस्सा चाहिए।"
रणवीर ने चबाना थोड़ा धीमा किया।
"पूरा हिस्सा?" उसने कहा।
"जो बचा है," हरिप्रसाद ने कहा। "इस महीने का भी, और पिछले दो महीने का भी जो तूने रोका है। मुझे पूरा चाहिए।"
रणवीर ने हाथ से मुँह पोंछा।
"हरि," उसने कहा। "तू मेरा साथी है। साथी से मैं हिसाब की बात नहीं करता।"
"तो फिर हिसाब दे दे," हरिप्रसाद ने कहा।
वो वाक्य सीधा था। कोई गुस्सा नहीं, कोई चीख़ नहीं। बस एक आदमी जो अपने हिस्से की बात कर रहा है।
रणवीर ने थाली के पास रखा अपना थैला खोला। उसमें से पैसे निकाले — कुछ नोट, जो मैं दूर से गिन नहीं सका — और हरिप्रसाद की तरफ़ बढ़ा दिए।
"ले," उसने कहा। "तेरी बहन के लिए। मेरी तरफ़ से।"
हरिप्रसाद ने पैसे नहीं छुए।
"यह तेरी तरफ़ से नहीं है," उसने कहा। "यह मेरा ही है।"
"हरि, सुन —"
"मेरा पूरा हिस्सा," हरिप्रसाद ने कहा। "मैंने रात भर ईंटें ढोईं, रणवीर। मेरे हाथ में छाले हैं, और मेरी बहन का घर बस रहा है। मुझे शर्म नहीं आनी चाहिए यह माँगते हुए।"
रणवीर ने उन पैसों में से फिर कुछ निकाले और उनके ऊपर रख दिए।
"अब ले," उसने कहा, और आवाज़ वही मीठी थी। "साथी के हाथ से ज़्यादा मत माँग।"
हरिप्रसाद ने पैसे देखे।
फिर उसने रणवीर की तरफ़ देखा। बहुत देर तक। इतनी देर कि मुझे लगा कुछ नहीं कहा जाएगा।
फिर उसने कहा, और आवाज़ बहुत धीमी थी:
"यह हिसाब नहीं है, रणवीर। यह धोखा है।"
रणवीर मुस्कुराया।
बस मुस्कुराया। कोई जवाब नहीं।
और हरिप्रसाद उठ खड़ा हुआ।
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