The Mysterious Bell – Chapter 1323
और मैंने देखा था — शाम को जब धूल में उसने अपना हिस्सा गिना — तब वो नहीं लड़ा।
वो नहीं लड़ा।
वो सिर्फ़ हँसा।
और अपनी रोटी वाली बात याद रखी।
"माँ," मैंने धीरे से कहा, "मुझे लगता है कि हरिप्रसाद अभी भी इस शहर में है।"
"मुझे भी," माँ ने कहा।
"और मुझे लगता है," मैंने कहा, "कि वो किसी ताले में बंद नहीं है। वो किसी शरीर में बंद है।"
काजल ने मेरी तरफ़ देखा।
"क्या मतलब?" उसने पूछा।
"मतलब —" मैंने कहा और रुक गया।
क्योंकि मेरे दिमाग़ में एक औरत की तस्वीर आई।
कोई औरत, जो किसी दूसरे शहर में नहीं, इसी बस्ती में है। कोई औरत, जिसका कोई नाम नहीं, कोई पता नहीं। बस — बीस साल से एक ऐसी औरत, जिसकी हँसी में कुछ ऐसा है जो रुकता नहीं।
"अंकुश," पापा ने कहा। उनकी आवाज़ में वो सख़्ती थी जो कभी-कभी उनमें आ जाती है। "तू क्या सोच रहा है?"
"मैं सोच रहा हूँ," मैंने कहा, "कि जो आदमी किसी की अस्सी रुपये की मेहनत खा जाए, वो उसकी ज़िंदगी भी खा सकता है।"
कमरे में चुप्पी छा गई।
"और अगर वो हरिप्रसाद की ज़िंदगी खा गया," मैंने कहा, "तो हो सकता है कि हरिप्रसाद अब किसी और की ज़िंदगी में जी रहा हो। किसी ऐसी ज़िंदगी में, जो किसी और के नाम पर लिखी है।"
माँ ने मेरी तरफ़ देखा।
"और वो तीसरा नाम," माँ ने कहा, "जो रजिस्टर में कटा हुआ है — 'मसलन पूर्णिमा' —"
"हो सकता है," मैंने कहा, "कि वो नाम पूरी तरह कटा ही नहीं है। हो सकता है कि वो नाम हरिप्रसाद जैसा हो — एक नाम जिसे रणवीर ने काट दिया, पर मिटाया नहीं।"
"यानी?" काजल ने पूछा।
"यानी," मैंने कहा, "हम शायद कल पूर्णिमा की सभा में एक और आदमी को देखेंगे। एक ऐसा आदमी जिसे रणवीर खुद नहीं बुलाएगा — पर जो खुद बोलेगा।"
माँ ने कॉपी बंद की।
"तो," उन्होंने कहा, "कल तक तैयारी करनी है।"
"हाँ।"
"कैसी?"
मैंने सोचा।
"हरिप्रसाद का नाम लिख दिया," मैंने कहा। "अब उसका उपयोग करना है।"
"कैसे?"
मैंने उनकी तरफ़ देखा।
"सभा में," मैंने कहा। "जब रणवीर मेरे ऊपर झूठ बोलेगा, मैं उससे एक सवाल पूछूँगा। एक ऐसा सवाल जो सिर्फ़ वो जानता है। और वो सवाल होगा — हरिप्रसाद कौन था?"
काजल ने मेरी तरफ़ देखा।
"वो इनकार कर देगा," उसने कहा।
"करेगा," मैंने कहा। "पर एक इनकार में जब आदमी का चेहरा बदले, तो गली समझ जाती है।"
टिंकू, जो अब तक दरवाज़े पर खड़ा सब सुन रहा था, अंदर आया।
"उस्ताद," उसने कहा, "मुझे कुछ काम दो।"
मैंने उसे देखा।
"तू क्या कर सकता है?"
"मैं बच्चों के साथ आज रात अस्पताल के आस-पास जाऊँगा," उसने कहा। "देखूँगा कि कहीं कोई औरत अकेली रहती है, जो बाहर नहीं आती। और कोई बूढ़ा आदमी भी।"
मैंने उसे देखा।
"तू बहुत तेज़ हो रहा है," मैंने कहा।
"आपकी वजह से," उसने कहा।
और मैं हँसा।
फिर मैंने घंटी जेब से निकाली।
वो गरम थी। फिर भी थी।
"घंटी," मैंने कहा। "एक बात कह?"
कोई जवाब नहीं।
"तेरे अंदर अठारह अंक बचे हैं," मैंने कहा। "अगर मैं उन्हें खर्च नहीं करूँगा — तो क्या तुझे कुछ होगा?"
घंटी ने — बहुत देर बाद — धीरे से कहा:
"मैं नहीं। तू।"
"मुझे क्या होगा?"
