The Mysterious Bell – Chapter 1319
"बढ़िया। फिर?"
रणवीर ने जेब से कुछ नहीं निकाला। उसने थैला खोला। थैले में अब भी कुछ बंडल थे। उसने वो रखे और बोला, "पहले बाईस सौ। बाकी अगले हफ़्ते।"
"बाईस सौ?" हरिप्रसाद ने पहले तो सिर्फ़ एक बार पलक झपकाई, जैसे किसी ने हल्का सा ग़लत नाम बोल दिया हो। फिर उसने उँगलियों पर गिनना शुरू किया। "मेरा हिस्सा… एक हिस्सा तेरा, एक हिस्सा मेरा, फिर मज़दूरों की मज़दूरी, अरे रुक…"
वो उठा।
"रणवीर, इसमें कुछ गड़बड़ है।"
"कहाँ?"
"मेरा हिस्सा कम है। पिछले हफ़्ते भी कम था। मैंने उस दिन कुछ नहीं कहा, क्योंकि सोचा सामान का खर्चा होगा। पर आज सामान का खर्चा पहले ही कट गया था। ये हिसाब मेरे हिसाब से मेल नहीं खा रहा।"
रणवीर ने उसकी तरफ़ देखा।
और यहाँ — यहाँ मैंने वो मुस्कान पहली बार देखी।
मैंने रणवीर को कितनी बार मुस्कुराते देखा है? बच्चों को टॉफ़ी देते हुए। मंच पर हाथ जोड़ते हुए। टीवी पर कंबल बाँटते हुए। काग़ज़ों में हस्ताक्षर करते हुए। वो मुस्कान हमेशा एक जैसी नहीं होती थी। कभी वो थोड़ी मीठी होती थी, कभी थोड़ी धीमी, कभी थोड़ी जैसे किसी तस्वीर के लिए बनाई गई हो।
पर यह मुस्कान किसी तस्वीर के लिए नहीं थी।
यह मुस्कान अंदर से आई थी — और उसमें कुछ गरम नहीं था। यह एक ऐसी मुस्कान थी जो कहती है — मैं तुझे जानता हूँ, तू मुझे जानता है, और हम दोनों जानते हैं कि अब क्या होने वाला है।
"हरि," रणवीर ने कहा, बहुत धीमे। "तेरे हिसाब से मेल नहीं खा रहा?"
"नहीं।"
"इसमें तेरा नाम कहाँ है?"
हरिप्रसाद एक पल के लिए चुप हो गया।
"क्या मतलब?"
"मतलब साफ़ है," रणवीर ने कहा और उसने अपना हाथ कमर पर रख लिया, "ये ठेका मेरे नाम पर है। मालिक से बात मैं करता हूँ। काग़ज़ पर अंगूठा मेरा लगता है। मज़दूरों को मैं लाता हूँ, हटाता हूँ। तू साथ देता है — इसका मतलब ये नहीं कि हिसाब भी तेरा होगा।"
हरिप्रसाद ने एक कदम पीछे रखा।
"रणवीर, हम दोनों ने…"
"दोनों ने क्या किया?" रणवीर ने कहा। "तूने मेरे साथ सीमेंट ढोई। मैंने भी अपने साथ ढोई। मैं तुझे तेरी मज़दूरी दे रहा हूँ। कम क्यों है — ये मैं तुझे समझा दूँगा। ज़रूरत से ज़्यादा बोलने की आदत है तुझे।"
"मैं ज़रूरत से ज़्यादा नहीं बोल रहा," हरिप्रसाद ने कहा। उसकी आवाज़ बहुत धीमी थी। उसमें कोई चिल्लाहट नहीं थी। "मैं सिर्फ़ हिसाब पूछ रहा हूँ। मैंने बीस साल से तेरे साथ…"
"बीस साल?" रणवीर हँसा। वो हँसी भी वैसी ही थी — अंदर से खाली। "बीस साल में मैंने तुझे खाना दिया, कपड़ा दिया, तेरी बीवी की दवा के लिए पैसा दिया। बीस साल का हिसाब तो मैं बाद में माँगूँगा।"
मैं वहाँ खड़ा था और मेरी मुट्ठी बंद हो गई थी। मैंने उसे चिल्लाना चाहा — हरि, यह आदमी तेरी रोटी खाता है, तू इसे अपनी थाली से खिलाता है — और फिर मुझे याद आया कि मैं वहाँ था भी तो नहीं।
हरिप्रसाद ने एक लंबी साँस ली।
"अच्छा," उसने कहा।
बस — अच्छा।
और वो शब्द किसी गाली से ज़्यादा ज़ोर से मारा।
"मैं तेरी मज़दूरी लेता हूँ," हरिप्रसाद ने कहा, "पर तेरे हिसाब की मज़दूरी नहीं लूँगा। जो तूने मेरे हिस्से से काटा है, वो तेरे पास रहे। पैसा रहे। पर रणवीर — ये हाथ —" उसने अपना हाथ आगे किया, "ये अब तेरे साथ नहीं होंगे।"
वो पलटा। उसने अपना तौलिया उठाया।
अौर रणवीर ने उसे जाने दिया।
बिल्कुल जाने दिया। जैसे कोई अपनी शर्ट से धूल झाड़ता है।
मैं उसके पीछे भागा। मैं उसके सामने आकर खड़ा हो गया। मैंने अपने दोनों हाथ फैलाए, जैसे कोई रास्ता रोक रहा हो। वो मेरे बीच से गुज़र गया।
मुझे कुछ नहीं महसूस हुआ।
