The Mysterious Bell1315 / 1504

The Mysterious Bell – Chapter 1315

7 min read November 5, 2026

पापा ने मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखें वैसी ही थीं जैसी हमेशा — थकी, धीमी। पर उसमें कुछ और भी था। जैसे कोई सालों से एक दरवाज़ा बंद किए बैठा हो और अब कोई उसे खटखटा रहा हो।

"तू सोचता है मैंने तुझ पर भरोसा नहीं किया?" उन्होंने पूछा।

"मैं सोचता हूँ कि आपने कुछ और सोचा था," मैंने कहा। "और मैं वही जानना चाहता हूँ।"

पापा कुछ देर चुप रहे। फिर उन्होंने चश्मा उतारा। बिना चश्मे के उनका चेहरा और छोटा लगता है, जैसे कोई बच्चा बूढ़ा हो गया हो।

"डर विरासत में नहीं आता, बेटा," उन्होंने कहा। "डर किसी घटना से आता है। एक घटना से। और फिर वो तेरे साथ हर कमरे में आ जाता है, हर काग़ज़ पर बैठ जाता है।"

"कौन सी घटना?"

पापा ने आँगन की दीवार से टिका दिया।

"दादा की आख़िरी रात," उन्होंने कहा। "बुखार था। दवा देर से आई। उन्होंने कहा था — बेटा, वो घंटी रख दे सिरहाने, उसकी आवाज़ नींद में अच्छी लगती है। मैंने रख दी। सुबह वो चले गए।"

उन्होंने रुककर साँस ली।

"और सुबह, जब मैंने उनका सिर उठाया, घंटी वहाँ नहीं थी। मैंने पूरी कोठरी देखी। चारपाई के नीचे देखा। कोई नहीं था, कुछ नहीं था। मैंने किसी से कुछ कहा नहीं। क्योंकि अगर मैं कहता कि दादा के जाने की रात घंटी गायब हो गई, तो गली में यही फैलता कि इस घर पर कोई साया है। और उस साल दुकान चल रही थी। तेरी माँ का इलाज चल रहा था। मैंने सोचा — चुप रहूँगा, सब ठीक हो जाएगा।"

मैंने कुछ नहीं कहा।

"दो साल बाद एक औरत अस्पताल के गेट पर मिली," पापा ने कहा। "पीली पड़ी साड़ी, हाथ काँपते हुए। उसने घंटी मेरी हथेली में रख दी और कहा — इसे संभालो, मुझसे नहीं संभलती। फिर भाग गई। मैंने उसका नाम नहीं पूछा। आज तक मुझे लगता है, उस आदमी ने मेरा इंतज़ार किया था, और मैंने उसका नाम नहीं पूछा।"

"तो आपने घंटी अलमारी के पीछे क्यों रखी?" मैंने पूछा।

पापा ने मेरी तरफ़ देखा।

"क्योंकि मैं उसे हाथ में नहीं ले सका," उन्होंने कहा। "जब भी लेता, दादा की रात याद आती। जब भी लेता, लगता कि उस में कुछ बोलेगा और मैं जवाब नहीं दे पाऊँगा। मैंने उसे कपड़े में लपेटकर अलमारी के पीछे धकेल दिया। और फिर उसी डर में, एक दिन, मैंने रणवीर के काग़ज़ों पर अंगूठा लगा दिया।"

उन्होंने रिंच उठाई और उसे घुमाने लगे।

"अंकुश, डर एक बार आता है। फिर वो हर फैसले में बैठ जाता है। मैंने घंटी इसलिए नहीं छिपाई कि मुझे तुझ पर भरोसा नहीं था। मैंने इसलिए छिपाई कि मुझे खुद पर भरोसा नहीं था।"

मेरा गला सूख गया।

मैं बैठा रहा। कुछ देर तक सिर्फ़ पंखे की आवाज़ आ रही थी — काजल ने फिर झलना शुरू कर दिया था।

"अब मेरी बारी," मैंने कहा।

"क्या?"

"मेरी सबसे बड़ी डर," मैंने कहा। "जो मैंने आज तक किसी को नहीं बताई।"

पापा ने रिंच नीचे रख दी।

"मुझे लगता है," मैंने कहा, और आवाज़ थोड़ी फँस गई, "मैं गली और घर, दोनों नहीं बचा पाऊँगा।"

चुप्पी।

"मंच पर मैं बड़ी-बड़ी बातें करता हूँ," मैंने कहा। "पीपल के नीचे सबको हिम्मत देता हूँ। पर रात को जब सब सो जाते हैं, मैं छत पर बैठा सोचता हूँ — माँ की दवा अगर रुक गई, तो? पापा को नोटिस आ गया, तो? उस्ताद का शटर गिर गया, तो? और उस दिन मैं किसका हाथ पकड़ूँगा? गली का या घर का?"

