The Mysterious Bell – Chapter 1313
"कहा — तू इसे रख," पापा ने कहा। "मैं इसे लेकर नहीं जा सकती। इसे तेरा बेटा उठाएगा। और जिस दिन वो उठाएगा, उस दिन तू उसके पास खड़ा होना, पीछे नहीं।"
मैं चुप हो गया।
पापा ने अपना चश्मा उतारा, जिसकी डंडी कान पर टेप से बँधी थी, और उसे अपनी गोद में रख दिया।
"मैं उस रात डर गया," उन्होंने कहा। "मुझे लगा कि अगर यह घंटी सच में बोलती है, तो यह मेरे बेटे के साथ क्या करेगी? अगर यह मेरे बेटे से भी वही कहेगी जो मुझसे कहा, तो वो भी उसी रास्ते पर जाएगा। मैंने घंटी उठाई और उसे कोठरी के पीछे, उस पुरानी अलमारी के पीछे छिपा दिया। फिर मैं वापस अस्पताल गया और रणवीर के काग़ज़ों पर अंगूठा लगा दिया।"
उन्होंने अपनी हथेली को देखा।
"मैंने सोचा था कि एक कमज़ोरी बच्चे को बचा लेगी," उन्होंने कहा। "पर वो बच्चा मेरे बगल में ही बड़ा होता रहा और वो खुद उस कमज़ोरी से लड़ता रहा। और मैं चुप बैठा रहा।"
मैंने उनका हाथ पकड़ा।
"पापा।"
"हाँ।"
"घंटी मुझे तुमसे नहीं मिली," मैंने कहा। "मुझे वो मेले में मिली। एक कबाड़ी ने बेची। उसके हैंडल पर जो खाली ब्रैकेट था, वहाँ मैंने अपनी पुरानी घंटी लगाई। फिर लगा कि यह उसी की है।"
पापा ने घंटी को देखा।
"यह उसी की है," उन्होंने कहा। "पर यह उसी दिन गई थी जिस दिन मेरे पापा गए। मैंने उसे उस रात अस्पताल ले जाकर उनके सिरहाने रख दिया था। उसके बाद वो चली गई थी। मुझे लगा कि कोई ले गया। मैंने ढूँढा नहीं। डर के मारे ढूँढा नहीं।"
मैंने घंटी को हाथ में उठाया।
वो अब उतनी ठंडी नहीं थी।
फिर भी वो बोली नहीं।
मैंने उसे बजाया।
कोई आवाज़ नहीं आई।
मैंने फिर बजाया।
कुछ नहीं।
मैंने पापा की तरफ़ देखा।
"पापा," मैंने कहा। "घंटी ने मुझे कल रात कहा था कि पहले घर का टूटा रिश्ता जुड़ेगा, तभी वो पूरी बोलेगी।"
पापा ने मेरी तरफ़ देखा।
"तो फिर," उन्होंने कहा, "हमें क्या करना है?"
मैंने एक गहरी साँस ली।
"मुझे एक बात कहनी है," मैंने कहा, "जो मैंने आज तक कभी तुमसे नहीं कही।"
"कहो।"
"मैं तुमसे नाराज़ था," मैंने कहा। "बरसों से। मुझे लगता था कि तुम चुप हो क्योंकि तुम्हें फ़र्क नहीं पड़ता। मुझे लगता था कि माँ बीमार हैं, घर टूट रहा है, और तुम चुप बैठे हो। मैंने तुम्हारी चुप्पी को तुम्हारी लापरवाही समझा।"
पापा ने मेरी तरफ़ देखा।
"मैंने सोचा था कि तुम मुझे कभी यह नहीं बताओगे," उन्होंने कहा। "मैं तुम्हारे नाराज़गी को देखता था। हर रोज़। पर मैं कुछ कह नहीं पाता था, क्योंकि मुझे लगता था कि तुम सही हो।"
"मैं सही नहीं था," मैंने कहा।
"मैं भी सही नहीं था," उन्होंने कहा।
हम दोनों चुप हो गए।
फिर मैंने कहा, "पापा, मैं तुमसे एक बात कहूँ?"
"कहो।"
"तुम्हारे बिना मैं यह सब नहीं कर पाता," मैंने कहा। "अगर तुमने उस रात अपना अंगूठा नहीं लगाया होता, तो हमारे पास वो काग़ज़ होता जो रणवीर ने तुमसे छीना है। और वो काग़ज़ ही होगा जो कल उसे हराएगा। तुमने गलती की, पर उसी गलती से एक तार बना, जिससे मैं आज खींच रहा हूँ।"
पापा की आँखें भर आईं।
वो कुछ कहना चाहते थे, पर उनका गला रुक गया।
मैंने उनका हाथ पकड़ा और उनकी तरफ़ घंटी को बढ़ाया।
"अब तुम इसे छूओ," मैंने कहा।
पापा ने घंटी को छुआ।
उस वक़्त घंटी गरम हो उठी।
और उसने आवाज़ की।
एक आवाज़, जो मैंने पहले कभी नहीं सुनी थी। न मेरी, न किसी और की। जैसे एक बूढ़ी औरत की आवाज़ हो, जो बहुत दूर से बोल रही हो।
"दो हाथ," उसने कहा। "अब दो हाथ नहीं, चार हैं।"
फिर घंटी चुप हो गई।
पर वो ठंडी नहीं थी।
मैंने पापा की तरफ़ देखा।
पापा मुस्कुरा रहे थे।
बरसों बाद।
और उस मुस्कान में वो चीज़ थी जो मैंने कभी नहीं देखी थी — हल्कापन।
"अब सो जाओ," उन्होंने कहा। "सुबह काम बहुत है।"
मैं लेट गया।
आँगन के फ़र्श पर।
और उस रात मुझे नींद आई, बहुत देर बाद, और उस नींद में कोई सपना नहीं था। सिर्फ़ एक आवाज़ थी, बहुत दूर की, जो कह रही थी — अब देखते हैं, अब देखते हैं।
सुबह मैं उठा तो सूरज निकल आया था और आँगन में पहले से खदबदाहट थी।
शबनम आपा की गुमटी पर चूल्हा जल चुका था। उस्ताद की दुकान से सिलाई मशीन की आवाज़ आ रही थी — टिक-टिक, टिक-टिक। इलाही भाई और फ़ैज़ ने उनके पास लाकर रखे हुए थे। पीपल पर बच्चे जुट रहे थे।
मैं उठा और मैंने देखा कि मेरे हाथ पर, जहाँ उँगली जली थी, उस पट्टी के नीचे अब दर्द नहीं था।
काजल ने मुझे चाय दी।
"आज क्या करना है?" उसने पूछा।
"सात बजे शालिनी," मैंने कहा। "दोपहर बारह बजे मशीन। इसके बीच में — कुछ।"
"क्या?"
