The Mysterious Bell – Chapter 1305
माँ वहीं, मंच के पास, पीली चुनरी और गमछे से मुँह ढके। सिर्फ़ आँखें दिख रही थीं। और उन आँखों में वो डर था जिसे मैं बचपन से पहचानता हूँ। वो डर जो माँ के चेहरे पर तब आया था जब पापा ने अंगूठा लगाया था, और जो अब कभी पूरा नहीं गया। काजल उनका हाथ पकड़े थी। काजल के होंठ हिल रहे थे, वो कुछ कह रही थी, शायद माँ को हिम्मत दे रही थी, शायद खुद को।
उस्ताद मंच के नीचे कुर्सी पर बैठे थे, आँखें बंद। उनकी उँगलियाँ अपनी लाठी पर थीं, बिल्कुल स्थिर। मैंने उन्हें कभी इतना स्थिर नहीं देखा था। इलाही भाई उनके पीछे खड़े थे और उनका हाथ उस्ताद की कुर्सी की पीठ पर था। फ़ैज़ अपनी पीतल की पेटी सीने से चिपकाए खड़ा था और उस आदमी को देख रहा था जो उसका बाप मानो आज पहली बार बना हो।
गोविंद भाई मेज़ के पास खड़े थे। उनकी मेज़ पर पुरानी फाइल, मोहरें, रसीदें और चार-पाँच पीले लिफ़ाफ़े पड़े थे। उन्होंने मेरी तरफ़ देखा और उनका हाथ काँपकर काग़ज़ों पर रुक गया। वो आदमी कहीं जा नहीं रहा था। वो वहीं मर रहा था, खड़े-खड़े।
बबलू पांडे सबसे पीछे खड़ा था, सफ़ेद कुर्ते में, बिना चेन, बिना पानदान। उसने मिठाई का डिब्बा लेने से इनकार कर दिया और लड़के को ऐसा देखा कि लड़का अपने आप हट गया।
और टिंकू।
टिंकू पहली पंक्ति में खड़ा था, आँखें बड़ी, और उसकी मुट्ठी में कुछ था। मैंने देखा, वो मुट्ठी में क्या दबा रहा है। वो मेरा कार्डबोर्ड माइक था, जिसे उसने खुद बनाया था और जिस पर पेंसिल से लिखा था "जोड़ स्कूल"।
उसने माइक ऊपर उठाया।
"उस्ताद सच बोल रहे थे!" उसने चिल्लाया, और उसकी आवाज़ फटी हुई थी, "उस्ताद झूठ नहीं बोलते!"
किसी ने नहीं सुना।
मीरा उसके पास आई और उसका कंधा पकड़ लिया।
और तभी मैंने वो देखा जो मैंने पहले नहीं देखा था।
चंद्रेश सक्सेना मंच के सबसे दाएँ कोने पर खड़ा था। उसके हाथ में एक फ़ाइल थी, और पीछे से दो आदमी एक बड़ी लंबी शीट लेकर आ रहे थे।
"धीरे," चंद्रेश ने मुस्कुराते हुए कहा, "सँभालकर। ये सारे मोहल्ले का सपना है।"
उन्होंने शीट खोली।
और मैदान में सबसे पहले वो चित्र आया।
एक इमारत। बहुत बड़ी। बहुत साफ़। चार मंज़िल, शीशे की खिड़कियाँ, नीचे हरा मैदान, फूलों की क्यारियाँ, बच्चों के झूले, एक बड़ा पार्क, और बीच में एक चमकता हुआ फव्वारा।
नीचे मोटे अक्षरों में लिखा था — "नई शुरुआत, नए सपने।"
भीड़ आगे बढ़ी। जो लोग जाने लगे थे, वो भी रुक गए।
"देखिए," चंद्रेश ने कहा, और उसकी आवाज़ में कोई ज़ोर नहीं था, सिर्फ़ मिठास थी, "यहीं, इसी ज़मीन पर। वही ज़मीन जिस पर आज एक टूटा दवाखाना खड़ा है, जहाँ करीब पंद्रह दिन में कुछ नहीं बचेगा। यहाँ बच्चों के लिए खेल का मैदान होगा। यहाँ हर गरीब के लिए मुफ़्त इलाज होगा। मुफ़्त दवा। मुफ़्त जाँच। सुबह से शाम तक काम, कोई काग़ज़ नहीं, कोई अंगूठा नहीं, कोई वकील नहीं।"
"सच?" भीड़ में से एक औरत बोली।
"सच," चंद्रेश ने कहा। "और ये सब सिर्फ़ इसलिए कि हमारे साहब ने कहा—मेरी माँ इसी बस्ती की थी।"
भीड़ में तालियाँ फिर बजीं। इस बार थोड़ी ईमानदार। और यही सबसे डरावना था। क्योंकि झूठ जब ईमानदार लगने लगे, तो सच बचता ही नहीं।
मैंने माइक की तरफ़ कदम बढ़ाया।
एक कदम। दो कदम।
"मैं सिर्फ़ एक बात कहना चाहता हूँ!" मैंने अपनी आवाज़ में जितनी ताक़त थी डाली। "ये ज़मीन—"
और माइक चुप हो गया।
मैंने देखा, मंच के पीछे खड़ा एक आदमी माइक का तार खींचकर अपनी जेब में डाल रहा था। उसने मेरी तरफ़ देखा भी नहीं। बस तार खींचा, जेब में डाला और एक कदम पीछे हो गया।
मैंने फिर बोला। मेरी आवाज़ निकली।
कोई नहीं सुना।
मैंने ज़ोर लगाकर चिल्लाया — "ये ज़मीऩ किसी की नहीं है! ये नूर अस्पताल की है! ये छह सौ मरीज़ों की है!"
