The Mysterious Bell – Chapter 1307
मेरे आते ही काजल ने सिर उठाया।
और मैंने उसके चेहरे पर वो चीज़ देखी जो मैंने कभी नहीं देखी थी। गुस्सा नहीं। ताना नहीं। मारने-पीटने वाली बात नहीं। सिर्फ़ डर। वो डर जो किसी के लौट आने के बाद भी नहीं जाता।
“माँ?” मैंने कहा।
“बुखार उतर रहा है,” काजल ने धीरे से कहा। “डॉक्टर इसरानी ने दवा दी थी। पी ली है। पर वो कह रही थीं कि तुम आओ तो जगाओ।”
“मैं आ गया,” मैंने कहा।
मैंने घंटी जेब से निकाली और मेज़ पर रख दी।
मेज़ पर माँ की हिसाब की कॉपी पड़ी थी। घंटी कॉपी के पास रखी, तो आवाज़ हुई। वो आवाज़ जो होती है जब कोई पीतल की चीज़ ज़मीन पर नहीं, लकड़ी पर गिरे। एक छोटी, खोखली आवाज़।
टन।
और फिर चुप्पी।
काजल ने घंटी की तरफ़ देखा। फिर मेरी तरफ़।
“इससे कुछ कहो,” वो बोली।
“क्या कहूँ?”
“तुम्हें पता है।”
मैं उस चीज़ के सामने बैठ गया जो पूरी गली में मेरी सबसे बड़ी ताक़त मानी जाती थी, और जो आज एक घंटी भर पीतल थी। ठंडी। बेजान। मेरी उँगली पर जले निशान के बराबर भी गरम नहीं।
टिंकू दरवाज़े के पास खड़ा था। उसके हाथ में वो कार्डबोर्ड का माइक था जिस पर उसने पेंसिल से “जोड़ स्कूल” लिखा था। मैदान में उसने वो माइक उठाकर उस्ताद के पक्ष में कुछ कहा था। मुझे पूरी बात याद नहीं। मुझे बस याद है कि उसकी आवाज़ काँप रही थी और फिर उसने ऊपर मुझे देखा था।
अब वो उसी माइक को सीने से लगाए खड़ा था, जैसे कोई बच्चा पानी में बहते हुए लकड़ी का टुकड़ा पकड़े रहता है।
“तुम बैठो,” मैंने उससे कहा।
“उस्ताद…”
“बैठो, टिंकू।”
वो बैठ गया। फ़र्श पर। चारपाई से सटकर। उसके घुटने पर पट्टी थी और पट्टी की गाँठ खुली हुई थी।
तभी माँ ने आँखें खोलीं।
वो बुखार में थीं। मुझे उनका बुखार पता था, हाथ लगाकर नहीं, उनके चेहरे से। तेज़ बुखार में इंसान की आँखें बड़ी दिखती हैं। अंदर कुछ सिकुड़ जाता है और बाहर आँखें फैल जाती हैं। माँ की आँखें आज बड़ी थीं। और साफ़ थीं।
वो उठीं।
“माँ, आप लेटी रहो—”
“चुप।”
एक शब्द। बस एक शब्द। और काजल का हाथ पहले से माँ के कंधे पर था, पर माँ ने उसे हटा दिया।
वो चारपाई से नीचे आईं। फ़र्श पर। मेरे पास। मेरे सामने वो बैठीं, और फिर उन्होंने अपनी गोद फैलाई, और मेरा सिर पकड़कर अपनी गोद में रख लिया।
मैं चौबीस साल का आदमी हूँ।
और मैं उस वक़्त एक बच्चा था।
माँ के हाथ में बुखार की गरमी थी। उनकी साड़ी में चूल्हे की गंध थी। उनका पल्लू कमर में खोंसा हुआ था, जैसे हमेशा रहता है, और उनके माथे पर चंदन का टीका आधा मिट चुका था।
उन्होंने मेरे बालों में हाथ फेरा।
“मेरा बेटा हारा नहीं,” उन्होंने कहा। “बस थका है।”
मेरे गले में कुछ अटक गया।
“माँ, सबके सामने—”
“मुझे पता है। मैं वहीं थी। काजल के कंधे पर खड़ी थी। मुझे सब दिखा।”
“तो आपको पता है कि मैंने क्या किया।”
“तूने क्या किया?” उन्होंने पूछा।
“मैंने उन्हें मंच दिया। मैंने घंटी बजाई और वो नहीं बजी। मैंने पूरी गली को बुलाया और उन्हें हँसने का मौक़ा दे दिया।”
माँ का हाथ मेरे सिर पर रुका।
“और तूने क्या किया?” उन्होंने फिर पूछा।
“मैंने उस्ताद की दुकान दाँव पर लगा दी।”
“और?”
“मैंने सबका भरोसा…”
“और?”
मैं चुप हो गया।
“तूने अपना सब कुछ दाँव पर लगाया,” माँ ने कहा। “ये बता, उन्होंने क्या दाँव पर लगाया था जो तूने उनका भरोसा लिया? उस्ताद ने अपनी दुकान तेरे हाथ में दी थी? इलाही ने? शबनम ने? या तूने खुद सब कुछ उठाकर अपने सिर पर रख लिया?”
