The Mysterious Bell – Chapter 1316
आँगन में सन्नाटा पसर गया।
काजल के हाथ की थाली ज़मीन पर रखी रह गई।
"कितनी बार?" मैंने पूछा।
"दो बार," बबलू ने कहा। "इतना साफ़ कि मुझे लगा कोई मेरे कान में बोल रहा है। मैं वहाँ से भागा। बाहर आया, तो दरवाज़ा बाहर से बंद नहीं हुआ था। कोई था ही नहीं। बस मोमबत्ती जल रही थी और वो बक्सा बोल रहा था।"
बबलू ने मेरा हाथ पकड़ा। उसकी हथेली पसीने से भीगी थी और उसकी पकड़ में वो ताक़त थी जो सिर्फ़ खौफ़ देती है।
"उस्ताद," उसने काँपते हुए कहा, "वो बक्सा आज रात तुम्हारा नाम ले रहा था।"
॥
बबलू की पकड़ मेरे हाथ पर ऐसी थी जैसे कोई डूबता हुआ आदमी अंत में कोई रस्सी पकड़ता है। उसकी हथेली पसीने से भीगी थी और उँगलियाँ काँप रही थीं।
मैंने उसका हाथ धीरे से खोला।
"बबलू," मैंने कहा। "तुमने ठीक सुना?"
"दो बार," उसने कहा। "दो बार तुम्हारा नाम। पूरा नाम नहीं, बस पहला हिस्सा — अंकु। जैसे कोई बंद मुँह से बोल रहा हो।"
मैं आँगन की ओट में खड़ा रह गया।
काजल ने थाली उठाई और बिना कुछ कहे अंदर चली गई। माँ की चारपाई से खाँसी की आवाज़ आई। पापा दरवाज़े पर खड़े थे, हाथ में पानी का गिलास, और उनकी आँखें सीधे मेरी तरफ़ थीं।
"कब जाना है?" पापा ने पूछा।
मैंने उनकी तरफ़ देखा।
"आप सुन रहे थे?"
"मैं बहरा नहीं हूँ," पापा ने कहा। "बस बोलना कम करता हूँ।"
उन्होंने गिलास मेज़ पर रखा और पास आए।
"बक्सा नाम ले रहा है," उन्होंने कहा। "तो तू जाएगा। और मैं साथ चलूँगा।"
"पापा—"
"मैं साथ चलूँगा," उन्होंने फिर कहा, इस बार ज़रा ऊँची आवाज़ में। और फिर जैसे खुद से शर्मिंदा होकर धीरे बोले, "बाईस साल से मैं उस जगह से दूर रहा हूँ। अब नहीं रहूँगा।"
मैंने कुछ नहीं कहा। कभी-कभी चुप्पी भी हामी होती है।
पीछे से माँ की आवाज़ आई।
"अंकुश।"
मैं अंदर गया। माँ चारपाई पर बैठी थीं, साड़ी का पल्लू कमर में खोंसा हुआ, और उनके चेहरे पर वो थकान थी जो बुखार के बाद रह जाती है।
"मेरी बात सुन," उन्होंने कहा। "जब जाओ, दरवाज़ा खुला रखना।"
"माँ, ये कोई सभा नहीं है—"
"मुझे पता है," उन्होंने कहा। "पर बंद दरवाज़े के पीछे जो होता है, वो ज़्यादा डराता है। मैंने बाईस साल बंद दरवाज़े के पीछे रहकर देखा है। खुला रखो।"
मैंने उनका हाथ पकड़ा। उनकी उँगलियाँ ठंडी थीं, पर पकड़ मज़बूत।
"ठीक है," मैंने कहा।
बाहर आया तो बबलू अब भी वहीं बैठा था, आँगन के कोने में, घुटने सीने से लगाए। उसने ऊपर देखा।
"तुम सच में जा रहे हो?"
"तुम मेरे साथ चल रहे हो," मैंने कहा।
उसका रंग और उड़ गया।
"मैं—"
"तुम वहाँ पहले जा चुके हो," मैंने कहा। "मुझसे ज़्यादा वहाँ की हवा तुम जानते हो। और अगर मुझे वो बक्सा समझना है, तो वो आदमी चाहिए जो उसके सामने पहले काँप चुका हो।"
वो कुछ देर मेरी तरफ़ देखता रहा।
"तुम्हारी बातें बहुत नयी हैं," उसने कहा। "पर अंदर से डराती उसी तरह हैं।"
मैं मुस्कुराया।
"चल, दस बजने वाला है।"
मीरा को फोन किया। एक ही रिंग में उठाया।
"कहाँ?" उसने पूछा।
"तुम सो नहीं रही थीं?"
"मैंने सुना था तुम्हारे आँगन की तरफ़ से कोई दौड़ा। मैं बाहर हूँ, गुमटी के पास। शबनम आपा की छत की लालटेन अभी जली है।"
"बिजलीघर," मैंने कहा। "पीछे वाला फाटक।"
वो एक पल चुप रही।
"कैमरा लाऊँ?"
