The Mysterious Bell – Chapter 1309
अब भी कुछ नहीं।
“आपने मेरा हाथ खींचा था,” मैंने कहा। “जब रणवीर माइक ले रहा था। आपने मेरा हाथ पकड़कर मुझे नीचे खींचा।”
तब उन्होंने कहा, बहुत धीरे से, जैसे कोई बहुत दूर से बोल रहा हो—
“नहीं खींचा।”
मैंने उनकी तरफ़ देखा।
“मैंने पकड़ा था,” उन्होंने कहा। “खींचा नहीं।”
मैं कुछ नहीं बोला।
“अंकुश,” उन्होंने कहा, और मेरा नाम उनके मुँह से ऐसे निकला जैसे किसी पुराने संदूक की चाबी घूम गई हो। “तूने आज जो किया, वो सबके सामने किया। मैं सबके सामने कुछ नहीं कर पाया। बाईस साल में कुछ नहीं किया।”
“पापा—”
“मुझे बोलने दे,” उन्होंने कहा। उनकी आवाज़ नहीं काँपी। यही सबसे अजीब था। “कल से पहले। क्योंकि कल मैं बोलूँगा, और तब मेरी बात सुनी जाएगी। आज रात मैं सिर्फ़ इतना कहना चाहता हूँ कि मुझे पता है मैं कैसा लगता हूँ। मुझे पता है तू मेरी तरफ़ देखता है और सोचता है कि ये आदमी चुप क्यों है।”
“मैं ऐसा नहीं सोचता।”
“तू सोचता है,” उन्होंने कहा। “और सोचना चाहिए। मैं चुप था। मैं चुप रहा। और चुप्पी भी एक काम है। जब तुम कुछ नहीं करते, तब भी तुम कुछ कर रहे होते हो। बस वो किसी और के फ़ायदे का होता है।”
वो उठे।
“आज रात सो जा,” उन्होंने कहा। “कल सुबह उठना है।”
वो दरवाज़े की तरफ़ गए, फिर रुके। बिना पलटे बोले—
“वो जो आवाज़ आई ना… वो घंटी से नहीं आई थी। मैंने भी सुना था। मुझे भी सुनाई दिया था।”
मैं स्तब्ध रह गया।
“आपने सुना था?”
“हाँ।”
“तो आपने कुछ कहा क्यों नहीं?”
वो पलटे।
“क्योंकि,” उन्होंने कहा, “वो मेरे कान में नहीं आई। तेरे कान में आई। और जो आवाज़ बेटे के कान में आए, उसका जवाब बाप नहीं देता।”
वो अंदर चले गए।
मैं आँगन में अकेला रह गया।
मैंने घंटी उठाई और उसे हथेली में रखा।
बर्फ़ जैसी।
फिर मैंने उसे कान के पास ले जाकर हिलाया। कुछ नहीं। मैंने उसे माथे से लगाया। कुछ नहीं।
मैंने धीरे से कहा, “घर कौन सा रिश्ता है?”
घंटी चुप रही।
पर कमरे की हवा में कुछ हिला। बहुत हल्का। जैसे किसी ने साँस ली हो और फिर रोक ली हो।
मैंने घंटी मेज़ पर रख दी और उसके पास बैठ गया।
गली की आवाज़ें अब भी बाकी थीं। कोई शटर गिरा। किसी ने पानी डाला। कहीं दूर किसी बच्चे ने माँ को पुकारा और माँ ने जवाब दिया।
मैंने अपनी कॉपी खोली और उस पर पेंसिल से एक शब्द लिखा।
घर।
और उसके नीचे एक सवालिया निशान।
फिर मैंने कॉपी बंद कर दी और अपने जले हुए हाथ को अपनी छाती पर रखकर लेट गया, आँगन के फ़र्श पर, चारपाई से दूर, जहाँ से पूरी गली दिखती है और जहाँ से आसमान दिखता है।
और सोचता रहा।
घर का कौन सा रिश्ता?
माँ? माँ से तो कोई रिश्ता टूटा ही नहीं। माँ तो वही हैं।
काजल? वो तो सबसे पहले खड़ी होती है।
पापा?
मैंने आँखें खोलीं।
ऊपर आसमान था, जिसमें एक भी तारा नहीं दिख रहा था, जैसे आज आसमान ने भी अपने तारे छिपा लिए हों।
पापा।
वो मेरे पापा थे।
और मैंने उनसे आज तक एक सीधी बात नहीं की थी। मैंने उनसे कभी नहीं पूछा कि आपको क्या हुआ था। मैंने कभी नहीं पूछा कि आप रात भर जागते क्यों हैं। मैंने कभी नहीं पूछा कि आप उस दरवाज़े से क्यों नहीं गुज़रते।
मैंने बस उन्हें चुप देखा था।
और मैंने उनकी चुप्पी को उनका स्वभाव मान लिया था।
यही टूटा हुआ था।
घर में एक दरवाज़ा था, जो बंद नहीं था, पर खुला भी नहीं था। और वो दरवाज़ा पापा के और मेरे बीच था। हम दोनों उसके दोनों तरफ़ खड़े थे, और दोनों को लग रहा था कि दूसरा तरफ़ से दरवाज़ा बंद है।
मैंने करवट बदली।
मेरी उँगली दर्द कर रही थी।
मेरे सीने में कुछ था जो बैठ नहीं रहा था।
और उस वक़्त, उसी वक़्त, मुझे मंच की वो बात याद आई जो मैं किसी को नहीं बताना चाहता था।
रणवीर ने मेरे कान में कहा था कि बोलने वाला उसके पास है।
और अगर बोलने वाला उसके पास है, तो उसने आज घंटी को क्यों चुप कराया? वो तो चाहता था कि घंटी बजे और मैं हार जाऊँ। अगर घंटी उसके पास है, तो वो मुझे बजाने देता, और फिर मुझे हरा देता।
पर उसने कुछ और किया।
उसने मेरे बोलने से पहले ही मुझे हरा दिया। उसने मुझे बोलने ही नहीं दिया।
क्यों?