पापा ने मेरा हाथ पकड़ा।

उनका हाथ खुरदुरा था। ग्रीस से नहीं, उम्र से। और उस पकड़ में वो चीज़ थी जो किसी काग़ज़ में नहीं लिखी जा सकती।

"सुन," उन्होंने कहा। "डर के साथ चलने वाला हारता नहीं। हारता है वो जो डर से भागता है। मैं बाईस साल से भाग रहा था, और देख — मुझे क्या मिला। एक अंगूठा, एक चुप्पी, और एक बेटा जो मुझसे दूर हो गया।"

उन्होंने मेरा हाथ दबाया।

"तू अकेला नहीं है, अंकुश। तू जिस गली को बचाने की बात करता है, वो गली मेरी दुकान से शुरू होती है और तेरी दुकान पर आकर खत्म नहीं होती। यहाँ सात दुकानें हैं, ग्यारह घर हैं, और तेरे पास उस्ताद है, इलाही है, शबनम है, मीरा है, शालिनी है, और जो नहीं है वो भी आएगा।"

"और अगर कल ज़मीन जा गई?" मैंने पूछा। "अगर मशीन आ गई और दीवार गिर गई?"

पापा ने मेरी तरफ़ ऐसे देखा जैसे मैंने कुछ बहुत आसान पूछ लिया हो।

"दीवार गिर जाएगी," उन्होंने कहा। "पर हम उस पर खड़े नहीं रहेंगे। हम उसके आगे खड़े होंगे।"

माँ ने चारपाई से आवाज़ दी।

"मुझे कोई नहीं बचा रहा," उन्होंने कहा, आवाज़ कमज़ोर पर साफ़। "मैं ज़िंदा हूँ, बेटा। और मैं ज़िंदा हूँ तो मेरी दवा का हिसाब भी मैं ही रखूँगी। तू अपना काम कर।"

काजल ने पंखा रख दिया।

"अंकुश," उसने कहा, "तू जब छोटा था, तब भी रात को उठकर बैठ जाता था। माँ कहती थी — ये बच्चा बड़ा होकर सबको बचाएगा। मैं अब भी वही मानती हूँ। तू सिर्फ़ इतना याद रख — सबको बचाने के चक्कर में खुद को मत भूल।"

मैंने सिर हिलाया।

और उसी वक़्त मेरी जेब में घंटी हल्की गरम हुई।

सिर्फ़ एक पल के लिए। फिर ठंडी।

जैसे किसी ने कहा हो — ठीक है, आगे बढ़।

पापा उठे और पानी लेने अंदर गए। मैं आँगन में बैठा रहा, और मुझे लगा कि बाईस साल से जो दरवाज़ा घर के अंदर बंद था, वो आज पूरा खुल गया।

और फिर गली के मुँह से कोई दौड़ता हुआ आया।

मैंने सिर उठाया।

बबलू था।

वो पसीने में इस तरह भीगा हुआ था जैसे बारिश में भीगा हो। सोने की चेन गले से गायब थी। पानदान नहीं था। कमीज़ कंधे पर फटी हुई थी। हाँफते हुए वो आँगन में घुसा और सीधे मेरे आगे घुटनों पर बैठ गया।

"पानी," उसने कहा।

काजल भागकर पानी लाई।

उसने एक साँस में पूरा गिलास खत्म किया, फिर दूसरा माँगा।

"क्या हुआ?" मैंने पूछा। "कौन पीछे है?"

"कोई नहीं," बबलू ने कहा। "कोई नहीं है। पर है — मतलब—" वो अपना सिर पकड़कर बैठ गया।

"बबलू," मैंने कहा। "साँस ले। पहले साँस ले।"

उसने दो बार गहरी साँस ली।

"मैंने उनकी टोली छोड़ दी," उसने कहा। "आज शाम। मैंने साहब के आदमी से कह दिया कि मैं यह काम नहीं करूँगा। आगे जो होगा, होगा।"

मैंने उसकी तरफ़ देखा।

"तुमने यह क्यों किया?"

"क्योंकि मैं डर गया," बबलू ने कहा, और उसकी आवाज़ टूट गई। "पर डर इस बात का नहीं था कि वो मेरा क्या करेगा। डर इस बात का था कि मैं क्या बन रहा हूँ। तुम्हारे पीपल वाली सभा में मैंने सबके सामने कहा था कि मैंने ग्यारह बजे बिजलीघर के पास सब देखा। और तुमने मुझे उसके बाद भी बाहर नहीं किया। आज तक किसी ने मुझे बाहर नहीं किया।"

वो काँप रहा था।

"पर एक बात है," उसने कहा। "एक डर वाली बात।"

"कहो।"

"मैं आज शाम छह बजे बिजलीघर के पास गया था," बबलू ने कहा। "मुझे साहब के आदमी ने बुलाया था। मैंने सोचा साफ़-साफ़ मना कर दूँगा और आ जाऊँगा। पर वहाँ कोई नहीं था। दरवाज़ा खुला था। अंदर अंधेरा था, बस एक कोने में मोमबत्ती जल रही थी।"

उसने मेरी तरफ़ देखा।

"मैं अंदर गया। क्योंकि मैं बारह साल से उस जगह से डरता हूँ और मुझे लगा कि आज उसे सामने देख लूँगा तो डर खत्म हो जाएगा।"

"और?"

"और मैं बक्सों के पीछे छिप गया," बबलू ने कहा। "क्योंकि बाहर पैरों की आवाज़ आई। लकड़ी के जूते, पर वो जल्दी चल रहा था। मैं साँस रोककर बैठा रहा।"

वो फिर रुका।

"फिर आख़िरी बक्से में गुनगुनाहट शुरू हुई। बहुत धीमी। मैंने सोचा, पंखा होगा। फिर वो रुकी। और फिर — फिर उस बक्से ने तुम्हारा नाम लिया।"

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