The Mysterious Bell – Chapter 1317
रोशनी में पाँच बक्से दिखे और छठा — वो एक कोने में था, बाक़ियों से थोड़ा अलग, दीवार से ऐसा सटा हुआ जैसे उसने दीवार को ही पकड़ रखा हो।
मीरा ने कैमरा उठाया।
"अंकुश," उसने कहा। "पहले बात, फिर बंदूक।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा। उसकी आवाज़ में वो हल्का मज़ाक था जो वो डर छिपाने के लिए करती है। मैं उसे पहचान गया। और उस दिन मैंने उसे कुछ कहा जो शायद उसे ज़िंदा रखने वाला था।
"डर लग रहा है?" मैंने पूछा।
"कुछ ज़्यादा नहीं," उसने कहा। "भूत-वूत नहीं होगा। कोई बिजली का करंट होगा, कोई तार पड़ा होगा, हवा में कंपन हो रहा होगा।"
पीछे से बबलू की आवाज़ आई, धीमी और दबी हुई — "करंट को भी पकड़ने के लिए हिम्मत चाहिए होती है।"
मीरा हँसी। छोटी सी हँसी, फिर चुप।
भैरों काका ने लालटेन मेज़ पर रखी और मुझे देखा।
"अब बताओ," उन्होंने कहा। "किसके पास जाओगे?"
मैंने एक-एक बक्से को देखा। पहला, दूसरा, तीसरा — सब बंद, सब ठंडे। चौथा पर धूल की मोटी परत। पाँचवें के ढक्कन पर कोई पुराना निशान था।
और छठा — छठे पर धूल नहीं थी।
नहीं, सच कहूँ तो धूल थी, पर उसके चारों तरफ़ ज़मीन पर धूल की एक गोल सीमा बनी हुई थी, जैसे कोई हर रोज़ वहाँ आकर खड़ा होता हो और अपने जूतों से उसे साफ़ कर जाता हो।
मैं उसकी तरफ़ बढ़ा।
मेरे पीछे पापा ने कुछ कहना चाहा, पर चुप रहे।
मैंने हाथ बढ़ाया।
ढक्कन छुआ।
और मेरा हाथ वहीं रुक गया।
ढक्कन गरम था।
गरम — जैसे किसी ने अभी-अभी उस पर हाथ रखकर छोड़ा हो। और उस गरमी में एक धीमी गुनगुनाहट थी, इतनी धीमी कि मुझे पता नहीं चला कि वो बाहर से आ रही है या मेरे ही सिर के अंदर बज रही है।
किसी पुरानी धुन जैसी। किसी औरत की रोटी बेलते वक़्त की धुन जैसी।
मैंने हाथ खींच लिया।
"क्या हुआ?" मीरा ने पूछा।
"गरम है," मैंने कहा।
"कितना गरम?"
"इतना कि मैं झूठ न बोलूँ तो कहूँ — ये अभी ज़िंदा था।"
बबलू पीछे हट गया। उसके पैर का तलवा फ़र्श की धूल में फिसला और वो दीवार से टिक गया।
मैंने जेब से घंटी निकाली।
और घंटी ने ऐसा किया जो उसने कभी नहीं किया था।
उसने अपने आप नहीं बजा। उसने मेरे हाथ में गरम होकर एक बात कही, इतनी धीमी कि पापा को भी सुनाई नहीं दी, सिर्फ़ मुझे।
"सत्तर अंक।"
मैं ठिठक गया।
"क्या?" मैंने धीरे से पूछा।
"इस लम्हे की कीमत सत्तर अंक है," घंटी ने कहा। "परत खुलेगी। पर मुफ़्त नहीं।"
मैंने अपनी जेब से कॉपी निकाली।
वो कॉपी जो मैंने बनाई थी — मोटी, बाज़ार वाली, पीली जिल्द। उसके पन्ने खुले तो भैरों काका ने लालटेन थोड़ी ऊँची की।
मैंने हिसाब देखा।
अंतिम पन्ने पर आख़िरी लाइन थी, मेरी ही लिखी हुई, टेढ़े-मेढ़े अक्षरों में — "बाक़ी: एक सौ अठहत्तर।"
मैंने उँगली उस लाइन पर रखी।
"सत्तर अंक," मैंने कहा, "तो अठारह ही बचेंगे।"
"हाँ," घंटी ने कहा।
"और अठारह अंक में क्या मिलेगा?"
"अठारह में कुछ नहीं मिलेगा," घंटी ने कहा। और उसकी आवाज़ में वो रूखापन था जो सिर्फ़ सच बोलते वक़्त आता है। "पर आज रात तू जो देखेगा, वो बाद में काम आएगा।"
मैंने पापा की तरफ़ देखा।
पापा ने मेरी कॉपी की तरफ़ देखा, फिर मेरी तरफ़।
"तू चाहे तो हम लौट जाएँ," उन्होंने कहा। "कुछ नहीं बिगड़ेगा।"
"पापा," मैंने कहा। "आपने बाईस साल लौटकर देखा। बताइए, कुछ नहीं बिगड़ा?"
