The Mysterious Bell – Chapter 1314
टक। टक। टक।
धीमी आवाज़। बस इतनी कि लगे ज़मीन किसी से धीरे-धीरे बात कर रही है।
मैं और मीरा शालिनी के दफ़्तार की सीढ़ी के नीचे खड़े थे। दूसरी मंज़िल। नीचे जूते की दुकान का शटर आधा गिरा था, और सीढ़ी के पास लगा बल्ब हर दो पल में पलक झपक रहा था, जैसे खुद भी डरा हुआ हो।
"तुम ठीक हो?" मीरा ने धीरे से पूछा।
"हाँ," मैंने कहा। और यह आधा सच था। बाकी आधा मेरी जेब में था, उस घंटी के साथ, जो अचानक बर्फ जैसी ठंडी हो गई थी।
आवाज़ करीब आई।
और फिर सामने एक आदमी आया।
दुबला। कमर थोड़ी झुकी हुई। सफ़ेद दाढ़ी जो बालों से ज़्यादा घनी थी। पुरानी फीकी नीली शर्ट, जिसकी जेब फटी हुई थी। पैरों में लकड़ी के जूते — वही जो हम सुन रहे थे। एक हाथ में टिन की लालटेन थी, जिसमें आग नहीं थी, सिर्फ़ पुरानी कालिख थी।
वो रुका। मुझे देखा। फिर मीरा को देखा। फिर उसने लालटेन नीचे रख दी, जैसे कह रहा हो — इससे डरने की बात नहीं है।
"तुम अंकुश यादव हो," उसने कहा। आवाज़ में कुछ भी नहीं था — न प्यार, न गुस्सा। बस थकान।
"हाँ।"
"मैं भैरों हूँ," उसने कहा। "पुराने बिजलीघर का चौकीदार। बीस साल वहाँ रहा, फिर हटा दिया। अब उसके पीछे झोपड़ी में रहता हूँ।"
मीरा ने मेरी तरफ़ देखा। मैंने सिर हिलाया।
"यह लिफ़ाफ़ा तुमने शटर के नीचे से निकाला?" मैंने पूछा।
"निकाला नहीं," भैरों काका ने कहा। "डाला था। मैंने।"
हवा रुक गई।
"आपने डाला?"
"हाँ। शटर के नीचे। नीचे की तरफ़ दो अंगुल की दरार है। काग़ज़ वहाँ से चला जाता है।"
"पर आपने उस आदमी से कहा कि शटर बंद था—"
"वो सच था," भैरों काका ने कहा। "शटर बंद था। मैंने खोला नहीं। मैंने नीचे से डाला और चला गया। तुम्हें सुबह मिलेगा, यही सोचा था। पर उस आदमी ने पहले उठा लिया।"
मैंने लिफ़ाफ़े को जेब में टटोला। "आप अंदर क्यों नहीं आए? उस्ताद की दुकान में?"
भैरों काका ने धीरे से मुस्कुराने की कोशिश की। बहुत कम मुस्कुराए। "क्योंकि शालिनी मैडम के दफ़्तार के सामने चाय की दुकान है। वहाँ रोज़ शाम दो आदमी बैठते हैं। सफ़ेद कुर्ता, नए जूते। वे देखते हैं कौन आता है, कौन जाता है। मैं बूढ़ा हूँ, पर अंधा नहीं।"
मीरा ने कैमरा नीचे कर दिया।
"तो आप जानते हैं कि दफ़्तार पर नज़र रखी जा रही है?"
"मैं बीस साल से उस गली में रहता हूँ," भैरों काका ने कहा। "यहाँ हर आदमी की चाल मुझे पता है। सिर्फ़ एक चीज़ नहीं पता — वो बक्से।"
मेरा हाथ जेब में घंटी पर टिका रह गया।
"कौन से बक्से?"
भैरों काका ने लालटेन उठाई और उसकी तरफ़ देखता रहा, जैसे उसमें जवाब लिखा हो।
"बिजलीघर के अंदर छह बड़े लोहे के बक्से हैं," उसने कहा। "दीवार के साथ, बराबर अंतर पर। मैंने उन्हें कभी नहीं छुआ। बीस साल पहले एक बार हाथ लगाया था, हथेली तीन दिन जलती रही। मैंने सोचा इंफ़ेक्शन हो गया। पर इंफ़ेक्शन में चमड़ी नहीं फटती, बेटा। वो फटी थी।"
मीरा ने कैमरा चालू किया। भैरों काका ने उसे देखा, फिर मुझे।
"मैं रोकूँ?" मीरा ने पूछा।
"नहीं," मैंने कहा। "चलाओ।"
भैरों काका ने कंधे उचकाए और आगे बोले।
"रात दस बजे के बाद उनमें से आख़िरी बक्से में गुनगुनाहट होती है। जैसे कोई रोटी बेलते वक़्त गुनगुनाता है। धीमी। लगातार। मैं सुनता रहता हूँ, कमरे से बाहर नहीं निकलता।"
"कब से?"
"जब से मैं वहाँ हूँ। बीस साल से।"
मेरे पैर के नीचे ज़मीन हल्की हिली, या मुझे लगा।
"और आज?"
