The Mysterious Bell – Chapter 1304
ये लाइन बोलते ही मेरा गला सूख गया। मैदान में कोई हिला नहीं।
"और उनके सिरहाने भी एक घंटी रखी थी। बिल्कुल ऐसी ही।"
मैंने हथेली खोली। पीली, घिसी हुई, मैली घंटी। उस पर बार-बार अँगूठे के निशान पड़ चुके थे, जैसे किसी ने सालों उसे पकड़कर रगड़ा हो।
"उस रात जब पापा गए, तो वो घंटी गायब थी। किसी ने उसे उठा लिया था। और मैं उसे ढूँढता रहा — दो साल, एक-एक गली, एक-एक दुकान, एक-एक मोहल्ला।"
मेरी आवाज़ अब नहीं काँप रही थी। ये आवाज़ मेरे भीतर से आ रही थी, वो आवाज़ जो रात में तकिये में बोलती है।
"और फिर एक औरत मेरे पास आई। जिसके हाथ में यही घंटी थी। उसने कहा कि ये मेरे पापा की है। उसने कहा कि इसे सुनो।"
मैंने भीड़ की तरफ़ देखा। सैकड़ों चेहरे, ऊपर उठी हुई ठुड्डियाँ, चमकती आँखें।
"मैंने सुना। सच में सुना। इस घंटी में किसी ने मेरा नाम बोला था।"
मैदान में एक हल्की सी आवाज़ उठी। कोई बोला, "अरे, ये तो…"
और फिर किशनलाल काका की आवाज़ आई, ऊँची, घबराई हुई — "अंकुश, बेटा, चुप हो जा।"
पर मैं चुप नहीं हुआ।
"मैं नहीं जानता वो कौन थी। मैं नहीं जानता उसे मेरा नाम कैसे पता था। पर मैं इतना जानता हूँ कि जो औरत मुझे ढूँढ रही थी, वो पागल नहीं थी। वो डर रही थी।"
मैंने उँगली उठाई।
"और ये आदमी जानता है वो क्यों डर रही थी।"
रणवीर ने एक पल इंतज़ार किया। जान-बूझकर इंतज़ार किया, इतना कि मेरी आख़िरी लाइन हवा में लटकती रहे और भीड़ उसे पचा न पाए। फिर उसने बहुत धीरे हाथ बढ़ाया और मेरे हाथ से माइक ले लिया — इतने प्यार से, जैसे कोई बड़ा भाई छोटे भाई से कोई नुकीली चीज़ छीनता हो।
"बेटा," वो बोला, और उसकी आवाज़ में नमी आ गई, "तुम्हारे पापा गए, ये दुख की बात है। भगवान उन्हें जगह दे।"
भीड़ ने सिर हिलाए। कुछ औरतों ने आँचल से आँखें पोंछीं।
"लेकिन तुम ये नहीं जानते कि उस औरत की हालत क्या थी।"
उसने हाथ उठाया। भीड़ में से एक आदमी आगे आया — सफ़ेद कोट, चश्मा, हाथ में फ़ाइल। मैंने उसे पहचाना। वो वही डॉक्टर था जो पापा के वार्ड में रोज़ आता था और कभी मेरी तरफ़ देखता भी नहीं था।
"डॉक्टर साहब," रणवीर ने कहा, "आप बताइए। सच बताइए, कोई शर्म नहीं।"
डॉक्टर ने फ़ाइल खोली और बिना मेरी तरफ़ देखे बोला, "ये औरत हमारे पुराने वार्ड की मरीज़ थी। बहुत साल। उसे लगता था कि मंदिर की घंटियाँ उससे बात करती हैं। वो मंदिरों से घंटियाँ उठा लेती थी।"
भीड़ में हँसी की एक लहर उठी। छोटी, ठंडी, बुरी हँसी।
"अब आप समझे?" रणवीर ने कहा, बिना ज़ोर दिए, बिना चिल्लाए। "इस बच्चे का दिल साफ़ है। इसके पापा गए, इसे कुछ सुनाई दिया, इसे लगा कि कोई बोल रहा है। पर सच ये है कि एक बीमार औरत ने एक दुखी बच्चे के हाथ में एक पुरानी घंटी पकड़ा दी।"
"पर उसे मेरा नाम कैसे पता था?" मैं चिल्लाया। माइक उसके हाथ में था, इसलिए मेरी आवाज़ आधी ही निकली। "बताओ ना! उसे मेरा नाम कैसे पता था?"
