The Mysterious Bell – Chapter 1311
"और तारीख़ नहीं है," इलाही ने कहा। "कानूनी काग़ज़ पर तारीख़ नहीं होती तो वो काग़ज़ नहीं, काग़ज़ का मज़ाक होता है।"
भीड़ में फुसफुसाहट फैली।
तभी दोपहर की तेज़ धूप में एक पतली छाया हमारी तरफ़ बढ़ी।
शालिनी आ रही थी।
हाथ में एक भूरा फ़ाइलनुमा लिफ़ाफ़ा था, जिसे उसने दोनों हाथों से सीने से लगाया हुआ था।
वो सीधी मेरे पास आई।
"अंकुश," उसने कहा। आवाज़ हल्की थी, पर काँप रही थी। "मुझे देर हो गई। मैं सीधे दफ़्तार से आई हूँ।"
"क्या हुआ?"
"चंद्रेश सर आज सुबह दस बजे शहर से बाहर चले गए। पर जाने से पहले उन्होंने एक आदेश छोड़ गए।" उसने लिफ़ाफ़ा खोला। "यह दुकान सिर्फ़ पहला कदम है। बारह बजे के बाद उनके आदमी मशीन लेकर आएँगे और गली के पाँच और काग़ज़ भी तैयार हैं। इसमें तुम्हारी दुकान भी है, अंकुश।"
भीड़ में सन्नाटा छा गया।
मैंने उस्ताद की तरफ़ देखा। उन्होंने मेरी तरफ़ देखा।
"और एक बात," शालिनी ने कहा। उसने अपनी आँखें मेरी आँखों में डालीं। "मैंने यह चुपचाप नहीं किया। मैंने उनके दफ़्तार से कुछ निकाला है।"
उसने थैले से एक मोटी सफ़ेद फाइल निकाली।
उस पर कोई नाम नहीं था। बस एक नीला गोल निशान, कोने पर।
"यह वही फाइल है," मीरा ने धीरे से कहा। "जिसकी कॉपी कल रात आई थी।"
"हाँ," शालिनी ने कहा। "पर कल रात की कॉपी में एक पन्ना नहीं था। यह वाला।"
उसने फाइल खोली।
भीतर, बाक़ी पन्नों के बीच, एक पीला पुराना पन्ना दबा हुआ था। सात बार मोड़ा हुआ, किनारों से घिसा, और उस पर नीली स्याही की लिखाई— पुरानी, घिसी, थोड़ी फैली हुई।
मैंने उसे पढ़ा।
"यह ज़मीन कभी बेची नहीं जाएगी, न गिरवी रखी जाएगी। नूर अस्पताल हमेशा रहेगा। इसका एक कमरा हमेशा गरीबों के लिए मुफ़्त रहेगा। जो इसे बदलेगा, उसका हिस्सा इस ज़मीन से हमेशा के लिए मिट जाएगा।"
नीचे तीन हस्ताक्षर थे।
पहला — शिवनारायण यादव।
दूसरा — निहाल इसरानी।
तीसरा — धुँधला, मिटा हुआ, जिसे मैं पढ़ नहीं पाया।
और उन तीन नामों के नीचे सात अंगूठे थे, गोल-गोल, लाल स्याही में, बरसों पुराने।
मेरे हाथ काँपने लगे।
"यह मेरे दादा का हाथ है," मैंने कहा।
"और यह डॉक्टर इसरानी का," शालिनी ने कहा। "तीसरा नाम किसी ने जान-बूझकर मिटाया है। पर अंगूठे नहीं मिटाए। अंगूठे मिटते नहीं, अंकुश। अंगूठे हिसाब होते हैं।"
मैंने घंटी जेब से निकाली।
और उस पल, उस पन्ने के ऊपर हाथ रखते हुए, घंटी में एक झुरझुरी हुई।
बहुत हल्की। बहुत धीमी। जैसे कोई बहुत दूर से, नींद में, मेरा नाम बोले।
"बोल," मैंने धीरे से कहा।
घंटी ने एक शब्द कहा।
"तीन।"
मैंने आँखें ऊपर कीं। शालिनी मेरी तरफ़ देख रही थी।
"तीन क्या?" उसने पूछा।
"तीन हाथ," मैंने कहा। "तीन हस्ताक्षर। और एक अधूरा।"
"तीसरा कौन है?"
मैंने घंटी को हिलाया। कुछ नहीं आया। घंटी फिर चुप हो गई।
इलाही ने आगे आकर पन्ने पर झुका हुआ नाम देखा।
"यह लिखाई…" उसकी आवाज़ रुक गई। "यह मेरे अब्बा की लिखाई जैसी है।"
"क्या?"
