The Mysterious Bell – Chapter 1308
उन्होंने मुँह खोला।
मैंने देखा कि उन्होंने मुँह खोला। होंठ हिले। हवा अंदर गई।
और आवाज़ नहीं निकली।
उन्होंने फिर कोशिश की। फिर नहीं निकली।
फिर उन्होंने मुँह बंद कर लिया और आँखें नीची कर लीं।
वो खड़े रहे। बस खड़े रहे।
माँ ने उनकी तरफ़ देखा और कुछ नहीं कहा।
काजल ने भी नहीं कहा।
टिंकू ने मेरी तरफ़ देखा, फिर पापा की तरफ़, फिर वापस मेरी तरफ़।
और उसी वक़्त हवा में एक आवाज़ हुई।
घंटी से नहीं।
मेज़ पर घंटी रखी थी और घंटी ने कुछ नहीं किया। मैंने उसे देखा भी। वो वहीं पड़ी थी, अपनी जगह पर, बिल्कुल स्थिर।
आवाज़ कमरे की हवा से आई।
सूखी थी। रूखी थी। जैसे कोई पुराना काग़ज़ रगड़ा जाए। जैसे कोई लकड़ी का दरवाज़ा जिसकी कुंडी सालों से नहीं खुली, उसे हवा के एक झोंके ने ज़रा-सा हिला दिया हो।
और वो आवाज़ मेरे कान में सीधी उतरी।
बाहर से नहीं। जैसे कोई मेरे सिर के अंदर, कान की हड्डी के ठीक पीछे बैठकर बोल रहा हो।
उसने कहा—
“पहले तेरा अपना टूटा रिश्ता जुड़ेगा। तब घंटी पूरी बोलेगी।”
मैं उठ खड़ा हुआ।
“कौन?” मैंने कहा। मेरी आवाज़ ज़ोर से निकली। सबने मेरी तरफ़ देखा।
“कौन सा रिश्ता?” मैंने कहा।
काजल ने मेरा कंधा पकड़ा। “अंकुश, किससे बात कर रहा है तू?”
“बोल!” मैंने कहा। “कौन सा रिश्ता?”
हवा एक पल के लिए रुकी।
और फिर वही सूखी, रूखी, काग़ज़ जैसी आवाज़ आई।
जैसे किसी ने मेरे कान में एक शब्द रख दिया हो। बहुत हल्के से। बहुत धीरे से। इतने धीरे से कि लगा मैंने खुद ही सोचा हो।
शब्द था—
“घर।”
और फिर चुप्पी।
ऐसी चुप्पी जिसमें आँगन का बल्ब भी ज़ोर से सुनाई देने लगे। बल्ब गुनगुनाता रहा। कहीं दूर गली में एक कुत्ता भौंका, दो बार, फिर चुप हो गया। किसी का टीवी बज रहा था जिसमें कोई गाना चल रहा था और फिर किसी ने उसे बंद कर दिया।
मैं धीरे से बैठ गया।
फिर से।
इस बार मैं दीवार के सहारे नहीं बैठा। मैं सीधा बैठा। और मेरी नज़र मेज़ पर रखी घंटी पर थी।
वो अब भी बर्फ़ जैसी ठंडी थी।
मैंने हाथ बढ़ाया और उसे छुआ। कुछ नहीं हुआ। न गरमी, न आवाज़।
मैंने उसे उठाया। हिलाया।
चुप।
“तूने सुना?” मैंने काजल से पूछा।
“मैंने कुछ नहीं सुना,” वो बोली। उसकी आवाज़ डर गई थी।
“टिंकू?”
टिंकू ने सिर हिलाया। नहीं।
“माँ?”
माँ ने मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखों में बुखार था और उस बुखार के पीछे कुछ और भी था। कुछ ऐसा जो पहचानता था।
“क्या कहा उसने?” माँ ने पूछा।
मैंने बताया।
मैंने पूरा बताया—वो आवाज़ कैसी थी, कहाँ से आई, क्या कहा। मैंने ये भी बताया कि वो घंटी से नहीं आई थी।
माँ ने सुनकर आँखें बंद कर लीं।
“तो फिर वो घंटी नहीं थी,” उन्होंने कहा।
“माँ, वो और क्या था?”
“मुझे नहीं पता,” उन्होंने कहा। “पर जब घर बोलता है, तब घर के अंदर से बोलता है। बाहर से नहीं।”
मैंने अपनी जली उँगली को देखा। कपड़ा उतर गया था और नीचे सफ़ेद फफोला था, जिसके किनारे लाल थे। वो अब भी दर्द कर रहा था। धीरे-धीरे, हर दिल की धड़कन के साथ।
“घर,” मैंने कहा। शब्द मुँह में अजीब लगा। “घर का कौन सा रिश्ता?”