क्योंकि घंटी उसके पास नहीं है।
रणवीर झूठ बोल रहा था।
और मैंने उस झूठ को सच मानकर अपने आपको हरा हुआ मान लिया।
मैं बैठ गया।
मेरे हाथ काँप रहे थे और मैं मुस्कुरा रहा था। एक अजीब सी मुस्कान। जैसे कोई बहुत देर तक अंधेरे में रस्सी खोजता रहे और फिर पता चले कि रस्सी उसके हाथ में ही है।
घंटी मेज़ पर थी।
ठंडी।
खोखली।
चुप।
पर चुप नहीं।
क्योंकि चुप तो वो होती है जो कुछ कह न सके। और ये घंटी कह रही थी। बस मेरी सुनने की बारी नहीं आई थी।
मैंने हवा में धीरे से कहा, “तू कह रही है ना? बस मेरा रास्ता बंद है।”
और हवा ने, बहुत हल्के से, मेरे कान के पीछे, कुछ कहा। मुझे पूरा नहीं सुनाई दिया। सिर्फ़ एक शब्द।
घर।
मैंने आँखें बंद कर लीं।
कल सुबह मुझे पापा से बात करनी थी। सीधी बात। वो बात जो मैंने आज तक नहीं की थी।
और उसके लिए मुझे ये भी पता था कि मुझे अपनी घंटी को बजाना होगा। नहीं तो वो कभी नहीं समझेगा कि मैं सच में उसके पास आया हूँ।
बाहर गली में एक साइकिल की घंटी बजी।
किसी और की साइकिल।
मैं मुस्कुराया।
कम से कम कोई तो बज रहा था।
॥
बाहर साइकिल की घंटी बज रही थी।
रुकती नहीं थी। बजती जाती थी, जैसे कोई रोज़ रात इसी वक़्त हमारी गली से गुज़रता है और मुझे चिढ़ाने के लिए अपनी घंटी बजाकर चला जाता है।
मैं उठकर बैठ गया। फ़र्श ठंडा था, पर मेरी पीठ गरम थी। अंदर कुछ जल रहा था और वो घंटी से नहीं, मुझसे जल रहा था।
काजल माँ की चारपाई के पास बैठी थी और माँ की कलाई पकड़े हुई थी। उसने मेरी तरफ़ देखा भी नहीं, बस धीरे से बोली, "माँ सो गईं। डॉक्टर इसरानी की दवा का असर है। फ़िक्र मत कर।"
मैंने सिर हिलाया।
"तू भी सो जा। सुबह पापा से बात करनी है ना?"
मैं चौंक गया। "तूने कैसे जाना?"
"तू ज़ोर से नहीं बोला, अंकुश। तेरा चेहरा बोल रहा था।" उसने मुड़कर देखा। "और तेरी कॉपी खुली पड़ी है। उस पर घर लिखा है और नीचे एक सवालिया निशान।"
मैं हँस दिया। भारी हँसी। "तू अब पढ़ने वाली नर्स हो गई है।"
"मैं चारपाई पर सोने वाली बहन हूँ। पढ़ना मेरे हाथ की चीज़ है, तुझे बताने की ज़रूरत नहीं।"
फिर वो उठी, मेरे पास आई और बिना कुछ कहे मेरे सिर पर हाथ रख दिया।
हाथ ठंडा था। दवा, साबुन और थोड़ी सी नींद की गंध उससे आ रही थी।
"तेरी उँगली कैसी है?" उसने पूछा।
"जल रही है। अच्छा है।"
"अच्छा है?"
"हाँ। जब दर्द होता है तब पता चलता है कि हिस्सा अभी ज़िंदा है। जो दर्द नहीं करता, वो मर चुका होता है।"
काजल एक पल मेरी तरफ़ देखती रही। फिर बोली, "तू बहुत बड़ी-बड़ी बातें करने लगा है। पहले तू सिर्फ़ 'भूख लगी' बोलता था।"
"भूख भी लगी है।"
"रोटी रखी है। ठंडी हो गई होगी, पर घी ऊपर लगा है। खा ले।"
"खाऊँगा।"
वो चली गई। दरवाज़े तक गई, फिर रुकी और बिना पलटे बोली, "अंकुश, कल तूने मंच पर जो कहा, वो झूठ था ना?"
मेरे हाथ रुक गए।
"कौन सी बात?"
"वो बात। कि पापा की मृत्यु के वक़्त घंटी सिरहाने रखी थी। पापा ज़िंदा हैं। तूने 'पापा की मृत्यु' कहा था। मंच पर। सबके सामने।"
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