मेरी आवाज़ मंच के पहले पाँच कदम तक गई और हवा में मर गई।
मैदान में हँसने की आवाज़ें चल रही थीं। मिठाई के डिब्बे खुल रहे थे। कोई बच्चा रो रहा था। कोई औरत अपनी साड़ी का पल्लू ठीक कर रही थी।
यही सच्चाई है ना। जब भीड़ खुश हो रही हो, तुम चिल्लाओ भी तो कौन सुनेगा।
मीरा ने अपना फोन निकाला।
"मैं लाइव करूँगी," उसने कहा, और उसकी आवाज़ में जो था वो मैंने पहले कभी नहीं सुना था — डर नहीं, ज़िद। "मेरे चैनल पर छह हज़ार लोग हैं। अगर ये सब उन्होंने सुना—"
उसने फोन उठाया। स्क्रीन खोली। लाइव का बटन दबाया।
और स्क्रीन पर लिखा आया — "नेटवर्क नहीं है"।
"एक मिनट," उसने कहा, और अपना हाथ ऊपर उठाया, जैसे हवा में सिग्नल ढूँढ रही हो। "एक मिनट, ये आ जाएगा।"
फिर वो रुकी।
उसने अपना सिर घुमाया।
मैदान के बाहर, पीपल की दूसरी तरफ़, जहाँ मोहल्ले का पुराना पीला टावर खड़ा था — वहाँ एक सफ़ेद गाड़ी खड़ी थी।
मैंने उसे भी देखा। और मेरे भीतर कुछ ठंडा हुआ।
वो गाड़ी हमारे मैदान की तरफ़ मुँह किए खड़ी थी। उसका शीशा बंद था। और मैं शपथ खाकर कह सकता हूँ कि उस गाड़ी के भीतर कोई था। चेहरा नहीं दिख रहा था। बस एक पीतल जैसी चमक थी, फिर वो गई।
"उसने टावर पर कुछ लगवा रखा है," मीरा ने बहुत धीरे कहा, जैसे खुद से बोल रही हो। "या उसने टावर वाले आदमी को बोल दिया है। जान-बूझकर।"
"इतना भी कर सकता है क्या कोई?" मैंने पूछा।
"पैसा वाला आदमी," मीरा ने कहा, और उसने फोन अपनी जेब में रख दिया, "कुछ नहीं करता, बस एक फोन कर देता है। उसका काम वहीं ख़त्म। मरने वाला तो हम होते हैं।"
और तभी मुझे मेरे हाथ पर एक हाथ महसूस हुआ।
मैंने पीछे देखा।
पापा।
वो मेरे ठीक बगल में खड़े थे। मैंने उन्हें आते नहीं देखा। वो मंच पर पहले भी मेरे साथ खड़े थे, पर जब मैंने घंटी बजाई थी और वो चुप रही, तो मुझे लगा वो कहीं पीछे चले गए होंगे।
वो पीछे नहीं गए थे। वो वहीं थे।
उन्होंने मेरा हाथ पकड़ा।
और मैं रुक गया।
क्योंकि मैंने पच्चीस साल में अपने पापा का हाथ कई बार पकड़ा था। साइकिल के हैंडल पर, औज़ार पकड़ाते वक़्त, दुकान की सीढ़ी पर। लेकिन आज उनके हाथ में कुछ और था।
ताक़त।
मैंने उनका हाथ पहचानने की कोशिश की। यही हाथ था जिसने बाईस साल एक काग़ज़ पर अंगूठा लगाया था, डर के मारे, बीवी के इलाज के लिए। यही हाथ था जो रात में सिलाई करते वक़्त काँपता था। यही हाथ था जो अब तक कभी मेरे हाथ से आगे नहीं बढ़ा था।
पर आज ये हाथ मेरे हाथ से ज़्यादा मज़बूत था।
"पापा," मैंने कहा, और मेरी आवाज़ टूटी, "मैं अभी—"
उन्होंने मेरा हाथ खींचा।
एक झटका। न ज़ोर वाला, न गुस्से वाला, बस एक ऐसा झटका जो किसी बच्चे को रास्ते से हटाता है जब सामने गाड़ी आ रही हो।
"चल."
बस एक शब्द।
मैं मंच की सीढ़ी की तरफ़ मुड़ा। लाल कालीन धूल भरा हुआ था। मेरा पैर उस पर फिसला और पापा ने मेरी कलाई और कसकर पकड़ ली।
नीचे उतरते वक़्त मैंने मैदान देखा। भीड़ धीरे-धीरे बिखर रही थी। कोई मिठाई का डिब्बा लेकर जा रहा था। कोई मुँह में मिठाई डालकर सिर हिला रहा था। कोई औरत कह रही थी — "अरे, अब ये लड़का भी क्या करे, बेचारा। माँ बीमार, बाप ने सच बोल दिया, अब बच्चा टूट गया।"
यही सबसे अजीब बात थी। अब वो मेरी तरफ़ नफ़रत से नहीं देख रहे थे।
वो मुझ पर तरस खा रहे थे।
और तरस, नफ़रत से ज़्यादा चुभता है।
एक बूढ़ा आदमी मेरे पास आया। वो रेडियो ठीक करने वाला बूढ़ा था, जिसकी लाठी का निचला सिरा घिसकर गोल पत्थर जैसा हो गया था। उसने मेरे कंधे पर हाथ रखा।
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