"फाइल," मैंने कहा। "उस फाइल में सिर्फ़ ज़मीन नहीं है। उसमें उस्ताद की दुकान भी है। और जिस आदमी ने उस्ताद की दुकान को निशाना बनाया, वो मेरे पापा को भी निशाना बना चुका है। तो यह उसी आदमी का काम है।"
मैं उठा।
तभी मुझे याद आया कि चंद्रेश ने कल कहा था कि दोपहर बारह बजे मशीन उस्ताद की दुकान के सामने होगी, और शटर खुला नहीं मिलेगा।
मैंने काजल की तरफ़ देखा।
"उस्ताद का शटर अभी बंद है?"
"सुबह से खुला है," काजल ने कहा।
"तो फिर…"
मैं जूते पहनने लगा।
तभी दरवाज़े पर टिंकू आया। वो दौड़ रहा था और उसकी साँस फूली हुई थी।
"उस्ताद!" उसने चिल्लाया। "उस्ताद काका की दुकान के बाहर एक आदमी खड़ा है! हाथ में काग़ज़ है और वो… वो देख रहा है कि शटर कहाँ से खुलता है!"
मैंने उसे रोका।
"तुम ठीक हो?"
"हाँ," उसने कहा। "पर उस्ताद, वो आदमी अभी वहीं है। शबनम आपा उससे बहस कर रही हैं!"
मैंने पापा की तरफ़ देखा।
पापा उठ चुके थे।
"चलो," उन्होंने कहा। "देखते हैं कौन है।"
मैंने घंटी जेब में रखी।
वो गरम थी।
और जब मैंने दरवाज़ा खोला, तो पीपल के नीचे से आती सुबह की रोशनी में मुझे एक आदमी दिखा — सफ़ेद शर्ट, नीली पैंट, हाथ में लिफ़ाफ़ा।
वो मेरी तरफ़ मुड़ा।
"अंकुश यादव?" उसने पूछा।
"हाँ।"
उसने मेरी तरफ़ लिफ़ाफ़ा बढ़ाया।
"यह मेज़ पर मिला है," उसने कहा। "यह पता लिखा है।"
मैंने लिफ़ाफ़ा लिया।
ऊपर मेरा नाम नहीं था। सिर्फ़ एक लाइन थी, जिसकी स्याही अभी गीली थी।
"जो तुम्हारे पास है, उसका एक हिस्सा मेरे पास है। आज सात बजे। शालिनी के पास।"
मैंने नीचे भेजने वाले का नाम देखा।
नाम नहीं था।
सिर्फ़ दो लकीरें थीं और बीच में एक बिंदु।
जो निशान मुझे पहले भी मिला था।
चूल्हे के पीछे के दरवाज़े पर।
उस्ताद की घंटी के छल्ले पर।
और घंटी के भीतर, बहुत दूर, मुझे फिर एक आवाज़ आई।
"अब घर से बाहर।"
मैंने लिफ़ाफ़ा जेब में रखा।
और मैंने उस आदमी से, जो अभी चला नहीं था, एक सवाल पूछा।
"तुमने यह लिफ़ाफ़ा कहाँ से उठाया?"
"उस्ताद की दुकान के शटर के नीचे से," उसने कहा। "मैं वहाँ रोज़ सुबह पानी पीने जाता हूँ। आज वहाँ यह पड़ा था।"
"क्या तुमने शटर खोला?"
"नहीं," उसने कहा। "शटर बंद था।"
मैंने उसकी आँखों में देखा।
वो झूठ नहीं बोल रहा था।
मैंने पापा की तरफ़ देखा।
उनकी आँखें चौड़ी थीं।
"अगर शटर बंद था," मैंने कहा, "तो यह लिफ़ाफ़ा नीचे से कैसे आया?"
कोई जवाब नहीं था।
हवा रुक गई थी।
सिर्फ़ उस्ताद की सिलाई मशीन की आवाज़ आ रही थी — टिक-टिक।
और उस आवाज़ के नीचे, बहुत धीमे, एक और आवाज़ थी।
किसी के चलने की।
लकड़ी के जूते।
बहुत दूर से।
हमारी तरफ़ आ रहे थे।
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