The Mysterious Bell – Chapter 1320
घंटी कुछ देर चुप रही।
फिर बहुत धीमे से बोली:
"नाम किसी काग़ज़ में नहीं।"
"मतलब?"
"मतलब जो सबसे ज़्यादा बोलता है, वो सबसे ज़्यादा गायब है।"
पापा ने मेरा हाथ पकड़ लिया। "बेटा, ये सब कल। तू अभी ठीक नहीं है। ये परत तुझे कितना खा गई…"
"पापा, एक बात पूछूँ?" मैंने कहा। "क्या आपने आज से पहले रणवीर का नाम कभी हरिप्रसाद के साथ सुना?"
पापा ने सोचा। उनका चेहरा बदला। फिर वो बोले, "नहीं। पर…" वो रुके।
"पर?"
"पर एक बार," पापा ने कहा, "बाईस साल पहले, जब मैं उसके दफ़्तार गया था — तब उसकी मेज़ पर एक पुरानी तस्वीर थी। दो लड़के। दोनों हँस रहे थे। मैंने पूछा तो उसने तस्वीर उलट दी और कहा — पुराना वक़्त है।"
मेरे हाथ की मुट्ठी फिर बंद हो गई।
"तो तस्वीर थी," मैंने कहा। "मतलब वो आदमी सच में था। और उसका नाम हरिप्रसाद है। और अगर उसका नाम किसी काग़ज़ में नहीं है, तो इसका मतलब उसे काग़ज़ों से मिटाया गया है। एक आदमी को मिटाया गया। नाम से, हिसाब से, तस्वीर से।"
बबलू ने धीरे से कहा, "मैंने सुना था।"
सबने उसकी तरफ़ देखा।
"मैंने सुना था," उसने दोहराया। "साहब के पुराने मुनीम कभी-कभी शराब पीकर बोलते थे। वो कहते थे कि साहब का पहला साथी था। एक हँसमुख आदमी। फिर वो गायब हो गया। मैंने उस वक़्त सोचा था बूढ़ा बकवास कर रहा है।"
"क्या नाम लिया था उन्होंने?" मीरा ने पूछा।
बबलू ने सोचा। फिर उसका चेहरा पीला पड़ गया। "मुझे नहीं याद," उसने कहा। "पर याद है कि जब भी वो नाम लेते, साहब का चेहरा बदल जाता था। और अगले ही दिन वो मुनीम की छुट्टी कर देते थे।"
मैंने आँखें बंद कीं।
मेरे सामने वो दृश्य बार-बार चल रहा था। हरिप्रसाद का गोल चेहरा। उसकी आवाज़ में वो हल्की शरारत। छप्पर के नीचे एक थाली। आधी रोटी सरकाते हुए उसके हाथ। और रणवीर की वो मुस्कान।
"मुझे एक बात समझ नहीं आ रही," मीरा ने कहा। "अगर उसके साथ इतना बड़ा अन्याय हुआ, तो उसकी आवाज़ कहाँ है? उसका गुस्सा कहाँ है? पूरी गली में सिर्फ़ रणवीर की आवाज़ है।"
मैंने अपना हाथ बक्से पर फिर रखा। धीरे से, सिर्फ़ उँगलियों की पोरों से।
"घंटी," मैंने कहा, "वो बक्से के अंदर क्यों है?"
घंटी चुप रही।
"घंटी?"
"क्योंकि," घंटी ने कहा, "वो अंदर है और बाहर वाला नहीं जानता कि वो अंदर है।"
मुझे ठंड लगी।
मैंने अपना हाथ वापस खींच लिया।
"ये बात समझ नहीं आई," बबलू ने कहा। "साफ़ बोल।"
"मतलब," मैंने कहा, अपनी आवाज़ को सँभालते हुए, "बक्से ने उस आदमी को खाया नहीं। बक्से ने उसे रख लिया। और जो बक्से में रखा जाता है, वो दुनिया से गायब हो जाता है। न उसका नाम बचता है, न उसकी तस्वीर, न उसका हिसाब। सिर्फ़ उसका एहसास बचता है — किसी और के अंदर।"
मैंने रणवीर का चेहरा याद किया — आज वाला। सफ़ेद कुर्ता, हाथ जोड़े, मुस्कान। और मुझे लगा कि उस मुस्कान के नीचे कहीं वो लड़का अब भी खड़ा है, उसी आधी दीवार के पास, वो बंडल जेब में डालकर आसमान देखते हुए।
"उसे खुद नहीं पता," मैंने कहा। "वो सोचता है कि उसने एक आदमी को हराया था। पर असल में उसने अपना आधा हिस्सा उस बक्से में गिरवी रख दिया। और अब वो अपना पूरा नाम बचाने के लिए हर साल कुछ टूटता हुआ माँगता है।"
पापा ने अपना हाथ मेरे सिर पर रखा।
"बेटा," उन्होंने कहा, "ये हिसाब बहुत बड़ा है। तू आज इसे पूरा मत कर।"
"पापा, मैं इसे पूरा नहीं करूँगा तो कोई और करेगा?"