"अगर खर्च नहीं करेगा," घंटी ने कहा, "तो सूख जाएगा। और सूखा हुआ आदमी कल सभा में खड़ा नहीं हो सकता।"
मैंने उसे जेब में वापस रखा।
"तो कल," मैंने कहा, "कल मैं उसे खर्च करूँगा।"
और फिर मैं कमरे से बाहर निकला, आँगन में।
रात बहुत गहरी थी। पीपल की लालटेन बुझ चुकी थी। गली में एक भी आवाज़ नहीं थी।
पर मुझे कुछ सुनाई दिया।
दूर। बहुत दूर। बस्ती के उस पार। कहीं नई बस्ती के कोने से।
लकड़ी के जूतों की आवाज़।
टक। टक। टक।
धीरे। स्थिर। जैसे कोई बहुत पुराना आदमी चल रहा हो। जिसकी आँखों में वो मुस्कान नहीं थी जो मंच पर होती है। जिसकी जेब में कोई बंडल नहीं था।
केवल हिसाब।
पूरा।
और बदला हुआ।
मैंने आँगन की दीवार पर हाथ रखा।
"हरिप्रसाद," मैंने धीरे से कहा, "जहाँ भी हो — आज रात सुन ले। कल मैं तेरा नाम पूरी गली के सामने बोलूँगा। और यह मैं तुझसे वादा कर रहा हूँ, सिर्फ़ वादा नहीं — हिसाब।"
हवा ने जवाब नहीं दिया।
पर कुछ देर बाद — इतनी धीमी, इतनी पुरानी आवाज़ में कि जैसे मिट्टी के नीचे से कोई बोल रहा हो — मेरे कान में एक हँसी आई।
हल्की। फीकी। थकी हुई।
पर असली।
और उस हँसी के बाद, पीछे से माँ की आवाज़ आई:
"अंकुश, अंदर आ जा। रात बहुत हो गई है।"
मैं मुड़ा।
"आ रहा हूँ, माँ।"
और मैं अंदर चला गया।
पर जाते-जाते मैंने एक बार पीछे देखा।
गली के मुँह पर, दूर, अंधेरे में, एक पतला साया खड़ा था।
लंबा नहीं। मोटा नहीं।
बस — खड़ा।
और उसके हाथ में कुछ था, जो बहुत धीमे से हिल रहा था, जैसे कोई हिसाब वाली कॉपी का पन्ना पलट रहा हो।
मैंने आँखें मलीं।
साया गायब था।
केवल गली थी। खाली। चुप। और उस चुप्पी में एक पुरानी बात छिपी थी — कि हर हिसाब का एक दिन भुगतान होता है।
चाहे अस्सी रुपये का हो।
या बीस साल का।
॥
रात भर मैं सो नहीं पाया।
चारपाई पर करवट बदलता रहा, और हर बार जेब में हाथ डालता तो घंटी मिलती — गरम नहीं, ठंडी भी नहीं। बस ऐसी, जैसे किसी ने उसे हथेली में दबा कर रखा हो और छोड़ दिया हो।
अठारह अंक।
अठारह।
मैंने आँखें बंद करके हिसाब लगाया। सत्तर खर्च हुए परत खोलने में। अठारह बचे। और घंटी कह चुकी थी — खर्च नहीं करेगा तो सूख जाएगा।
सूखा हुआ आदमी सभा में खड़ा नहीं हो सकता।
मैं करवट बदलकर बैठ गया। खिड़की के बाहर आकाश अभी काला था, पर उस कालेपन में वो हल्की सी लालिमा आ गई थी जो भोर से पहले आती है — जब रात अपनी आख़िरी साँस ले रही होती है।
माँ का दरवाज़ा खुला था।
मैं उठकर गया। माँ चारपाई पर लेटी थीं, आँखें बंद, पर साँस अब पहले जैसी नहीं — हल्की और सीधी। काजल पास की चौकी पर बैठी सिर झुकाए सोई थी, हाथ में नर्सिंग की किताब अब भी दबी हुई।
मैंने काजल के कंधे पर हाथ रखा।
वो चौंकी।
"क्या हुआ?" उसने आँखें मलते हुए कहा।
"कुछ नहीं," मैंने कहा। "तू जा, अपनी चारपाई पर सो जा। यहाँ मैं बैठता हूँ।"
"तू खुद सोया भी नहीं," उसने मेरी आँखें देखकर कहा।
"सोया," मैंने कहा।
"झूठ," उसने कहा। "तेरी आँखें बता रही हैं।"
मैं हँस दिया। हल्का। जैसे कोई चोरी पकड़ा गया हो।
"अच्छा," मैंने कहा। "सोया नहीं। सोच रहा था।"
"क्या?"
मैंने जेब से घंटी निकाली। माँ की चारपाई के पास वाली खिड़की से आती हल्की रोशनी में घंटी का पीतल फीका दिख रहा था।
"कल सभा है," मैंने कहा। "और मेरे पास अठारह अंक हैं।"
काजल ने घंटी की तरफ़ देखा।
"तो?"
"तो यही सोच रहा था," मैंने कहा, "कि अगर अठारह अंक खर्च हो गए और कुछ काम न आया — तो जो टूटा है वो जुड़ेगा कैसे?"
काजल कुछ देर मेरी तरफ़ देखती रही। फिर उसने किताब बंद करके चौकी पर रखी।
"अंकुश," उसने कहा, "तू वो काम कर जो तेरे हाथ में है। अंक अपने आप आ जाएँगे।"
"यह तू कह रही है या किताब?"
"मैं कह रही हूँ," उसने कहा। "और अगर तुझे मेरी बात पर भरोसा नहीं है तो माँ से पूछ ले। वो कहेगी — पहले पानी पी, फिर सोच।"
मैं हँसा। और इस बार हँसी अंदर तक गई।
फिर पीछे से पापा की आवाज़ आई।
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