The Mysterious Bell – Chapter 1318
मीरा ने अपना कैमरा दीवार के पास रख दिया। उसकी लाल बत्ती बुझ गई थी। वो अब रिकॉर्डिंग नहीं कर रही थी। वो अब सिर्फ़ खड़ी थी।
भैरों काका की लालटेन की रोशनी काँप रही थी, क्योंकि उनका हाथ काँप रहा था। बबलू दीवार से टिका था और उसके होंठ बिना आवाज़ के कुछ बुदबुदा रहे थे।
"तैयार?" मैंने पूछा।
किसी ने जवाब नहीं दिया। जवाब देने की जगह नहीं थी।
और मैंने अपना हाथ बक्से पर रख दिया।
पहले कुछ नहीं हुआ।
फिर एक आवाज़ आई — ईंट के ऊपर ईंट रखने की। ठक। ठक। ठक। सलीके से, गिनती में।
मैंने आँखें खोलीं तो बिजलीघर नहीं था।
सूरज था।
पर वो सूरज आज वाला नहीं था। वो पुराना सूरज था — मोटा, पीला, दोपहर में सिर पर लटक जाने वाला सूरज। मैं उसे देख नहीं रहा था, उसकी गरमी मेरी खाल पर महसूस हो रही थी। हवा में चूने की गंध थी, पसीने की गंध थी, और कहीं दूर से किसी ट्रैक्टर-ट्रॉली की लोहे की कड़कड़ाहट आ रही थी।
मैं एक प्लॉट पर खड़ा था। आधी बनी दीवार। ईंटों की ढेरी। चूने का गड्ढा, जिसमें से कोई पानी भर रहा था। एक तरफ़ पुरानी ट्रॉली, एक तरफ़ टीन का छप्पर और छप्पर के नीचे एक चारपाई, जिस पर दो कंबल मोड़े पड़े थे।
मैंने एक कदम आगे बढ़ाया।
मेरे पैर ज़मीन पर थे, पर ज़मीन मुझे महसूस नहीं कर रही थी। मेरे हाथ के सामने एक चूने की बाल्टी रखी थी। मैंने उसे छूना चाहा — हाथ उसमें से गुज़र गया, धुएँ की तरह।
यह हमारी दुनिया नहीं थी। यह बक्से की दुनिया थी।
और तब मैंने आवाज़ सुनी।
"एक सौ इक्यासी। एक सौ बयासी। एक सौ तिरासी।"
मैं पलटा।
वहाँ एक लड़का ईंटें गिन रहा था।
दुबला, ऊँचा, गोरा नहीं पर साफ़-सुथरा, नीली शर्ट की आस्तीनें चढ़ी हुई, जींस पर गारा लगा हुआ, और सिर पर बाल इतने घने जैसे किसी ने काली मिट्टी का ढेर सिर पर रख दिया हो। उम्र पच्चीस के आसपास। हाथ लंबे, उँगलियों की पोरें चौड़ी, और आँखों में वो चीज़ जो आज किसी आम लड़के की आँखों में इतनी साफ़ नहीं दिखती — भूख। सिर्फ़ पेट की भूख नहीं। आगे निकल जाने की भूख।
मुझे एक पल में समझ आया।
रणवीर।
जवान रणवीर भारद्वाज।
मैं उसके पीछे खड़ा था, बस तीन कदम। मैंने उसके चेहरे को इतने करीब से देखा जितने करीब से मैंने आज तक किसी आदमी को नहीं देखा था। कोई सफ़ेद बाल नहीं। कोई चमकता जूता नहीं। कोई मुस्कान नहीं। सिर्फ़ एक लड़का, जो गिनती में लगा था, जैसे ईंटें नहीं, अपने पूरे भविष्य की सीढ़ियाँ गिन रहा हो।
"एक सौ चौरासी। एक सौ पचासी।" वो रुका और पीछे मुड़ा। "अरे हरि, ये मदन ने फिर गिनती गड़बड़ कर दी। बीस ईंटें कम पड़ रही हैं।"
और तब मैंने उसे देखा।
हरिप्रसाद।
वो चूने के गड्ढे के पास खड़ा था, कमर तक नंगा, कंधे पर एक मैला तौलिया, हाथ में एक लोहे का करछा। उम्र तीस के आसपास। चेहरा गोल, माथा चौड़ा, मूँछें थोड़ी बड़ी, और आँखों में वो शरारत जो इंसान के साथ बुढ़ापे तक चली जाती है।
उसने करछा नीचे रखा और हँसा।
"मदन, तेरी गिनती में हमेशा दो ईंटें गुम हो जाती हैं!" वो बोला। "तेरे हिसाब से तो ये प्लॉट अब तक ख़त्म हो गया होता।"
"मैंने ठीक गिना था," मदन नाम का एक पतला मज़दूर बोला।
"ठीक गिनते तो तू मिस्त्री होता, मज़दूर नहीं," हरिप्रसाद ने कहा और सब हँस पड़े।
मैं वहाँ खड़ा था और मेरे अंदर कुछ अजीब हो रहा था।
क्योंकि मैंने रणवीर को हँसते हुए देखा था। मैंने उसे टीवी पर, मंच पर, तस्वीरों में हँसते देखा था। पर यहाँ वो हँस रहा था — और यह हँसी किसी से नहीं छिपी थी। इसमें कोई योजना नहीं थी। वो सिर्फ़ हँस रहा था, क्योंकि वहाँ हँसने की जगह थी।
दोपहर ढलने लगी।
