The Mysterious Bell – Chapter 1322
"जी, मालिक," रणवीर ने कहा और हाथ जोड़े।
मालिक चला गया।
और रणवीर — जवान रणवीर — थैला उठाकर एक कोने में बैठ गया। मुझे उस कोने में जाने की ज़रूरत नहीं पड़ी। दृश्य मेरे साथ चला।
उसने थैला खोला। नोट निकाले। गिनने लगा।
मैंने भी गिना — साथ-साथ, मन में।
दस, बीस, पचास, सौ। दो सौ। तीन सौ। और फिर — एक-एक करके — एक ढेर था, ढेर।
थैले में कुल चार सौ बीस थे, वैसे ही जैसे मालिक ने कहा था।
पर रणवीर की उँगलियाँ अलग गिन रही थीं।
उसने दो-दो नोट जोड़े और एक अलग तरफ़ रख दिए। चार नोट। फिर चार और। और फिर उसने एक छोटा बंडल — जो देखकर शायद अस्सी-नब्बे का रहा होगा — उठाकर अपनी नीली शर्ट की जेब में डाल दिया।
चुपचाप।
धूल से.
किसी ने नहीं देखा। मैंने देखा।
वो उठा, थैला हरिप्रसाद की तरफ़ बढ़ाया।
"ले," उसने कहा। "बाँट ले।"
हरिप्रसाद ने थैला पकड़ा, हँसा, फिर बाक़ी दो मज़दूरों को बुलाया। दोनों दूर से आए। एक बूढ़ा, एक जवान।
हरिप्रसाद ने गिनना शुरू किया — सबको बराबर।
पर गिनते-गिनते वो रुका।
उसने एक बार फिर गिना।
फिर रणवीर की तरफ़ देखा।
"यह पूरा नहीं है," उसने कहा। उसकी आवाज़ अभी भी नरम थी, पर हँसी उतर चुकी थी। "चार सौ बीस में से तीन सौ सैंतीस बचे। तेरा हिस्सा भी इसमें है। तो अस्सी-मरब्बे कहाँ गए?"
रणवीर ने धूल झाड़ी।
"हिसाब की गड़बड़ होगी," उसने कहा। "मालिक ने शायद कम दिया।"
"मालिक ने चार सौ बीस कहा था। मैंने सुना।"
"तूने सुना," रणवीर ने कहा। "मैंने गिना।"
हरिप्रसाद कुछ देर चुप खड़ा रहा।
फिर उसने थैला ज़मीन पर रख दिया और रणवीर के सामने आ गया।
"रणवीर," उसने कहा, "मैं तुझसे झगड़ा नहीं कर रहा। मैं सिर्फ़ पूछ रहा हूँ — तेरे हिस्से में भी अस्सी कम आए?"
रणवीर सीधा उसकी तरफ़ देख रहा था।
और फिर — वो मुस्कान आई।
पहली बार।
न हँसी, न गुस्सा। बस — जैसे किसी ने एक दरवाज़ा बंद किया और उसके पीछे जो आदमी था, वो सामने आ गया। आँखें वही थीं, पर उनमें वो सपना नहीं था जो सुबह था। उनमें एक हिसाब था — ठंडा, चिकना, पूरा।
"हरिप्रसाद," रणवीर ने कहा, "तू कल से मेरे साथ नहीं आएगा।"
हरिप्रसाद एक कदम पीछे हटा।
"क्या?"
"तूने मेरी बात मानी थी," रणवीर ने कहा। "बड़े ठेके वाली। अब मैं तुझे बता रहा हूँ — बड़े ठेके में हिसाब बराबर नहीं बँटता। बड़े ठेके में ऊपर वाला पहले खाता है।"
हरिप्रसाद ने उसकी तरफ़ देखा।
"तो तूने अस्सी रुपये मेरे हिस्से से निकाले?"
"मैंने अपने हिस्से से निकाले," रणवीर ने कहा। "पर अभी उसका नाम नहीं है। अभी वो मेरे हाथ में है। कल यह ठेका मेरे नाम पर होगा। और जब वो मेरे नाम पर होगा, तब जो हिसाब होगा, वो मेरा होगा।"
"रणवीर —"
"ठेका मेरे नाम पर है," रणवीर ने कहा, और उसकी आवाज़ अब उतनी ही सीधी थी जितनी सुबह ईंटें गिनते वक़्त थी, "तो हिसाब भी मेरा होगा।"
वो हँसा।
फिर वो दोनों मज़दूरों की तरफ़ मुड़ा।
"तुम दोनों," उसने कहा, "कल से सुबह छह बजे आना। बाबू को कह दूँगा। और तू —" वो हरिप्रसाद की तरफ़ मुड़ा, "आज का हिसाब ले ले। कल से मुझे नई टोली बनानी है।"
और वो वहीं से चला गया।
मैं उस दृश्य में खड़ा रह गया, हाथ-पैर ठंडे।
हरिप्रसाद ज़मीन पर बैठ गया। उसने थैला अपने सामने रखा और उसमें से अपना हिस्सा निकाला — तीन सौ सैंतीस में से जो बचा था, उसका चौथाई। उसने धूल में गिना। धूल में ही उसने उसे अपनी जेब में रखा।
फिर उसने अपना तौलिया उतारा और माथा पोंछा।
और मुझे लगा — वो रो नहीं रहा था।
वो हँस रहा था।
धीरे, फीके, थके हुए — जैसे किसी ने उससे उसकी हँसी छीनकर लौटा दी हो, पर उसकी शक्ल बदल दी हो।
"अच्छा सपना था," उसने धीरे से कहा, "बड़ा ठेका।"
और सूरज ढल गया।
मैंने आँखें खोलीं।
मैं फिर से अपने घर में था। माँ के सामने। कॉपी खुली। पन्ने पर हरिप्रसाद का नाम — मेरी पेंसिल से लिखा हुआ। पर अब उस नाम के नीचे कुछ और था।
दो पतली लकीरें। और बीच में एक बिंदु।
जो निशान पीपल के नीचे, चूल्हे के पीछे के दरवाज़े पर, बिजलीघर के बक्से पर — वही निशान।
और उस निशान के नीचे एक और लाइन, जो मेरी लिखाई में नहीं थी, माँ की लिखाई में भी नहीं थी, पेंसिल की भी नहीं थी — जैसे किसी ने लिखा हो जिसकी कोई लिखाई ही न हो।
वो लाइन कह रही थी — अब वो तेरा नाम बोलेगा।
मेरी उँगलियाँ काँपने लगीं।
"का… क्या हुआ?" काजल ने पूछा।
मैंने कॉपी उसे दिखाई।
काजल ने देखा, फिर पीछे हट गई।
"यह किसने लिखा?" उसने पूछा।
"कोई नहीं," मैंने कहा। "कुछ ऐसा है, जो लिखने की ज़रूरत नहीं रखता।"
माँ ने मेरी तरफ़ देखा।
"क्या देखा?" उन्होंने पूछा। "तू आँखें बंद करके बैठा था। क्या देखा?"
