The Mysterious Bell – Chapter 1321
"इसमें लिख," उन्होंने कहा।
"क्या?"
"हरिप्रसाद।"
मैंने देखा। कॉपी के आख़िरी पन्ने पर, सबसे नीचे, माँ की साफ़ लिखाई में अभी भी जगह थी।
"पर घंटी ने कहा था, कॉपी में मत लिखना," मैंने कहा"पर घंटी ने कहा था, कॉपी में मत लिखना।"
माँ ने मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखों में थकान थी, पर उस थकान के पीछे कुछ जल रहा था — धीमी, स्थिर लौ।
"घंटी ने यह भी कहा था कि जो लिखेगा, वो मिटेगा नहीं," माँ ने कहा।
"हाँ।"
"तो फिर, बेटा," उन्होंने कहा, "जो मिटता नहीं, वो सबसे ताक़तवर चीज़ होती है। और हरिप्रसाद का नाम — उसकी मेहनत, उसकी रोटी, उसकी हँसी — सब मिट गया। क्योंकि किसी काग़ज़ में वो लिखा ही नहीं था।"
मैं कुछ देर चुप बैठा रहा।
काजल ने मेरी तरफ़ देखा। टिंकू ने दरवाज़े से।
"अंकुश," माँ ने फिर कहा, "मैंने बाईस साल अपनी कॉपी में एक-एक नाम लिखा है। इसीलिए हम ज़िंदा हैं। जिसका नाम लिखा है, वो मिटता नहीं। जिसका नाम नहीं लिखा, वो सिर्फ़ चुप है। हरिप्रसाद चुप है। बहुत बरसों से चुप है।"
मैंने पेंसिल उठाई।
घंटी जेब में पड़ी थी। मेरी उँगलियाँ उसके पास गईं — ठंडी थी, और मैंने फिर उसका काँपना महसूस किया, जैसे कोई जगे और फिर चुप हो जाए।
"मैं लिख रहा हूँ," मैंने कहा।
और मैंने कॉपी के आख़िरी पन्ने पर, सबसे नीचे, माँ की लिखाई के ठीक नीचे अपनी पेंसिल से लिखा —
हरिप्रसाद।
तीन अक्षर, थोड़े टेढ़े, पर साफ़।
और फिर, मेरे हाथ को रोकने की ज़रूरत नहीं पड़ी — क्योंकि कुछ होने लगा।
कॉपी का पन्ना हल्का गरम हुआ। काग़ज़ की वो साधारण गंध बदल गई — अब उसमें धूल थी, पसीना था, ईंटों की राख थी, और बहुत दूर से आती हुई किसी चूल्हे की गंध थी।
मैंने पेंसिल रख दी।
मैंने आँखें बंद कर लीं।
और वो सूरज खुल गया।
पुराना सूरज।
भोपाल की पुरानी बस्ती से थोड़ा बाहर, नई बस्ती के उस कोने में — जहाँ आज भारद्वाज भवन खड़ा है — उन दिनों कुछ नहीं था। सिर्फ़ खुली ज़मीन, लाल मिट्टी, और उस पर एक बड़ा ठेका। नींव खोदी जा रही थी। दो मंज़िल का मकान बनने वाला था। चारों तरफ़ ईंटों की चट्टानें पड़ी थीं और दूर-दूर तक सिर्फ़ लाल धूल उड़ रही थी।
तीस साल पहले का सूरज था।
और उस सूरज के नीचे, एक दुबला-पतला लड़का — कोई बीस-बाईस साल का — ईंटें गिन रहा था।
नीली शर्ट। आधी आस्तीन। जेब फटी हुई, घुटने पर धूल, बाल पसीने से भीगे हुए। चेहरा वही, पर आँखों में वो ठंडक नहीं थी जो आज है। आज की आँखें गिनती करती हैं, और वो आँखें सपने देख रही थीं।
जवान रणवीर।
मेरे सामने वो चल रहा था, पर मुझे नहीं देख रहा था। मैं उस दृश्य में उसके साथ खड़ा था, और उसे पता भी नहीं था।
वो एक-एक ईंट उठाकर एक ढेर से दूसरे ढेर पर रख रहा था और ज़ोर से गिन रहा था — "एक सौ सत्तावन, एक सौ अठावन…"
"अरे, गिनती भूल जाएगी," किसी की हँसती आवाज़ आई।
रणवीर ने पीछे देखा।
एक आदमी आ रहा था — मोटा नहीं, दुबला भी नहीं। मझोला। चेहरा गोल, मुँछें कुछ मोटी, आँखों में एक अजीब सी हँसी जो रुकती नहीं थी। उसने अपने सिर पर एक फटा तौलिया रखा हुआ था और कंधे पर एक बोरी टँगी थी। वो भी नीली शर्ट में था, पर उसकी शर्ट धोकर फीकी पड़ गई थी।
"हरिप्रसाद," रणवीर ने कहा। उसकी आवाज़ में झिझक नहीं थी। "मैं ईंटें गिन रहा हूँ, गिनती नहीं भूलूँगा।"
"क्यों गिन रहा है?"
