The Mysterious Bell – Chapter 1312
कुछ चीज़ें जल्दी पूछने से टूट जाती हैं। मैंने बहुत बार देखा था — किसी के टूटे हुए को जल्दी खींचने से वो और फट जाता है।
शालिनी ने अपनी कलाई पर बँधी घड़ी को देखा, जो शायद रुकी हुई थी, क्योंकि उसने देखने के बाद भी वक़्त का कोई हिसाब नहीं बताया। फिर वो बोली।
"मशीनें भी चली गईं। प्रेस की दो बड़ी मशीनें। पापा ने उन्हें अपने हाथों से खड़ा किया था, एक-एक पुर्ज़ा बाज़ार से लाकर। चंद्रेश सर ने काग़ज़ों में उन्हें गिरवी दिखा दिया। पापा ने कहा — बेटा, यह मेरी गलती है, मैंने अंगूठा लगाया। और फिर वो बैठ गए। बैठे रहे। तीन दिन। चौथे दिन डॉक्टर आए और बोले कि दिल ने हार मान ली है और अब हार नहीं सकता, इसलिए सँभलकर रहना पड़ेगा।"
मैंने पूछा, "तुम्हारे पापा अब?"
"अब वो चलते हैं। दवा लेते हैं। और रोज़ सुबह चार बजे उठकर उस खाली दुकान के सामने खड़े हो जाते हैं जो अब हमारी नहीं है। सिर्फ़ खड़े रहते हैं। कुछ नहीं करते।"
मैंने अपनी जेब में हाथ डाला।
घंटी थी। बर्फ़ जैसी।
पर उस बर्फ़ में भी कुछ था, जो मुझे चुप नहीं रहने दे रहा था।
"तुमने मुझसे एक बात कही थी," मैंने कहा। "सफ़ेद फाइल की कॉपी।"
"हाँ।"
"कब?"
शालिनी ने चारों तरफ़ देखा। गुमटी के पीछे कोई नहीं था; शबनम आपा का चूल्हा भी उस वक़्त बंद था। सिर्फ़ भाप उठ रही थी एक बर्तन से, जिसे किसी ने ढक दिया था — जैसे उस भाप को भी किसी से नहीं मिलना है।
"आज रात नहीं," उसने कहा। "सर आज रात दफ़्तार में हैं। पर कल सुबह। सात बजे। जब वो दफ़्तार आते हैं, उनका पहला काम चाय है, दूसरा फोन और तीसरा दराज़। दराज़ के पास जाने से पहले वो आधा घंटा बैठक में बिताते हैं। मुझे वो आधा घंटा चाहिए।"
"आधा घंटा," मैंने दोहराया।
"आधा घंटा," उसने कहा। "और उस दौरान फाइल उस कमरे से बाहर होनी चाहिए। क्योंकि अगर मैं उसे वहीं कॉपी करती रही और वो लौट आए, तो…"
"तो तुम्हारी नौकरी," मैंने कहा।
"नौकरी बाद की बात है," उसने कहा। "अगर वो जान गए तो पापा की दुकान वाला काग़ज़, जो अभी उनके दराज़ में है, वो कभी नहीं मिलेगा। और पापा रोज़ चार बजे उस दुकान के सामने खड़े रहेंगे। मेरा यही नहीं जाता।"
मैंने कुछ देर उसे देखा।
फिर मैंने कहा, "ठीक है। सात बजे।"
"पर एक बात," उसने कहा। "फाइल में जो है, वो सिर्फ़ अस्पताल की ज़मीन नहीं है। उसमें और भी पन्ने हैं। गली की सात दुकानें, उस्ताद की दुकान का पुराना काग़ज़, और एक पन्ना जिस पर सिर्फ़ एक नाम है और उसके आगे एक तारीख़।"
"कौन सा नाम?"
"वो मैं नहीं पढ़ पाई," उसने कहा। "सिर्फ़ इतना दिखा कि नाम के आगे 'उस्ताद' लिखा था। और नीचे एक लाइन — 'शटर बंद, मशीन बारह बजे'।"
मेरे हाथ में पकड़ी घंटी एक झटके में हिली।
एक छोटी सी हरकत। जैसे कोई सोते हुए आदमी करवट बदले।
शालिनी ने नहीं देखा।
पर मैंने देखा।
"मुझे जाना है," मैंने कहा।
"अंकुश।"
"हाँ।"
"तुमने आज मंच पर कहा था कि घंटी… वो गायब हुई थी, तुम्हारे पापा की मृत्यु के वक़्त। सच था?"
मैंने उसकी आँखों में देखा।
"मेरे पापा ज़िंदा हैं," मैंने कहा।
"मुझे पता है," उसने कहा। "मैं मंच की बात कर रही हूँ। तुमने यह क्यों कहा?"
"क्योंकि मुझे वही बताया गया था," मैंने कहा। "और आज शाम मुझे पता चला कि जो मुझे बताया गया था, वो अधूरा था।"
शालिनी ने एक गहरी साँस ली।
"अधूरा सच," उसने कहा, "पूरे झूठ से ज़्यादा खतरनाक होता है। मेरे पापा ने भी अधूरा सच सुना था — कि लाइसेंस मुफ़्त मिलेगा।"
वो मुड़ी और चली गई।
मैं गुमटी के पीछे कुछ देर खड़ा रहा।
फिर मैंने अपनी जेब से घंटी निकाली और उसे हथेली पर रखा।
वो ठंडी थी।
पर उस ठंड में एक तार था, जो खिंच रहा था।
मैंने धीरे से कहा, "तू क्या कह रही है?"