मैं वहीं खड़ा रह गया।
और फिर मैं वापस रणवीर की तरफ़ मुड़ा।
वो अकेला खड़ा था, उस आधी दीवार के पास, हाथ में थैला। उसने थैला खोला, वो पतला बंडल निकाला जो उसने अपनी कमर में खोंसा था, और उसे अपनी जेब में डाला। फिर उसने आसमान की तरफ़ देखा।
उस समय उसका चेहरा मुझे आज से ज़्यादा पुराना लगा।
"एक दिन," उसने अपने आप से कहा, "मेरा नाम इतना बड़ा होगा कि लोग ये नहीं पूछेंगे कि पैसा कहाँ से आया। वो सिर्फ़ ये पूछेंगे कि कितना देना है।"
मेरे अंदर कुछ टूटा।
धीमे से, बिना आवाज़ के, पर टूटा।
और तभी मैंने वो देखा जो मैंने पहले नहीं देखा था — हरिप्रसाद के जाते वक़्त उसकी छोटी उँगली पर कपड़े का एक पतला टुकड़ा बँधा था। ईंट की चोट से कटी हुई उँगली। कपड़ा गंदा था, खून सूखकर भूरा हो गया था।
मुझे वो पुराना निशान याद आया — चूल्हे के पीछे वाले दरवाज़े पर, पीपल की दीवार पर, लोहे के फाटक पर — अधूरी छोटी उँगली वाला हाथ।
मेरा पेट कड़ा हो गया।
मैं चिल्लाया। इस बार आवाज़ निकली।
"हरिप्रसाद!"
दृश्य पानी में भीगे काग़ज़ की तरह सिकुड़ने लगा।
और मैंने उसे आख़िरी पल में सुना — रणवीर की आवाज़, जो अब भी वहीं थी, बहुत साफ़, बहुत शांत:
"ठेका मेरे नाम पर है, तो हिसाब भी मेरा होगा।"
फिर सब टूट गया।
मैं ज़मीन पर गिरा।
नहीं — मैंने खुद को गिरने से रोका। मेरे घुटने धूल में टिके थे। मेरा सिर झुका हुआ था और खून के दो कतरे मेरे होठों पर आ गए थे — नाक से, बिना चोट के। जैसे अंदर का कुछ दब गया हो।
बक्सा मेरे हाथ के नीचे ठंडा नहीं था। वो अब गुनगुना था, जैसे किसी बुख़ार वाले का शरीर।
"अंकुश!" पापा की आवाज़ दूर से आई। उन्होंने मेरा कंधा पकड़ा। "उठ। देख मेरी तरफ़।"
मैंने उनकी तरफ़ देखा।
पापा का चेहरा मेरे सामने था, पर मैं उसे ठीक से देख नहीं पा रहा था। जैसे आँखों पर कोई गीला कपड़ा रख दिया गया हो।
"क्या देखा?" मीरा ने पूछा। वो मेरे बगल में बैठ गई थी। उसने मेरी कलाई पकड़ी और उँगली नाड़ी पर रखी। "तेरी नाड़ी बहुत तेज़ है।"
"मैं ठीक हूँ," मैंने कहा। पर आवाज़ बैठी हुई थी।
"क्या देखा?" बबलू ने पूछा। उसकी आवाज़ में वो उत्सुकता नहीं थी, जो आदमी को कहानी सुनने में होती है। उसमें डर था।
मैंने एक लंबी साँस ली।
फिर मैंने कहा:
"रणवीर ने अपनी पहली चोरी की थी।"
हॉल में सन्नाटा छा गया।
"क्या?" भैरों काका ने कहा।
"उसने किसी का हिसाब काटा था," मैंने कहा। "एक आदमी था। हरिप्रसाद। दोनों एक साथ मज़दूरी करते थे। एक प्लेट में रोटी खाते थे। रणवीर ने उसका हिस्सा काटकर अपनी जेब में डाल लिया। और जब उसने पूछा… तो रणवीर ने कहा — ठेका मेरे नाम पर है, तो हिसाब भी मेरा होगा।"
"हरिप्रसाद?" मीरा ने धीरे से दोहराया।
"हाँ।"
"ये नाम मैंने कभी नहीं सुना," उसने कहा। "न किसी काग़ज़ में, न किसी फाइल में, न रणवीर की किसी खबर में।"
"मैंने भी नहीं सुना," भैरों काका ने कहा। "मैं बीस साल उस बिजलीघर के पास रहा हूँ। मैंने हर नाम सुना है। यह नाम नहीं सुना।"
मैंने धीरे से अपनी जेब से घंटी निकाली।
वो बहुत ठंडी थी, पर उसमें एक अजीब सी गरमाहट बीच में टिकी हुई थी, जैसे कोई बुझती हुई आग बची हो।
"अब समझ आया," मैंने कहा।
"क्या?" पापा ने पूछा।
"बक्सा भूखा क्यों है। बक्सा रिश्ते नहीं खाता। बक्सा हिसाब खाता है। और उसका पहला निवाला यही था — हरिप्रसाद का हिस्सा। जो एक बंडल था, और उसके बाद… सब कुछ बंडल बन गया।"
मैंने उठकर बक्से की तरफ़ देखा।
मैंने कहा, "घंटी, वो आदमी कहाँ है? हरिप्रसाद?"
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