मैंने आँखें बंद कर लीं।
माँ का बुखार मेरे कान से सटा था, और उनकी साँस गरम थी।
“मैं डर गया था,” मैंने कहा।
“अच्छा किया। डरना चाहिए। जो नहीं डरता, वो अगली बार भी वही गलती करेगा।”
“पर मैंने…”
“अंकुश,” उन्होंने कहा, और मेरा नाम उन्होंने ऐसे लिया जैसे किसी बर्तन को थाली में धीरे से रखते हैं। “तेरे पास जो है, वो मेरे पास भी नहीं है। तेरे पास वो घंटी है। और तेरे पास वो लोग हैं जो आज भी तेरी दुकान के सामने से गुज़रते वक़्त अंदर झाँकते हैं। उन्हें हँसने दो। हँसी चार दिन की होती है। काम लंबा होता है।”
मैं उठा।
मैं नहीं जानता कि क्यों उठा। मैं नहीं जानता कि उस वक़्त मेरे अंदर क्या चल रहा था। गुस्सा था, पर किस पर, ये मुझे खुद नहीं पता था। रणवीर पर? उस पर भी नहीं। खुद पर? वहाँ भी कोई ठोस चीज़ नहीं थी जिसे पकड़कर मैं कह सकूँ, ये तेरी गलती है।
सिर्फ़ एक चीज़ थी। वो चुप्पी। वो चुप्पी जो मंच पर नहीं थी, वो चुप्पी जो मेरी जेब में थी।
मैं आँगन की दीवार के पास गया और अपनी हथेली दीवार पर मार दी।
जोर से।
पूरे ज़ोर से नहीं। पूरे ज़ोर से मारता तो हड्डी जाती। बस इतना कि आवाज़ हो जाए और अंदर का कुछ बाहर निकल जाए।
धूल उड़ी। पुरानी दीवार थी। उस पर से चूना झरा और फ़र्श पर सफ़ेद बुकनी बिखर गई।
“सब मेरी गलती है!” मैंने कहा। मेरी आवाज़ अपनी ही नहीं लगी।
काजल उठी। टिंकू उठा।
“मुझे सभा में नहीं जाना चाहिए था,” मैंने कहा। “मुझे उस मंच पर नहीं चढ़ना चाहिए था। मैंने सोचा था कि अगर मैं सबके सामने खड़ा हो जाऊँगा, अगर मैं सच बोल दूँगा, तो सब अपने आप जुड़ जाएगा। मैंने सोचा था कि घंटी मेरे साथ है। मैंने सोचा था कि मैं…”
रुका।
“मैंने सोचा था कि मैं रणवीर से बड़ा हूँ,” मैंने धीरे से कहा। “बस यही। यही सच है। मुझे लगा कि मैं उससे बड़ा हूँ और मैंने मंच पर चढ़कर अपनी बात कह दी। और उसने एक आदमी बुलाया, सिर्फ़ एक आदमी, सफ़ेद कोट में, और मेरी पूरी बात हवा में उड़ गई।”
काजल ने मेरा हाथ पकड़ा। जला हुआ हाथ। मैंने झटका दिया।
“मत कर,” वो बोली।
“मैंने उस्ताद की दुकान दाँव पर लगा दी,” मैंने कहा। “तुम्हें पता है उनकी दुकान क्या है? पचास साल। पचास साल की सिलाई। उनकी माँ की पेटी उसी दुकान में है। और मैंने उसे एक शाम में एक सभा के लिए रख दिया।”
“उस्ताद ने खुद कहा था—” काजल बोली।
“उस्ताद ने क्या कहा था? उस्ताद ने कहा था कि सोच-समझकर चलना। और मैंने सुना नहीं।”
“तूने सुना था,” काजल ने कहा। उसकी आवाज़ अब कड़क हो गई थी, वो कड़क आवाज़ जो उसमें तब आती है जब वो गुस्से में होती है और गुस्से में सच बोलती है। “तूने सुना था और तूने तब भी वही किया जो करना था। क्योंकि रास्ता वही था। तू ये मत कर कि अब बैठकर अपने आपको सज़ा देने लगे। सज़ा देना सबसे आसान काम है। कोई तुझे इसके पैसे नहीं देगा।”
“काजल,” माँ ने धीरे से कहा।
“नहीं माँ,” काजल बोली। “वो अभी से शुरू हो गया है। मुझे पता है ये। ये रात भर खुद को कोसेगा, और सुबह उठेगा तो आँखें लाल होंगी और हाथ में रिंच होगी, और ये सबको यही कहेगा कि मैं ठीक हूँ। और फिर ये वही करेगा जो इसे करना है, पर अकेले। और अगली बार जब ये गिरेगा, तब कोई नहीं होगा जो इसे उठाए।”
मैंने उसकी तरफ़ देखा।
वो सही बोल रही थी।
यही सबसे ज़्यादा चुभता है। जब कोई तुम्हारे बारे में तुमसे ज़्यादा सही बोल दे।
मैं दीवार के सहारे बैठ गया। फ़र्श पर। धूल में।
तभी मैंने दरवाज़े की तरफ़ देखा।
पापा वहाँ खड़े थे।
वो आँगन में नहीं आए थे। दरवाज़े की चौखट पर, बाहर की तरफ़, अंधेरे में खड़े थे। उनका एक हाथ चौखट पर था और दूसरा नीचे लटका हुआ। उनका टेप से बँधा चश्मा नाक पर था, पर वो उसे ठीक नहीं कर रहे थे।
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