"क्योंकि ठेकेदार कहेगा, तूने ज़्यादा ईंटें नहीं उठाईं। तब मैं गिनकर बताऊँगा।"
हरिप्रसाद हँसा।
और उसकी हँसी में कुछ अजीब था। कुछ ऐसा जो इस सूरज से, इस धूल से, इन ईंटों से — बिल्कुल बाहर का नहीं लगता था। जैसे वो इस ज़मीन पर पैदा ही मुस्कुराने के लिए हुआ हो।
"तू हिसाब रखता है," उसने कहा। "अच्छी बात है। पर अगर हिसाब रखेगा, तो दिल में भी साफ़ रखना पड़ेगा। वरना हिसाब और दिल दोनों गड़बड़ा जाते हैं।"
"क्या मतलब?"
"कुछ नहीं," हरिप्रसाद ने कहा और उसके साथ ईंटें उठाने लगा। "बस, मैंने सुना है — जो आदमी हिसाब रखता है और दिल साफ़ रखता है, वो आगे बहुत बड़ा बनता है।"
रणवीर रुका।
"तू मेरी बात मानेगा?" उसने पूछा।
"मानेगा क्या," हरिप्रसाद ने कहा। "तू कहेगा, मैं सुनूँगा।"
"मैं एक दिन बड़ा ठेका लूँगा," रणवीर ने कहा। उसकी आवाज़ में कुछ सपना भरा था, जो सच में सपना था — उसमें हिसाब नहीं था, सिर्फ़ उम्मीद थी। "अपना ठेका। अपने मज़दूर। अपना नाम — बड़ा, पत्थर पर खुदा हुआ।"
हरिप्रसाद ने ईंट रखी और उसकी तरफ़ देखा।
"अच्छा सपना है," उसने कहा। "पर सुन।"
"क्या?"
"ठेका बड़ा हो या छोटा — हिसाब साफ़ रहे। यही सबसे बड़ी बात है। बड़ा ठेका आ जाए तो आ जाए, पर जब रोटी बाँटे, तो बराबर बाँटे। और जब हिसाब दे, तो ईमान से दे।"
रणवीर हँसा।
"तू मुझे उपदेश दे रहा है?"
"नहीं," हरिप्रसाद ने कहा, "थाली में रोटी दे रहा हूँ।"
और उसने अपनी झोली से एक थाली निकाली। पीतल की नहीं, स्टील की — किनारे पर टेढ़ी, फटी। उसमें तीन रोटियाँ थीं, कुछ कच्ची प्याज़, और कुछ सूखा अचार।
रणवीर ने बिना पूछे हाथ बढ़ाया।
और उस सूरज के नीचे, उस लाल धूल में, दो आदमियों ने एक ही थाली में रोटी तोड़ी।
रणवीर ने पहला टुकड़ा उठाया और मुँह में डाला।
"तेरी रोटी अच्छी है," उसने कहा।
"मेरी बीवी बनाती है," हरिप्रसाद ने कहा। "कहेगी — तू हर दिन किसी और को खिलाता है।"
"तो तू कहना — रणवीर भाई हैं। वो अपने हैं।"
हरिप्रसाद ने उसकी तरफ़ देखा, और उसकी आँखों में जो चमक आई, वो अंकुश की जानी-पहचानी नहीं थी। वो एक ऐसे आदमी की चमक थी जो मानता है कि दुनिया में ऐसे लोग भी होते हैं जिन्हें भाई कह सकते हैं।
"अच्छा," उसने कहा। "तो फिर एक बात मान ले।"
"क्या?"
"अगर तू एक दिन बड़ा ठेकेदार बने, तो मुझे अपने साथ रखना। मैं तेरे लिए हिसाब रखूँगा। ईमान से।"
रणवीर ने तीन रोटियों के बीच से एक टुकड़ा उठाया।
"रखूँगा," उसने कहा।
और उस पल — उस सूरज के नीचे, उस धूल में — मुझे लगा कि यह आदमी बाद में जो बना, वो शायद किसी और ने बनाया। शायद उस वक़्त यहाँ जो रणवीर बैठा था, वो सच में बड़ा ठेकेदार बनना चाहता था, और हरिप्रसाद उसका साथी था।
पर सूरज ढलता है।
और सूरज के साथ कुछ और भी ढलता है।
शाम को पाँच बजे के आस-पास एक बूढ़ा मालिक आया। साइकिल पर। हाथ में एक मोटा भूरा थैला। उसका चेहरा कठोर था, पर उसने रणवीर को देखकर हल्की मुस्कान दी।
"अच्छा काम किया," उसने कहा। "पूरे हफ़्ते का। चार मज़दूर। चार सौ बीस। तेरे हाथ में दे रहा हूँ। तू बाँट लेना।"
थैला रणवीर के हाथ में आया।
वो भारी था।
हरिप्रसाद दूर खड़ा था, हाथ में छोटी कुदाल, चेहरे पर वही हँसी। उसे कुछ पता नहीं था। उसे कोई शक नहीं था। वो सिर्फ़ इंतज़ार कर रहा था कि रणवीर थैला खोले और सबको उसका हिस्सा दे।
मैं वहाँ खड़ा था, और मैंने रणवीर का चेहरा देखा — ज़मीन पर पड़ी ईंटों की तरफ़ देखते हुए, जैसे गिन रहा हो।
वो मालिक से मुड़ा।
"मालिक," उसने कहा, "एक बात पूछूँ?"
"पूछ।"
"मज़दूरी के नोट… पुराने हैं या नए?"
मालिक हँसा।
"नए," उसने कहा। "बैंक से निकाले। चले जाना। और हाँ — अगले हफ़्ते दूसरी मंज़िल शुरू होगी। पूरा दिन काम। दिन में पंद्रह घंटे। सब मज़दूर आएँ। तू साथ लेकर आइयो।"
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