"मैं करूँगा," पापा ने कहा।
मैंने उनकी तरफ़ देखा।
उनका चेहरा थका हुआ था, पर आँखें साफ़ थीं।
"बाईस साल मैंने इस हिसाब से मुँह छिपाया," उन्होंने कहा। "अब मैं इसे आधा नहीं छोड़ूँगा। हरिप्रसाद का नाम भी मेरे साथ ढूँढा जाएगा।"
और तभी बक्से से आवाज़ आई।
किसी मशीन की नहीं। किसी धातु की नहीं।
किसी आदमी की।
बहुत धीमी, बहुत थकी हुई, जैसे किसी ने बरसों बाद पहली बार अपना गला साफ़ किया हो।
"हि…"
बस इतना।
फिर चुप।
मेरे रोंगटे खड़े हो गए। मीरा ने मेरा हाथ पकड़ लिया। भैरों काका ने लालटेन ऊपर उठाई, जैसे बक्से के अंदर देखना चाहते हों।
"घंटी," मैंने कहा, "वो क्या था?"
घंटी ने बहुत देर बाद जवाब दिया।
"वो नाम है," उसने कहा। "जो किसी काग़ज़ में नहीं लिखा, वो अंदर से बोलता है।"
मैंने अपना हाथ बक्से से हटा लिया।
और मैंने देखा — बक्से के ठीक सामने, धूल में, मेरे ही घुटनों के निशान के बगल में, एक और निशान था। छोटा। बच्चे के पैर जैसा। ताज़ा।
जैसे कोई अभी-अभी वहाँ से उठकर गया हो।
मैंने पीछे देखा। दरवाज़ा बंद था।
"किसी ने कुछ सुना?" मैंने पूछा।
"क्या?" बबलू ने कहा।
"कुछ नहीं," मैंने कहा, और अपनी आवाज़ को सँभाला। "चलो, बाहर चलते हैं।"
हम बाहर निकले। बिजलीघर के बाहर हवा ठंडी थी और आसमान में तारे साफ़ दिख रहे थे। भैरों काका ने लालटेन बुझा दी, क्योंकि अब चाँदनी काफ़ी थी।
पापा मेरे पास आकर खड़े हुए।
"कुछ और देखा तूने?" उन्होंने धीरे से पूछा। "जो तूने सबको नहीं बताया?"
मैंने एक पल सोचा।
"हाँ," मैंने कहा। "हरिप्रसाद की छोटी उँगली पर कपड़ा बँधा था। कटी हुई थी।"
पापा ने मेरी तरफ़ देखा।
"वो निशान," उन्होंने कहा। "अधूरी उँगली वाला।"
"हाँ।"
दोनों चुप हो गए।
फिर पापा ने कहा, "तो वो हाथ इसलिए हर जगह है।"
"क्योंकि वो आदमी हर जगह है," मैंने कहा। "हमने बस उसे देखना बंद कर दिया था।"
हम गली की तरफ़ चले।
रास्ते में मीरा मेरे बगल में आ गई।
"अंकुश," उसने कहा, "एक बात कहूँ?"
"कहो।"
"अगर हरिप्रसाद का नाम किसी काग़ज़ में नहीं है," उसने कहा, "तो यह हमारे लिए सबसे बड़ा हथियार है।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा।
"क्यों?"
"क्योंकि रणवीर का पूरा साम्राज्य काग़ज़ों पर खड़ा है," उसने कहा। "और जिस आदमी का नाम किसी काग़ज़ में नहीं, वो किसी मुहर, किसी अंगूठे, किसी वकील से नहीं डरता।"
मैंने सोचा।
"पर वो भी किसी को नहीं मिल रहा," मैंने कहा।
"मिलेगा," मीरा ने कहा। "अगर वो बक्से के अंदर है, तो उसे खोलने पर मिलेगा।"
"और अगर वो बक्से के अंदर नहीं है?"
मीरा कुछ देर चुप रही।
"तो वो कहीं और है," उसने कहा। "और जहाँ भी है, वो हमारी आवाज़ सुन रहा है।"
घर पहुँचते-पहुँचते रात गहरी हो गई थी।
माँ चारपाई पर बैठी थीं। बुखार उतरा हुआ था, पर चेहरा पीला। काजल उनके पास बैठी थी और टिंकू दरवाज़े पर खड़ा हमारा इंतज़ार कर रहा था।
"देर हो गई," माँ ने कहा। उनकी आवाज़ में शिकायत नहीं थी, सिर्फ़ थकान।
"माफ़ करना," मैंने कहा और उनके पास बैठ गया।
"क्या मिला?" उन्होंने पूछा।
मैंने पापा की तरफ़ देखा। पापा ने हल्का सा सिर हिलाया।
तो मैंने सब कुछ बताया।
हरिप्रसाद। एक थाली। छप्पर। वो बंडल। वो मुस्कान। वो लाइन।
माँ ने सब सुना। बीच में एक बार भी नहीं रोका।
और जब मैं ख़त्म हुआ, तो उन्होंने सिर्फ़ इतना कहा:
"तो रणवीर ने अपना पहला हिसाब किसी गरीब का हिस्सा काटकर शुरू किया।"
"हाँ।"
"और वो आदमी अब भी उसके पास है," माँ ने कहा। "किसी ताले में। किसी बक्से में। किसी काग़ज़ के नीचे।"
"लगता है।"
माँ ने अपनी कॉपी उठाई — वो पुरानी हिसाब वाली कॉपी, जिसमें उन्होंने बाईस साल का सच लिखा था — और उसे खोलकर मेरी तरफ़ बढ़ाया।
वेबसाइट पर अपनी पसंदीदा कहानियाँ मुफ्त पढ़ें और Story FM App पर उन्हीं कहानियों का शानदार Audio Experience लें।
यह कहानी Story FM app पर ऑडियो में भी सुनें — आगे के एपिसोड सबसे पहले वहीं आते हैं।
Audio mein suno