कोई जवाब नहीं।
"तू बोल," मैंने कहा। "मैं सुन रहा हूँ।"
फिर भी कोई जवाब नहीं।
पर उस वक़्त, उसी वक़्त, मुझे महसूस हुआ कि घंटी का वज़न बदल रहा है। जैसे उसके अंदर कुछ खिसक रहा हो।
मैंने उसे कान के पास लाया।
और मुझे एक आवाज़ आई।
बहुत धीमी। बहुत दूर। जैसे किसी दूसरे घर से आती हुई।
घर।
सिर्फ़ एक शब्द।
फिर चुप्पी।
मैंने घंटी जेब में रखी और तेज़ कदमों से घर की तरफ़ चल दिया।
रास्ते में पीपल आया। उसके नीचे अंधेरा था। धूल का वो चौकोर निशान अब भी था, जहाँ से मेज़-कुर्सी हटी थी, और उस निशान को देखकर मुझे लगा कि ज़मीन याद रखती है। इंसान भूल जाता है, काग़ज़ भूल जाता है, पर ज़मीन नहीं।
गली के मोड़ पर एक छाया खड़ी थी।
मैं रुका।
छाया हिली।
पापा थे।
वो अपने हाथ में एक छोटी चीज़ पकड़े थे, जिसे उन्होंने मुझे देखते ही सीने से लगा लिया।
"पापा?"
"आ जाओ," उन्होंने कहा। "घर चलो।"
हम चुपचाप चले।
उन्होंने कुछ नहीं पूछा — न मंच की बात, न शालिनी की, न घंटी की।
और मैंने भी कुछ नहीं पूछा।
पर उस वक़्त मुझे लगा कि हम दोनों एक ही रास्ते पर चल रहे हैं, और बीच में वो दरवाज़ा है, जिसे आज खोलना है।
घर पहुँचकर मैंने देखा कि माँ जाग रही थीं।
उनका बुखार उतर आया था, पर चेहरा पीला था। काजल उनके सिरहाने बैठी थी और उनके माथे पर गीला कपड़ा रख रही थी।
"आ गया," माँ ने कहा।
"आ गया," मैंने कहा।
"फिर क्या सोच रहा है?"
"कुछ नहीं," मैंने कहा। "कल सुबह पापा से बात करनी है।"
माँ ने मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखों में कुछ था, जो न बुखार का था, न थकान का।
"आज ही कर," उन्होंने कहा।
"आपने कहा था कि बात कल सुबह।"
"मैंने तुमसे कहा था कि मेरी बात कल सुबह," उन्होंने कहा। "पर तुम्हारे और तुम्हारे पापा के बीच की बात मेरी नहीं है। वो तुम्हारी है। और वो कल तक टालने वाली नहीं।"
काजल ने मेरी तरफ़ देखा और धीरे से सिर हिलाया।
मैं बाहर आँगन में आया।
पापा चारपाई के पास बैठे थे। उनके हाथ में वही छोटी चीज़ थी — एक पुरानी पीली जिल्द वाली कॉपी, जो उन्होंने सीने से लगाकर रखी थी।
मैं उनके सामने बैठ गया।
पूरी गली सो रही थी।
सिर्फ़ दूर कहीं एक कुत्ता भौंक रहा था, और कभी-कभी पीपल की पत्तियों से कुछ गिरता था।
मैंने अपनी जेब से घंटी निकाली और उसे अपने और पापा के बीच फ़र्श पर रख दिया।
पापा ने घंटी देखी।
उनके हाथ काँपे।
"तुम जानते हो?" उन्होंने पूछा।
"मुझे नहीं पता कि क्या जानना है," मैंने कहा। "तुम बताओ।"
पापा ने कॉपी को सीने से हटाया और ज़मीन पर रख दिया।
फिर उन्होंने एक लंबी साँस ली।
"बाईस साल पहले," उन्होंने कहा, "जब तुम्हारी माँ अस्पताल में थीं, और मेरे पास एक भी काग़ज़ नहीं था जो रणवीर को हटा सके, तब मैं घर आया था। रात थी। मैंने उस कोठरी को देखा, जिसमें मेरे पापा का कुछ सामान रखा था। और मैंने वो कोठरी खोली। मुझे उम्मीद थी कि कहीं कुछ पैसा होगा, कहीं कुछ ऐसा होगा जो इलाज में काम आए।"
उन्होंने रुककर घंटी को देखा।
"उस कोठरी में पैसा नहीं था," उन्होंने कहा। "सिर्फ़ यह घंटी थी। और मेरे पापा का एक काग़ज़, जिस पर उनका नाम था। मैंने घंटी उठाई, और उसी वक़्त—"
वो रुके।
"उसी वक़्त क्या हुआ?" मैंने पूछा।
"उसी वक़्त घंटी ने बोला," पापा ने कहा। "मुझसे। मेरे कान में। मेरे पापा की आवाज़ में नहीं, अपनी आवाज़ में।"
मेरी साँस रुक गई।
"क्या कहा?"
वेबसाइट पर अपनी पसंदीदा कहानियाँ मुफ्त पढ़ें और Story FM App पर उन्हीं कहानियों का शानदार Audio Experience लें।
यह कहानी Story FM app पर ऑडियो में भी सुनें — आगे के एपिसोड सबसे पहले वहीं आते हैं।
Audio mein suno