भैरों काका ने पहली बार मेरी आँखों में सीधा देखा।
"आज शाम कुछ अलग हुआ," उसने कहा। "मैं झोपड़ी के बाहर बैठा था। छह बजे का वक़्त रहा होगा। गुनगुनाहट शुरू हुई, पर इस बार उसमें एक नाम था।"
"कौन सा नाम?" मीरा ने सवाल किया, आवाज़ थोड़ी तेज़।
भैरों काका ने मेरी तरफ़ देखा।
"अंकुश," उसने कहा। "दो बार। साफ़। जैसे कोई किसी को नींद से जगा रहा हो।"
मेरी जेब में घंटी और ठंडी हो गई।
मैंने हाथ जेब में दबाया। "और कुछ?"
"उसके बाद एक लाइन आई," भैरों काका ने कहा। "मैं पढ़ा-लिखा नहीं हूँ, पर उसमें कुछ ज़मीन का ज़िक्र था, कुछ हिसाब का। और आख़िर में…"
वो रुक गया।
"आख़िर में क्या?" मैंने पूछा।
"आज रात," भैरों काका ने धीरे से कहा। "बस इतना। आज रात।"
उसने लालटेन उठाई, जैसे बात खत्म कर रहा हो।
"मैं तुम्हें सिर्फ़ इतना बताने आया था," उसने कहा। "बाकी तुम्हारा काम है।"
तभी दफ़्तार का दरवाज़ा खुला और शालिनी नीचे आई। हाथ में काली फाइल, कंधे पर बैग। उसने भैरों काका को देखा और उसके कदम रुक गए।
"ये…" शालिनी ने शुरू किया।
"ये भैरों काका हैं," मैंने कहा। "लिफ़ाफ़ा इन्होंने भेजा था।"
शालिनी ने भैरों काका को देखा, फिर मुझे।
"अंदर चलिए," उसने कहा। "सीढ़ी पर खड़े रहना ठीक नहीं।"
"मैं नहीं आऊँगा," भैरों काका ने कहा। "मेरे जूते बोलते हैं। अंदर ज़मीन लकड़ी की है। सबको पता चल जाएगा कि कोई आया है।"
वो मुड़ा और चल दिया।
टक। टक। टक।
फिर रुका, बिना पलटे बोला।
"बेटा, वो सफ़ेद कुर्ते वाला आदमी रोज़ सुबह आठ बजे बिजलीघर के दरवाज़े पर दो बार खटखटाता है। दो मिनट खड़ा रहता है, फिर चला जाता है। बीस दिन से। मैंने कभी दरवाज़ा नहीं खोला। पर एक दिन वो मुस्कुराया, और मुझे लगा — वो जानता है कि मैं अंदर से सुन रहा हूँ।"
और वो चला गया।
मीरा ने कैमरा बंद किया। उसके हाथ काँप रहे थे।
"अंकुश," उसने कहा। "वो बक्सा तुम्हारा नाम ले रहा है। यह अच्छी बात नहीं है।"
"मुझे पता है," मैंने कहा। "पर आज तक हमें पता ही नहीं था कि वो किससे बात करता है। अब पता है।"
"और यह अच्छी बात है?"
"जब दुश्मन बोलने लगे," मैंने कहा, "तो समझो वो डरने लगा है।"
मैंने शालिनी की तरफ़ देखा।
"दफ़्तार के अंदर सब ठीक?"
"सात बजे की बात थी," शालिनी ने कहा। "कोई आया नहीं। सिर्फ़ वो लिफ़ाफ़ा था।"
"तो अब मैं घर जा रहा हूँ," मैंने कहा।
"अंकुश—"
"मीरा, आज रात कुछ नहीं करना। कैमरा बंद करके सो जाओ। कल सुबह हमें उस बक्से के सामने खड़ा होना है। और उसके लिए हमें पूरे दिमाग़ से जागना पड़ेगा।"
उसने सिर हिलाया।
मैं गली की तरफ़ चला।
और रास्ते भर मेरी जेब में घंटी चुप रही। न गरम, न ठंडी। बस चुप। जैसे वो भी सुन रही हो कि मैं क्या सोच रहा हूँ।
तुम सोच रहे होगे कि ये सब बहुत ज़्यादा हो गया। एक बक्सा, एक बूढ़ा, एक लिफ़ाफ़ा। सुनो, उस रात मुझे भी यही लगा था। पर घर पहुँचते-पहुँचते मुझे एक बात समझ आ गई थी — जब भी कोई चीज़ अपने आप बोलने लगे, तो उसके पीछे कोई इंसान होता है जिसने उसे बोलना सिखाया है।
और उस इंसान का नाम, मुझे लगा, मेरे घर में भी गूँजता है।
आँगन में लालटेन जल रही थी। माँ चारपाई पर बैठी थीं। बुखार उतर चुका था, पर चेहरा पतला लग रहा था। काजल उनके पास बैठी थी और पंखा झल रही थी।
पापा आँगन के कोने में, ईंट पर बैठे थे। हाथ में पुरानी रिंच थी, जिसे वो घुमा रहे थे, घुमा रहे थे — बिना किसी पेंच पर लगाए।
मैं सीधा उनके सामने गया और बैठ गया।
"पापा," मैंने कहा।
उन्होंने रिंच रख दी।
"हाँ।"
"पूर्णिमा से पहले एक बात साफ़ करनी है," मैंने कहा। "सिर्फ़ एक।"
"कह।"
"आपने घंटी क्यों छिपाई?"
काजल के हाथ का पंखा रुक गया।
वेबसाइट पर अपनी पसंदीदा कहानियाँ मुफ्त पढ़ें और Story FM App पर उन्हीं कहानियों का शानदार Audio Experience लें।
यह कहानी Story FM app पर ऑडियो में भी सुनें — आगे के एपिसोड सबसे पहले वहीं आते हैं।
Audio mein suno