वो चुप हो गए।
मैंने कॉपी बंद की।
"सत्तर अंक," मैंने कहा।
और घंटी ने वो किया जो उसने कभी नहीं किया — उसने खुद बजा, एक लंबी सी आवाज़ में, और फिर मेरी हथेली में ऐसी ठंडी हुई जैसे उसने अपना आधा दम दे दिया हो।
"खर्च हो गए," घंटी ने कहा। "अब कॉपी में मत लिखना। जो लिखेगा, वो मिटेगा नहीं।"
मैंने कॉपी जेब में रखी।
भैरों काका आगे आए।
"एक बात कहूँ, बेटा?" उन्होंने कहा।
"कहिए।"
"मैंने एक रात यहाँ रणवीर को खड़ा देखा है," उन्होंने कहा। "बहुत साल पहले। रात भर। सुबह मैंने झाँका तो वो वहीं खड़ा था, उसी बक्से के सामने। उसका चेहरा मैं नहीं भूला।"
"कैसा था?"
"ऐसा था," भैरों काका ने कहा और अपनी लालटेन की रोशनी उनके चेहरे पर रख दी, "जैसे अंदर से कोई दूसरा आदमी उसके मुँह से बोल रहा हो। वो अपने होंठ हिला रहा था, पर आवाज़ उसकी नहीं थी। जैसे कोई उसके अंदर बैठकर अपना हिसाब समझा रहा हो।"
हॉल में चुप्पी उतर आई।
और फिर बबलू ने वो कहा जो वो शायद यहाँ आने से पहले कहने को तैयार नहीं था।
"मैंने इसे खुला देखा है," उसने कहा।
सब उसकी तरफ़ मुड़े।
बबलू दीवार से टिका था और उसके चेहरे पर पसीना नहीं, आँसू थे। एक आदमी जो मोटा है, जो सबको डराता है, जिसकी चेन सोने की थी — वो अब दीवार से टिका हुआ एक बूढ़ा बच्चा बना खड़ा था।
"दो महीने पहले," उसने कहा। "मैं यहाँ साहब के काम से आया था। काग़ज़ रखने। और मैं गलती से इसी हॉल में आ गया।"
उसने साँस ली।
"उस रात ढक्कन खुला था। एक बालिश्त जितना। और अंदर से रोशनी आ रही थी — पीली नहीं, हरी जैसी। धुआँ जैसी।"
"कुछ दिखा?" मीरा ने पूछा।
बबलू ने उसकी तरफ़ देखा।
"एक हाथ," उसने कहा। "सिर्फ़ एक हाथ। उँगलियाँ। चार उँगलियाँ, और उनमें से एक अधूरी।"
मेरे रोंगटे खड़े हो गए।
क्योंकि मुझे याद आया — पुराने दरवाज़े के कुंडे पर, दीवार पर, फाटक के नीचे — जो निशान मिला था, उसमें छोटी उँगली अधूरी थी।
"फिर?" मैंने पूछा।
"फिर मैं भागा," बबलू ने कहा। "और उस रात से मेरी नींद उड़ी हुई है। मैं हर रात दो बजे जाग जाता हूँ। हर रात लगता है कोई मेरे कमरे में बोल रहा है। मैंने हारमोनियम वाले से पूछा, मैंने डॉक्टर को दिखाया, मैंने गोली खाई — कुछ नहीं हुआ।"
वो मेरी तरफ़ देखने लगा।
"और आज जब उसने तुम्हारा नाम लिया," उसने कहा, "तब पहली बार लगा कि वो मेरी तरफ़ नहीं बोल रहा था। वो तुम्हारा इंतज़ार कर रहा था।"
मैंने अपना हाथ बक्से पर रखा।
गरमी अब भी थी, पर उसमें कुछ बदल गया था। पहले जो गुनगुनाहट थी, वो अब टुकड़ों में बोल रही थी।
पापा ने मेरा कंधा पकड़ा।
"सुन," उन्होंने कहा। "तू खोलेगा तो साथ खोलेंगे। अकेले नहीं।"
मैंने पीछे देखा।
पापा, मीरा, भैरों काका, बबलू। चार लोग।
और मेरी जेब में घंटी।
"तैयार हो?" मैंने पूछा।
मीरा ने कैमरा उतार दिया। यह पहली बार था जब उसने ऐसा किया।
"अब मैं पत्रकार नहीं हूँ," उसने कहा। "अब मैं सिर्फ़ वही हूँ जो यहाँ खड़ी है।"
मैंने घंटी निकाली।
और घंटी ने धीरे से कहा, इतने धीमे स्वर में कि जैसे कोई बीमार आदमी बोल रहा हो —
"परत खुलेगी। जो देखेगा, वो भूल नहीं पाएगा।"
॥
"परत खुलेगी। जो देखेगा, वो भूल नहीं पाएगा।"
घंटी ने यह कहा और मेरी हथेली में ऐसी ठंडी हो गई, जैसे उसने अपनी आख़िरी गरमी भी मेरे नाम कर दी हो।
मैंने बक्से की तरफ़ देखा। छठा बक्सा। लोहे का, ऊँचा, किसी पुराने ज़माने के संदूक जैसा, जिसका रंग उतर चुका था और जिस पर धूल की परत इतनी मोटी थी कि उँगली रखो तो निशान बन जाए। पर उसके चारों तरफ़ ज़मीन पर धूल की एक गोल सीमा थी — जैसे कोई रोज़ आकर वहाँ खड़ा होता हो और अपने पैरों से धूल हटा देता हो।
हॉल में हवा भी रुक गई थी।
पापा ने मेरा कंधा पकड़ा। उनकी पकड़ में वो काँप नहीं थी जो डर से आती है। वो पकड़ थी जो कहती है — मैं साथ हूँ, गिर मत।
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