"मेरे अब्बा यानी इलाही बक्श। वो इस हस्ताक्षर में शामिल थे।" उसने अपनी उँगली मिटे नाम पर रखी। "पर उनका नाम यहाँ मिटाया गया है। मेरे अब्बा का नाम मिटाया गया है और उनका अंगूठा अभी भी नीचे है।"
उस्ताद कुर्सी से उठे। उन्होंने पन्ना अपने हाथ में लिया और देर तक देखा।
"यह तीसरा अंगूठा," उन्होंने कहा, "मेरे भाई का है।"
वहाँ खड़े सब लोग एक साथ साँस लेना भूल गए।
"मतलब यह ज़मीन," मीरा ने धीरे से कहा, "दादा जगदीश यादव, डॉक्टर इसरानी और इलाही बक्श, तीनों ने मिलकर अस्पताल को दी थी।"
"और यह काग़ज़," शालिनी ने कहा, "चंद्रेश सर ने जान-बूझकर छिपाया था। इसीलिए यह काग़ज़ असली फाइल में था और कॉपी में नहीं।"
तभी भीड़ के पीछे से किसी ने कहा, "दोपहर बारह बजे तक यह काग़ज़ किसी काम का नहीं। ताला लग चुका है।"
मैंने पलटकर देखा।
सफ़ेद कुर्ता, हाथ में फ़ाइल, चेहरे पर वो विनम्र मुस्कान जो मुझे अब किसी बीमारी जैसी लगती थी।
चंद्रेश का आदमी। मनोज।
"मनोज भाई," मैंने कहा। "आपने ग़लत दफ़्तार से काग़ज़ ले लिया है।"
"काग़ज़ वही होता है जो मुहर वाला हो," उसने कहा। "बाक़ी कहानियाँ पीपल के नीचे अच्छी लगती हैं पर अदालत में नहीं।"
"अदालत में काग़ज़ जाता है," मैंने कहा। "पर अदालत में इंसान भी जाता है। और आज सुबह आपने एक नहीं, दो जाली काग़ज़ लगाए हैं। एक इस दुकान पर, एक और?"
मनोज के चेहरे पर कुछ बदला। बहुत थोड़ा।
"आपकी गुमटी पर," मैंने कहा। "शबनम आपा, आपके चूल्हे के पीछे लगा कोई काग़ज़?"
शबनम आपा ने उसकी तरफ़ देखा और फिर दौड़कर गुमटी में गई।
वो एक मिनट में लौटी। उसके हाथ में एक काग़ज़ था जो स्याही में भीगा हुआ था।
"अस्थायी रूप से काम बंद," उसने पढ़ा। अपनी आवाज़ में, बिना झुके। "मेरी गुमटी। मेरे हाथ से। यह काग़ज़ सुबह नहीं था। यह अभी लगा है।"
मनोज ने कंधे उठाए। "मेरा काम काग़ज़ लगाना नहीं, काग़ज़ देखना है।"
"और जो काग़ज़ जाली है, उसे देखने वाला भी उसी जाल में आता है," शालिनी ने कहा।
वो अब मेरे साथ खड़ी थी। पीछे नहीं।
मनोज ने तीनों को देखा — शालिनी, मीरा और मुझे। फिर भीड़ को देखा, जो अब हमारे इर्द-गिर्द खड़ी थी, हमारे पीछे नहीं।
उसने अपनी फ़ाइल बंद की।
"दोपहर बारह बजे," उसने कहा। "मशीन यहाँ होगी। आप चाहे कितने काग़ज़ दिखा लें, शटर खुला नहीं मिलेगा। और अगर मिला, तो मशीन उसे गिराते वक़्त देख लेगी।"
वो मुड़ा और चला गया।
भीड़ में से कोई नहीं हिला। कोई नहीं बोला।
तभी बबलू आगे आया।
वो बिना चेन, बिना पानदान, बस सादे कुर्ते में था। उसकी आँखों में वो डर नहीं था जो पहले था। कुछ और था — शर्म।
"अंकुश," उसने कहा। "मैं वो काग़ज़ जला चुका हूँ जो साहब ने मुझे दिया था। पर मेरे पास एक और बात है।" उसने अपनी जेब से एक छोटी मुड़ी पर्ची निकाली। "यह साहब के दफ़्तार की दराज़ से है। सात काग़ज़ों वाली सूची है। उनमें से एक पर लिखा था — उस्ताद की दुकान।"
"सात काग़ज़," मीरा ने कहा। "मतलब यह सिर्फ़ हमारी गली नहीं। सात जगह।"
"और सातों का एक ही दिन," बबलू ने कहा। "आज।"
मैंने घंटी फिर जेब से निकाली।
बर्फ़ जैसी।
पर उस बर्फ़ के अंदर, बहुत दूर, एक आवाज़ थी, जो किसी ने सुनी और किसी ने नहीं।
शालिनी ने मेरी तरफ़ देखा। "क्या हुआ?"
"कुछ नहीं," मैंने कहा। "बस मुझे लगा कि घंटी कुछ कह रही है।"
"क्या कह रही है?"
"मुझे नहीं पता," मैंने सच बोला। "पर इतना पता है कि वो खुश नहीं है।"
शालिनी ने धीरे से कहा, "तो फिर ठीक है। मेरे पापा भी खुश नहीं थे। खुश लोग दुकानें नहीं खोते।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा। उसकी आँखें सूखी थीं, पर उनमें वो चीज़ थी जो बरसों के गुस्से के बाद आती है — एक ठंडी सी शांति।
"तुम्हारे पापा की दुकान?" मैंने पूछा।
"मेरे पापा की साइकिल मरम्मत की छोटी दुकान थी," उसने कहा। "और पीछे एक प्रेस। चंद्रेश सर ने पहले उन्हें मुफ़्त लाइसेंस का लालच दिया। फिर अंगूठा लिया। फिर साइकिल, मशीनशालिनी ने अपनी बात अधूरी छोड़ दी थी। वो "मशीन" कहकर रुक गई, जैसे उस शब्द ने उसका गला पकड़ लिया हो।
मैंने इंतज़ार किया।
वेबसाइट पर अपनी पसंदीदा कहानियाँ मुफ्त पढ़ें और Story FM App पर उन्हीं कहानियों का शानदार Audio Experience लें।
यह कहानी Story FM app पर ऑडियो में भी सुनें — आगे के एपिसोड सबसे पहले वहीं आते हैं।
Audio mein suno