मैंने उनकी तरफ़ देखा।
और मैंने उन्हें बताया।
पूरा।
जवान रणवीर। नीली शर्ट। ईंटों की गिनती। एक ही थाली में रोटी। सपना। अस्सी रुपये। वो मुस्कान। वो लाइन।
माँ ने सब सुना। बीच में एक बार भी नहीं रोका।
और जब मैं ख़त्म हुआ, तो उन्होंने आँखें बंद कर लीं और कुछ देर चुप बैठी रहीं।
"तो यह शुरूआत थी," उन्होंने धीरे से कहा।
"हाँ।"
"अस्सी रुपये से शुरू हुआ," माँ ने कहा। "और भारद्वाज कंस्ट्रक्शन बना।"
"हाँ।"
"और हरिप्रसाद?"
मैंने कॉपी की तरफ़ देखा।
"घंटी कह रही है कि अब वो मेरा नाम बोलेगा," मैंने कहा। "मतलब वो अब भी कहीं है।"
"या उसका हिसाब अब भी कहीं है," माँ ने कहा।
मैंने घंटी जेब से निकाली।
वो गरम थी।
"घंटी," मैंने कहा। "मुझे बता। हरिप्रसाद कहाँ है?"
घंटी चुप रही।
"बोल," मैंने फिर कहा।
कोई आवाज़ नहीं आई।
"अंकुश," पापा ने धीरे से कहा, जो अब तक दरवाज़े पर खड़े सब सुन रहे थे। "घंटी हर बात का जवाब नहीं देती। वो इशारा देती है। बाकी हमें ढूँढ़ना पड़ता है।"
मैंने घंटी को अपने माथे पर रखा।
और फिर — इतना धीमा, इतना टूटा हुआ — जैसे कोई बहुत दूर से, किसी पुराने कुएँ के अंदर से बोल रहा हो —
"बंद है।"
दो शब्द।
बस।
"बंद है," मैंने दोहराया। "मतलब?"
घंटी चुप।
"कहाँ बंद है?"
कुछ नहीं।
मैंने घंटी को वापस जेब में रखा।
"माँ," मैंने कहा, "मुझे एक बात समझ नहीं आई।"
"क्या?"
"यह दृश्य मुझे क्यों दिखाया गया?" मैंने पूछा। "मेरे पास सत्तर अंक थे — बक्से पर खर्च कर दिए। पर जो दिखा, वो तो सिर्फ़ रणवीर का पहला गुनाह है। यह तो मुझे मालूम होना चाहिए था। रणवीर ठग है। यह नई बात नहीं।"
माँ ने कॉपी की तरफ़ देखा।
"क्योंकि," उन्होंने कहा, "तूने हरिप्रसाद का नाम लिखा।"
"तो?"
"और बक्से ने दिखाया कि हरिप्रसाद कौन था," माँ ने कहा। "तुझे लगता है कि सत्तर अंक सिर्फ़ रणवीर का गुनाह दिखाने में खर्च हुए?"
मैंने उनकी तरफ़ देखा।
"तूने क्या देखा, अंकुश?" माँ ने पूछा। "सिर्फ़ रणवीर का चेहरा? या कुछ और भी?"
मैंने सोचा।
और फिर मुझे एहसास हुआ।
मैंने सिर्फ़ रणवीर का चेहरा नहीं देखा था।
मैंने हरिप्रसाद की हँसी देखी थी।
मैंने देखा था कि वो कैसे ईंटों पर झुककर रोटी बाँटता था। मैंने देखा था कि उसकी बीवी रोटी बनाती थी और वो रणवीर को खिलाता था। मैंने देखा था कि जब रणवीर ने कहा था "मैं बड़ा ठेकेदार बनूँगा," तो हरिप्रसाद ने हँसकर कहा था "बड़ा हो या छोटा, हिसाब साफ़ रहे।"
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