The Mysterious Bell – Chapter 1310
मैंने आँखें बंद कर लीं।
"हाँ," मैंने कहा। "सिवाय एक शब्द के, सब सच था। और वो एक शब्द मैंने जान-बूझकर नहीं कहा। ज़ुबान फिसल गई।"
"या फिर तेरे अंदर कहीं वो डर बैठा है कि पापा एक दिन चले जाएँगे और तब भी तू उनसे बात नहीं कर पाएगा।"
मैंने कुछ नहीं कहा।
काजल चली गई।
मैं आँगन में अकेला रह गया, फ़र्श पर बैठा, अपनी उँगली पर बँधी पट्टी को देखता हुआ।
बाहर साइकिल वाला चला गया था। घंटी बंद हो गई थी। और उसके जाने के बाद गली इतनी चुप हो गई कि मुझे अपनी साँस की आवाज़ सुनाई देने लगी।
मैंने मेज़ से घंटी उठाई।
ठंडी थी। खोखली थी। पर मेरे हाथ में आते ही उसमें एक झुरझुरी सी हुई, जैसे कोई सोते हुए आदमी करवट बदले।
"तू सुन रही है?" मैंने धीरे से कहा। "मुझे पता है तू सुन रही है। बस मेरी तरफ़ से रास्ता बंद है।"
कोई जवाब नहीं आया।
"कल सुबह मैं पापा से बात करूँगा," मैंने कहा। "सीधी बात। आज तक जो नहीं की। और मैं तुझे साथ रखूँगा। तेरे बिना नहीं।"
इस बार भी कोई जवाब नहीं आया। पर घंटी का तापमान बदला। बर्फ़ जैसी ठंडक में एक कोना थोड़ा गुनगुना हो गया, और फिर वो भी ठंडा पड़ गया।
मैंने उसे जेब में रखा और आँखें बंद कर लीं।
नींद नहीं आई। बस आँखें बंद रहीं और दिमाग़ में एक ही बात घूमती रही।
घर। घर का कौन सा रिश्ता?
माँ से कोई रिश्ता टूटा ही नहीं था। काजल से तो कभी नहीं।
पापा।
बस पापा।
मैंने उनसे आज तक एक सीधी बात नहीं की थी। मैंने कभी नहीं पूछा कि आपको क्या हुआ। मैंने कभी नहीं पूछा कि आप रात भर क्यों जागते हैं। मैंने कभी नहीं पूछा कि आप उस बंद दरवाज़े से क्यों नहीं गुज़रते।
मैंने बस उन्हें चुप देखा था।
और मैंने उनकी चुप्पी को उनका स्वभाव मान लिया था।
यही टूटा हुआ था।
घर में एक दरवाज़ा था जो बंद नहीं था, पर खुला भी नहीं था। और वो दरवाज़ा पापा के और मेरे बीच था। हम दोनों उसके दोनों तरफ़ खड़े थे और दोनों को लग रहा था कि दूसरी तरफ़ से दरवाज़ा बंद है।
सुबह चार बजे मैं उठा।
चाय रखी। पापा का चश्मा मेज़ पर रखा था, टेप खुला हुआ।
मैंने टेप को उँगली से दबाया। चिपचिपा था। मैंने सोचा, आज टेप बदल दूँगा। फिर सोचा, नहीं। यही टेप उनका है। यही टेप उनकी आँखों की कहानी बताता है।
मैं पापा के कमरे के दरवाज़े पर गया।
दरवाज़ा खुला था।
चारपाई खाली थी।
मेरे हाथ ठंडे हो गए।
"पापा?"
कोई जवाब नहीं।
मैं घर के पिछले हिस्से में गया। चूल्हे के पीछे वाला दरवाज़ा बंद था। मैंने उस पर हाथ रखा। बर्फ़ जैसा। मेरी जेब में घंटी भी बर्फ़ जैसी थी।
"कहाँ हो तुम?" मैंने अपने आप से कहा।
तभी बाहर गली से आवाज़ आई। जूतों की आवाज़, फिर एक खाँसी, फिर किसी के चलने की वो खास लंगड़ी चाल।
मैं दौड़कर बाहर आया।
पापा दरवाज़े पर खड़े थे, हाथ में पानी का गिलास और एक पुराना लिफ़ाफ़ा। सुबह की ठंड में उन्होंने जैकेट नहीं पहनी थी। सिर्फ़ वही पुरानी कमीज़, जिसकी एक जेब फटी थी।
"आप कहाँ गए थे?" मेरी आवाज़ ज़्यादा ऊँची निकल गई। "इतनी सुबह? मैं डर गया था।"
पापा ने मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखें थकी थीं, पर डरी नहीं थीं।
"नल पर पानी भरने गया था," उन्होंने कहा। आवाज़ धीमी, पर साफ़। "और लिफ़ाफ़ा उठाया।"
"कौन सा लिफ़ाफ़ा?"
उन्होंने लिफ़ाफ़ा मेरी तरफ़ बढ़ाया।
पीला, मैला, कोना फटा हुआ। ऊपर कुछ लिखा नहीं था। बस एक छोटी सी गोल मुहर थी, फीकी नीली।
मैंने लिफ़ाफ़ा खोला।
अंदर एक काग़ज़ था। उस पर टाइप किए हुए अक्षर थे, टेढ़े-मेढ़े, जैसे पुरानी मशीन पर छपे हों।
"इस गुमटी में आने वाले हर आदमी के घर में पिछले दो महीने में कुछ टूटा है।"
बस यही एक लाइन।
मैंने पापा की तरफ़ देखा।
"यह कहाँ से आया?"