"ले आओ," मैंने कहा। "पर अंदर मेरी मर्ज़ी से आना।"
"अंकुश, मैं पत्रकार हूँ, तुम्हारी बहन नहीं।"
"इसीलिए कह रहा हूँ," मैंने कहा। "बहन तो मान जाती है।"
वो हँसी, एक छोटी सी हँसी, और फोन कट गया।
पापा ने अपनी पुरानी नीली शर्ट पहन ली थी। वही जो उन्होंने अस्पताल की सभा वाले दिन पहनी थी। कमीज़ की जेब से रेडियो वाला कुछ निकाल रहे थे, मैंने देखा नहीं, पर उनका हाथ जेब पर बार-बार जाता रहा।
हम निकले।
रात की गली अपनी आवाज़ बदल लेती है। दिन में जो नाली टप-टप करती है, रात में वो धीरे-धीरे साँस लेती है। पीपल के पत्ते बिना हवा के भी हिलते हैं और उनकी आवाज़ ऐसी होती है जैसे कोई बुज़ुर्ग सोते-सोते बड़बड़ा रहा हो।
हम तीन चले — पापा आगे, मैं बीच में, बबलू पीछे। बबलू हर दस कदम पर पीछे मुड़कर देखता था। एक बार मैंने भी मुड़कर देखा। कुछ नहीं था। पर मैं झूठ नहीं बोलूँगा — मुझे भी लगा कि जो नहीं दिख रहा, वो भी हमारे साथ चल रहा है।
पुराने बाज़ार के मोड़ पर मीरा मिली।
कैमरा उसके कंधे पर था, बैग उसी तरह फटा हुआ, और हाथ में एक छोटी टॉर्च। उसने हमें देखा और पहले पापा को नमस्ते कहा — यह मीरा की आदत है, जो उसे अच्छी लड़की साबित करती है, भले वो माने नहीं।
"भैरों काका पहले पहुँच गए होंगे," मीरा ने कहा।
"तुम कैसे जानती हो?"
"क्योंकि उनकी झोपड़ी की लालटेन बुझी हुई है और चूल्हे की राख गरम थी," उसने कहा। "मैंने रास्ते में देखा। वो हमसे पहले निकले हैं।"
बबलू ने पीछे से कहा, "इस औरत से डर लगता है।"
"लगना चाहिए," मीरा ने बिना मुड़े कहा।
बिजलीघर के पीछे वाला रास्ता पतला है। एक तरफ़ टूटी दीवार, दूसरी तरफ़ सूखी नाली जिसमें कूड़ा जमा है। पंद्रह कदम चलने पर एक लोहे का फाटक आता है जिसका नीचे का हिस्सा ज़ंग खाकर सलाद जैसा उखड़ा हुआ है।
फाटक पर भैरों काका खड़े थे।
उम्र के हिसाब से वो सीधे खड़े थे, पर उनकी पीठ आगे झुकी हुई थी और हाथ में एक बड़ी चाबी थी जो उनके हाथ में ही बड़ी लग रही थी।
"आ गए," उन्होंने कहा। आवाज़ ऐसी जैसे किसी पुराने दरवाज़े की कुंडी खुल रही हो।
"काका, आपको तकलीफ़ दी—"
"तकलीफ़ नहीं," उन्होंने कहा। "बीस साल से मैं इस फाटक को रोज़ देखता हूँ। आज पहली बार लगा कि इसे खोलना चाहिए।"
उन्होंने चाबी डाली। तीन बार घुमाई, फिर चौथी बार में ताला खुला। आवाज़ ऐसी हुई जैसे किसी ने साँस रोककर छोड़ी हो।
फाटक खुला।
बाहर से हवा आई — तेल, जला तार और धूल, तीनों एक साथ। मेरे नाक में घुसी और अंदर तक चली गई।
"अंदर अंधेरा है," भैरों काका ने कहा। "मेरी लालटेन जलाऊँगा, पर ध्यान रखना — लालटेन की रोशनी में बक्से सिर्फ़ बक्से दिखेंगे। जो असली है वो रोशनी में नहीं दिखेगा।"
"फिर कैसे दिखेगा?" मीरा ने पूछा।
भैरों काका ने मेरी जेब की तरफ़ देखा।
"उससे पूछो," उन्होंने कहा।
अंदर घुसे।
पहले एक छोटा सा कमरा आया, जिसका फ़र्श सीमेंट का था और जिसमें टूटी कुर्सियाँ और पुराने लोहे के तार के गोले पड़े थे। छत पर एक पंखा लटक रहा था, उसका एक ब्लेड मुड़ा हुआ और दूसरा गायब। दीवार पर बिजली के खंभों वाला कोई पुराना कैलेंडर टँगा था जिसका साल किसी ने पलटा नहीं।
फिर दूसरा दरवाज़ा आया, और उसके पार — बड़ा हॉल।
और उस हॉल में, दीवार के साथ, बराबर अंतर पर, छह बक्से।
लोहे के बड़े बक्से। इंसान जितने ऊँचे। हर बक्से का ढक्कन बंद, हर बक्से पर ज़ंग की मोटी परत, और हर बक्से के नीचे का फ़र्श पीले रंग के धब्बे से घिरा हुआ, जैसे वहाँ से कोई चीज़ रिसती रही हो।
मैं रुक गया।
बबलू मेरे पीछे आकर खड़ा हुआ और उसकी साँस तेज़ हो गई।
"यही हैं," उसने कहा। "छह। और आख़िरी—"
"आख़िरी कौन सा है?"
"दीवार से सटा हुआ," भैरों काका ने कहा और अपनी लालटेन का हाथ आगे किया।
वेबसाइट पर अपनी पसंदीदा कहानियाँ मुफ्त पढ़ें और Story FM App पर उन्हीं कहानियों का शानदार Audio Experience लें।
यह कहानी Story FM app पर ऑडियो में भी सुनें — आगे के एपिसोड सबसे पहले वहीं आते हैं।
Audio mein suno