रणवीर ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में वो चीज़ नहीं थी जो झूठ बोलने वाले की आँखों में होती है। उसकी आँखों में सिर्फ़ हिसाब था। जैसे कोई दुकानदार तराज़ू पर बाट रख रहा हो।
"बेटा," वो मुस्कुराया, "अस्पताल में सबको सबका नाम पता होता है।"
और भीड़ हँसी। इस बार ज़ोर से।
मैंने अपने भीतर वो आवाज़ ढूँढी जो अभी बोली थी। वो नहीं थी। दरवाज़ा बंद हो चुका था।
उस्ताद ने अचानक आँखें खोल दीं। उन्होंने मेरी तरफ़ देखा, और उनके होठ हिले, और इस बार मैं सुन पाया। बहुत धीमे, बस इतना — "अब नहीं। अब बंद करो।"
पर मैं कुछ नहीं कर पाया।
मैंने पीछे मुड़कर देखा। गुड्डू वहीं खड़ा था, हाथ जेब में, आँखें नीची। उसने मुझे देखा और मुस्कुराने की कोशिश की, पर मुस्कान आधी बनकर टूट गई। मीरा ने कैमरा नीचे कर दिया था। वो मेरी तरफ़ देख रही थी, और उसके चेहरे पर वो भाव था जो लोग अपने घरवाले के चेहरे पर तब देखते हैं जब वो ज़मीन पर गिर पड़े हों — ऊपर उठाने का नहीं, देखने का भाव।
भीड़ धीरे-धीरे बिखरने लगी। कोई अपनी चप्पल पकड़ रहा था, कोई बच्चे को कंधे पर बैठा रहा था, कोई अपने पड़ोसी से कह रहा था कि चलो, रात हो गई।
रणवीर ने माइक अपने मुँह के एकदम पास किया। उसकी मुस्कान चौड़ी हो गई — बहुत चौड़ी — और उसने धीरे से कहा, इतने धीरे कि माइक भी सिर्फ़ सुन सके और सारा मैदान भी सुन सके —
"देखा? मैंने कहा था ना। ये सिर्फ़ शोर है।"
और मेरी हथेली में घंटी बर्फ़ जैसी ठंडी हो गई।
॥
हँसी पहले चार आदमियों से शुरू हुई। फिर आठ हुए। फिर बीस। और फिर वो लहर बन गई जो मेले में पतंग के डोर की तरह एक जगह से दूसरी जगह खिंचती है।
"देखा, मैंने कहा था ना।"
"मैं तो तब ही बोल रहा था, ये लड़का सीधा नहीं है।"
"अरे, बेचारा है। बाप गया। दिमाग़ हिल गया।"
"घंटी बजाकर गली को बर्बाद करने निकला था। भगवान का शुक्र है, सच सामने आ गया।"
मैं मंच पर खड़ा था। मेरा हाथ, मेरे शरीर के साथ किसी और चीज़ का लग रहा था। मेरे कानों में भीड़ की आवाज़ आ रही थी, पर वो अंदर तक नहीं पहुँच रही थी। जैसे कोई दरवाज़े पर खड़ा हो और पीछे से बोले, और अंदर कोई न हो जो सुने।
मैंने अपनी हथेली में देखा। घंटी वहीं थी। पीतल की वही पुरानी घंटी। जिसे मैंने पहली बार छुआ था तो वो गरम थी, जैसे किसी के हाथ से आई हो। जिसने मेरे कान में पहला शब्द बोला था। जिसने रात में मुझे जगाया था। जिसके बिना मैं कभी किसी असली बात तक नहीं पहुँचा था।
अब वो बर्फ़ जैसी थी।
न सिर्फ़ ठंडी। जमी हुई। दो दिन की छुप्पी। मरे हुए जैसी।
मैंने उसे फिर हिलाया। घंटी की ज़ुबान चुप। मैंने उसे अपने माथे से लगाया। कोई आवाज़ नहीं। कोई साँस नहीं।
रणवीर ने माइक अपने मुँह के पास रखा और वो आख़िरी लाइन बोली, जो मेरे पीछे पूरे मैदान में गूँज गई।
"देखा? मैंने कहा था ना। ये सिर्फ़ शोर है।"
और तालियाँ बजीं।
नहीं, तालियाँ उसके आदमियों ने बजाईं। लेकिन जब आदमी ताली बजाते हैं, तो और आदमी भी बजा देते हैं। क्योंकि ताली बजाने में सोचना नहीं पड़ता।
फिर मैदान के दोनों कोनों से दो लड़के आगे आए। दोनों सफ़ेद कुर्ते में थे और दोनों के हाथ में बड़े सुनहरी डिब्बे थे।
"मिठाई!" एक लड़का बोला, ऐसे जैसे कुछ न हुआ हो। "आज साहब के शहर को सौगात मिली है। सब खाइए, सब खाइए।"
डिब्बे खुले और केसर और इलायची की खुशबू पूरे मैदान में फैल गई।
वो खुशबू मुझे कहीं ले गई। कहीं उस दिन, जब रणवीर गली में आया था और अपने चमकीले गोल टॉफ़ी के डिब्बे से बच्चों को टॉफ़ी दे रहा था। टिंकू ने तब पूछा था कि इसमें ज़हर तो नहीं है। मैंने तब उसको डाँटा था। आज लगा, बच्चा सही पूछ रहा था।
"अरे, ये लो भाई।" एक लड़के ने मेरी तरफ़ डिब्बा भी बढ़ा दिया, "आप भी खा लीजिए। मीठा खाइए, दिल साफ़ होगा।"
मैंने अपना हाथ पीछे खींच लिया।
उस लड़के के चेहरे में मज़ाक भी नहीं था। वो सिर्फ़ काम कर रहा था। और यही सबसे बुरा था। अपमान वो नहीं होता जिसमें गुस्सा हो। अपमान वो होता है जिसमें कोई गुस्सा भी न करे।
मैंने पीछे मुड़कर देखा।
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