"तेरी दुकान के शटर के नीचे से। पत्थर दबाकर रखा था। मुझे सुबह दूध वाले ने बताया।"
मैंने लिफ़ाफ़े को पलटा। पीछे कुछ नहीं था। कोई मुहर, कोई तारीख़, कोई नाम।
"पापा, मैं आपसे एक बात पूछनी है।"
पापा रुक गए।
उन्होंने गिलास नीचे रखा। और उन्होंने मेरी तरफ़ ऐसे देखा जैसे बहुत दिनों से इस सवाल का इंतज़ार कर रहे हों।
"पूछ," उन्होंने कहा।
मेरा गला सूख गया। मैंने सोचा था कि बोलूँगा — पर जब वक़्त आया तो ज़ुबान ने जवाब दे दिया।
"पापा, आपने मुझे घंटी क्यों नहीं दी?"
पापा ने आँखें बंद कर लीं।
उनके चेहरे पर कोई झटका नहीं आया। कोई चौंक नहीं। सिर्फ़ एक थकान आई, जैसे कोई बहुत दूर तक चलकर आया हो और अब बैठना चाहता हो।
"क्योंकि मैं डर गया था," उन्होंने कहा।
बस तीन शब्द।
और मेरे अंदर कुछ टूट गया, पर अजीब तरीक़े से — टूटकर आराम मिला।
"डर किस बात का?"
"यही बात का कि तू मुझसे पूछेगा," पापा ने कहा। "और फिर मुझे सब बताना पड़ेगा।"
तभी गली के मुँह से शोर आया।
सानिया दौड़ती हुई आई, पीछे गुड्डू और रफ़ीक़। उसकी साँस फूली हुई थी और चेहरा लाल।
"उस्ताद भैया! उस्ताद की दुकान पर…"
मेरा दिल धक्क से रह गया।
"क्या हुआ?"
"नया ताला लगा है! बड़ा सा! और एक काग़ज़ भी चिपका है।"
मैंने पापा की तरफ़ देखा। पापा ने गिलास उठाया और बिना कुछ कहे चलने लगे। मैं उनके पीछे दौड़ा।
रास्ते में पापा ने धीरे से कहा, "अंकुश, बात अधूरी रह गई।"
"पता है, पापा।"
"पर आज पूरी होगी।"
मैंने उनका हाथ पकड़ लिया।
और पापा ने हाथ नहीं छुड़ाया।
उस्ताद की दुकान के बाहर भीड़ लगी थी। शबनम आपा गुमटी का चूल्हा बंद करके खड़ी थीं, हाथ में लोहे की चिमटी। भोला भाई दूर से देख रहे थे, मुँह में तौलिया दबाए। इलाही और फ़ैज़ दरवाज़े के पास खड़े थे और फ़ैज़ के हाथों में वही पीतल की पेटी थी।
शटर पर एक भारी काला ताला लगा था। तेल की पतली परत उस पर चमक रही थी, जैसे अभी लगाया गया हो।
ताले से जूट की रस्सी बँधी थी और उससे एक काग़ज़ लटक रहा था।
मैंने उसे पढ़ा।
"नीलामी के कारण दुकान का कब्ज़ा नगर निगम को। दोपहर बारह बजे तक सामान हटा लो।"
नीचे एक और लाइन थी, बहुत छोटी।
"अन्यथा कार्रवाई।"
उस्ताद कुर्सी पर बैठे थे। आँखें बंद थीं। इलाही उनके पास खड़े थे और उनका कंधा पकड़े हुए थे।
"उस्ताद," मैंने कहा।
उन्होंने आँखें खोलीं।
"मैंने पचास साल इस दुकान पर सिलाई की है," उन्होंने कहा। "पहला टाँका इसी शटर के नीचे लगा था। तेरे दादा ने मेरी मशीन की सुई का पहला छेद साफ़ किया था। और आज ये लोग मेरी दुकान पर बाहर से ताला डाल रहे हैं।"
उनकी आवाज़ में गुस्सा नहीं था। दर्द था। और दर्द भरी आवाज़, मुझे लगा, गुस्से से ज़्यादा डरावनी होती है।
"ताला तोड़ दूँ?" टिंकू ने कहा। वो कब आया, पता नहीं। उसके हाथ में पत्थर था।
"रख," मैंने कहा। "तोड़ने से हम ग़लत हो जाएँगे।"
"तो क्या करें?"
मैंने काग़ज़ फिर पढ़ा। टाइप किए हुए अक्षर टेढ़े थे। स्याही कुछ जगह फैली थी।
"मीरा कहाँ है?" मैंने पूछा।
"यहाँ हूँ।"
मीरा भीड़ को चीरकर आई। उसके बाल बिखरे हुए थे, कैमरा कंधे पर, और वो बिना साँस लिए काग़ज़ देखने लगी।
उसने उसे सूँघा। फिर अपनी उँगली से अक्षरों को रगड़ा।
"स्याही में कपूर की महक है," उसने कहा। "और किनारे बिल्कुल बराबर कटे हैं। नगर निगम का काग़ज़ ऐसा नहीं होता। यह चंद्रेश सक्सेना के दफ़्तार का है।"
"यानी मुहर असली है और काग़ज़ जाली," मैंने कहा।
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