माँ ने कोई जवाब नहीं दिया।
काजल ने कोई जवाब नहीं दिया।
और पापा—वो अब भी दरवाज़े पर खड़े थे। पर अब उनका सिर उठा हुआ था। उनकी आँखें मुझ पर थीं। और मुझे कुछ ऐसा दिखा जो मैंने उनकी आँखों में पहले कभी नहीं देखा था।
वो डर नहीं था।
वो शर्म नहीं थी।
वो एक ऐसी चीज़ थी जिसका नाम मुझे उस वक़्त नहीं पता था, पर उसका असर मुझ पर सीधा हुआ। ऐसा लगा जैसे कोई मेरे सीने में हाथ डालकर कुछ ठीक कर रहा हो।
“पापा,” मैंने कहा।
उन्होंने होंठ हिलाए।
इस बार भी आवाज़ नहीं निकली।
लेकिन वो दरवाज़े की चौखट छोड़कर अंदर आए।
धीरे। एक कदम। दो कदम।
और मेरे पास आकर वो मेरे बगल में बैठ गए। फ़र्श पर। उसी जगह पर जहाँ मैं बैठा था, थोड़ी दूर, और उन्होंने अपने घुटने सीने से लगा लिए और सामने देखने लगे।
आँगन में हम पाँच लोग थे।
माँ चारपाई के किनारे बैठी थीं, हाथ में गीला कपड़ा। काजल उनके पास। टिंकू दरवाज़े के पास, कार्डबोर्ड माइक गोद में। मैं और पापा, बीच में।
और बीच में जो चीज़ बैठी थी, वो किसी इंसान से कम नहीं थी।
सन्नाटा।
पूरे आँगन में सिर्फ़ सन्नाटा बैठा था, और वो हमारे बीच में बैठा था, ठीक उसी तरह जैसे कोई तीसरा आदमी बैठता है जिसे किसी ने नहीं बुलाया और जो फिर भी चला आया।
मैंने दो बार बोलने की कोशिश की।
पहली बार: “पापा, वो काग़ज़ वाली बात…”
और पापा का हाथ रुक गया।
दूसरी बार: “पापा, आज मंच पर…”
और पापा का हाथ फिर रुक गया।
दोनों बार उनके हाथ रुके। मैंने देखा—उनका हाथ कुछ पकड़े हुए था, कोई औज़ार नहीं, कुछ नहीं। खाली था। पर रुक गया। जैसे कोई दरवाज़ा खुलते-खुलते बंद हो जाए।
फिर वो कुछ नहीं बोले।
बस वहीं बैठे रहे।
और मैंने भी कुछ नहीं बोला।
तभी माँ ने कहा, बहुत धीरे से, बुखार में भी उनकी आवाज़ में वो चीज़ थी जो सिर्फ़ माँ के पास होती है—
“आज नहीं।”
काजल ने उनकी तरफ़ देखा।
“आज इसका दिल छोटा हो गया है,” माँ ने कहा। “बात कल सुबह।”
काजल ने सिर हिलाया।
मैंने कुछ कहना चाहा, पर माँ की आँखों ने मना कर दिया। और मैं चुप हो गया। माँ सही थीं। माँ हमेशा उस वक़्त सही होती हैं जब हम गलत होते हैं और हमें पता नहीं होता।
टिंकू ने धीरे से कहा, “उस्ताद, मैं…”
“तू घर जा,” मैंने कहा।
“मैं रुक जाऊँगा।”
“तेरी माँ तेरा इंतज़ार कर रही होगी।”
वो उठा, फिर रुका।
“उस्ताद,” उसने कहा, “आज मंच पर… मैंने जो किया, वो…”
“तूने कुछ गलत नहीं किया,” मैंने कहा।
“पर उस्ताद, मैं डर गया था। मैं वहाँ बैठा था और मैं डर गया था।”
“सब डर गए थे, टिंकू,” मैंने कहा। “मैं भी।”
वो एक पल मेरी तरफ़ देखता रहा, फिर चला गया।
दरवाज़े की कुंडी की आवाज़ आई, फिर गली में उसके पैरों की आवाज़ दूर गई।
काजल ने माँ को चारपाई पर लिटाया। माँ ने मेरी तरफ़ देखा और मैंने उन्हें देखा। और उनकी आँखों में वो बात थी जो वो कहना चाहती थीं और नहीं कह रही थीं।
काजल ने मेरे पास आकर मेरा हाथ उठाया और उस पर पट्टी बाँधी। उसकी उँगलियाँ ठंडी थीं। उसने कुछ नहीं कहा। बस पट्टी बाँध दी और मेरी उँगली अपने हाथ में लेकर थोड़ी देर देखती रही।
“ये निशान रहेगा,” वो बोली।
“रहने दो।”
“मैं नहीं चाहती कि तू हर बार इसे देखकर वो शाम याद करे।”
“मैं उस शाम को नहीं भूलना चाहता,” मैंने कहा।
वो उठी और अंदर चली गई। दरवाज़े पर पर्दा हिला और फिर स्थिर हो गया।
आँगन में अब मैं, पापा और माँ थे। माँ की आँखें बंद हो चुकी थीं। बुखार की दवा असर कर रही थी।
और पापा मेरे पास बैठे थे।
हम दोनों बहुत देर चुप बैठे रहे।
और उस सन्नाटे में मुझे एक अजीब बात महसूस हुई। मैंने पापा की तरफ़ नहीं देखा, पर मुझे लगा कि उनकी तरफ़ से कोई गरमी आ रही है। कोई आवाज़ नहीं। कोई शब्द नहीं। बस गरमी।
जैसे पुरानी दीवार जो दिन भर धूप में तपी हो और रात को भी गरम रहे।
मैंने धीरे से कहा, बिना उनकी तरफ़ देखे, “आप आज बहुत देर तक खड़े रहे।”
उन्होंने कुछ नहीं कहा।
“मंच पर,” मैंने कहा। “आप मेरे पीछे थे।”
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