मैं उनके पीछे-पीछे चलता रहा — टीन के छप्पर तक। वहाँ ज़मीन पर एक थाली रखी थी, और थाली में चार रोटियाँ, थोड़ा सा अचार और ऊपर एक चम्मच घी। एक छोटा सा बर्तन, जिसमें प्याज़ कटी थी। पानी का एक स्टील का गिलास।
रणवीर पहले आकर बैठा। हरिप्रसाद ने हाथ धोए और आकर उसके सामने बैठ गया। दोनों ने हाथ धोए, दोनों ने एक साथ हाथ जोड़े — दो सेकंड के लिए, बिना कोई चर्चा किए, और फिर रोटी तोड़ने लगे।
"आज रोटी गरम है," रणवीर ने कहा। "तेरी बीवी का हाथ ठीक हो रहा है।"
"डॉक्टर कहते हैं अब तीन महीने में पक्का ठीक हो जाएगा," हरिप्रसाद ने कहा। "और बहन की शादी भी आ गई है। पैसा चाहिए, भाई। पैसा।"
"तभी तू रोज़ उस मालिक की गाड़ी के पीछे-पीछे घूमता है।"
"मैं घूमता नहीं, मैं याद दिलाता हूँ," हरिप्रसाद ने कहा और उसने आधी रोटी रणवीर की तरफ़ सरका दी।
मैं वहीं, उनके बीच में, ज़मीन पर बैठ गया। मेरा कोई वजूद नहीं था, पर मैं बैठ गया, क्योंकि खड़े रहना मुश्किल लग रहा था। मेरे सामने वो दोनों एक ही थाली में रोटी खा रहे थे।
"सुन," रणवीर ने चबाते हुए कहा। "एक दिन अपना बड़ा ठेका होगा। अपना। अपनी गाड़ी। अपना नाम बोर्ड पर।"
"अपनी गाड़ी में बैठकर अपना ही बोर्ड देखेगा?" हरिप्रसाद हँसा।
"हाँ। और तेरा नाम भी उसी बोर्ड पर होगा।"
"मेरा नाम बोर्ड पर क्यों? मुझे मज़दूरी दे दे, बहुत है।"
"हरि, तुझे बोर्ड समझ नहीं आता।"
"मुझे हिसाब समझ आता है," हरिप्रसाद ने प्याज़ का एक टुकड़ा मुँह में डाला। "ठेका बड़ा हो या छोटा, हिसाब साफ़ रहे। बस। इससे ज़्यादा कुछ नहीं चाहिए।"
मुझे याद है, मैंने वहाँ सोचा — काश यह आदमी आज होता। मैं उसे गली में ले आता। मैं उससे उस्ताद की दुकान पर मिलवाता। यह आदमी घंटी के बग़ैर ही जोड़ सकता था।
और उसी वक़्त, दूर से गाड़ी की आवाज़ आई।
हरिप्रसाद ने रोटी का आख़िरी टुकड़ा मुँह में डाला और उठ खड़ा हुआ। "मालिक आ गया। मैं जाता हूँ।"
"बैठ," रणवीर ने कहा। उसकी आवाज़ में एक छोटा सा बदलाव आया था। "मैं जाऊँगा। तू खा।"
मैंने रणवीर का चेहरा देखा।
वो उठा, शर्ट झाड़ी, बाल सीधे किए और सीधा गाड़ी की तरफ़ चला।
मालिक की गाड़ी एक पुरानी सफ़ेद जीप थी, जिसके पहियों पर कीचड़ सूखकर सफ़ेद पपड़ी बन गया था। उसमें से एक आदमी उतरा — मोटा, सफ़ेद कुर्ता, हाथ में एक मोटा भूरा थैला, और मुँह में पान। उसने चारों तरफ़ देखा, फिर रणवीर को इशारा करके पीछे की तरफ़ ले गया।
मैं ज़रूर पीछे-पीछे गया।
वो दोनों मुझसे बहुत दूर नहीं थे। मालिक ने थैला खोला, अंदर से एक-एक करके नोटों के बंडल निकाले और रणवीर की तरफ़ बढ़ाने लगा। और वो गिनता गया — इक्कीस, बाईस, तेईस…
मैं वहाँ खड़ा नोट गिनता रहा, जैसे कोई बच्चा मेले में गुब्बारे गिनता है।
और फिर मुझे रणवीर के हाथों पर नज़र आई।
वो नोट गिन रहा था, इतनी तेज़ी से जैसे कोई पुजारी माला फेर रहा हो। पर उसके बाएँ हाथ की उँगली नीचे थी, और उस नीचे वाली उँगली ने चुपचाप एक पतला बंडल उठाया और शर्ट के अंदर, कमर के पास खोंस दिया।
एक पल।
बस एक पल।
मैंने मुँह खोला — बोलने के लिए, चिल्लाने के लिए, किसी को रोकने के लिए — और मेरी आवाज़ मेरे गले में ही रह गई, जैसे बक्से ने मेरा गला दबा रखा हो।
मालिक ने काग़ज़ पर अंगूठा लगवाया, कहा — "काम ठीक चल रहा है। अगले महीने दूसरी मंज़िल।" और जीप में बैठ गया।
धूल उड़ी। जीप गई।
रणवीर वापस लौटा। धूप ढल रही थी। हरिप्रसाद छप्पर के नीचे बैठा नाखून साफ़ कर रहा था।
"कितना आया?" उसने पूछा।
"चार हज़ार दो सौ," रणवीर ने कहा।
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