The Mysterious Bell – Chapter 1298
"मैं वहाँ सबके सामने हूँगा," रणवीर बोल रहा था। "चंद्रेश जी होंगे, डॉक्टर साहब को भी बुलाया है, गली के सब बुज़ुर्गों को बुलाया है। और उस नौजवान को भी बुलाया है। वो आए, मंच पर आए, और सबके सामने वो घंटी बजाए।"
उसने रुककर मुस्कुराया।
"मैं नहीं कहता कि घंटी में कुछ है या नहीं। मैं तो उससे यही कहूँगा — भाई, आ जाओ, बजाओ। अगर जुड़ गया कुछ, तो मैं खुद आपके पैर छूकर माफ़ी माँगूँगा। और अगर नहीं जुड़ा…"
उसने कंधे उठाए।
"तो गली को पता चल जाएगा कि उसका काला जादूगर क्या है।"
काला जादूगर। उसने वो शब्द खुद नहीं बोला, उसने सबको बोलने पर मजबूर कर दिया। छह कैमरे उसकी तरफ़ थे, और हर कैमरे के पीछे एक आदमी जो अब इसी नाम से खबर लिखेगा।
"सर," मीरा ने अचानक कहा।
मैंने उसकी तरफ़ देखा। वो स्क्रीन के बहुत पास झुक गई थी।
"क्या हुआ?"
"उसने कहा — पूर्णिमा की शाम।"
"तो?"
"अंकुश, कोई सभा का दिन ऐसे नहीं बताता।" उसकी आवाज़ सूखी थी। "वो कहेगा — परसों शाम सात बजे। या — अगले रविवार। उसने 'पूर्णिमा' कहा। ये शब्द उसने फेंका नहीं है।"
मेरा पेट ठंडा हो गया।
क्योंकि पूर्णिमा वो नाम था जो मुझे एक टेप बँधे पुराने सूटकेस वाली औरत ने दिया था। पूर्णिमा वो नाम था जो ताले के छेद में फँसे पुराने पीले काग़ज़ पर लिखा मिला था। पूर्णिमा वो औरत थी जिसने मुझसे कहा था कि उसका नाम सातवें काग़ज़ पर है।
"वो जानता है," मैंने धीरे से कहा। "वो जानता है पूर्णिमा कौन है।"
माँ ने मेरी तरफ़ देखा। उन्होंने कुछ नहीं पूछा। बस देखा।
स्क्रीन पर चंद्रेश सक्सेना अब माइक की तरफ़ झुक रहा था।
"मैं एक बात साफ़ कर देना चाहता हूँ," उसकी मीठी आवाज़ आई। "हमारी तरफ़ से किसी पर कोई आरोप नहीं है। हमने कोई मुकदमा नहीं किया। हम सिर्फ़ सच को सबके सामने रखना चाहते हैं। जो सच बोलना चाहे, मंच खुला है। जो अपनी बात कहना चाहे, वो आए।"
और फिर उसने वो जोड़ा जो मैं कभी नहीं भूलूँगा।
"बस एक बात याद रखिएगा," उसने कहा। "मंच पर खड़े होकर जो बात कही जाती है, वो काग़ज़ पर आ जाती है। और काग़ज़ — काग़ज़ कभी नहीं भूलता।"
टीवी बंद हुई।
काजल ने रिमोट नीचे रखा। कमरे में जो रोशनी रह गई वो बल्ब की पीली थी और बहुत थोड़ी थी।
पापा ने चश्मा उतारा।
उन्होंने कमीज़ के पल्ले से उसे पोंछना शुरू किया। धीरे। बहुत धीरे। पहले बाएँ काँच को, फिर दाएँ को। फिर वही।
और फिर उनकी उँगलियाँ रुक गईं। काँच पर ठिठक गईं, जैसे रास्ते में कोई दरवाज़ा आ गया हो।
वो कुछ नहीं बोले।
मुझे उनसे यही उम्मीद थी। और मुझे उनसे यही डर भी लगता था।
फिर माँ ने कहा।
उनकी आवाज़ बुखार वाली थी — हल्की, फटी हुई। पर शब्द साफ़ थे, एक-एक अलग।
"जिसके पास सच होता है," माँ ने कहा, "वो सभा से नहीं डरता।"
कमरे में कोई हिला नहीं।
"वो डरता है," माँ ने आगे कहा, "जिसके पास सिर्फ़ काग़ज़ होता है। काग़ज़ बहुत बोलता है, बेटा। इसीलिए काग़ज़ वाले इतने सारे माइक लगवाते हैं।"
काजल ने माँ का हाथ पकड़े हुए ही सिर नीचा कर लिया। उसकी आँखें भर आई थीं, पर वो रोई नहीं। वो अठारह साल की है, मेरी छोटी बहन, और उस दिन मुझे लगा वो मुझसे बड़ी हो गई है।
"माँ," मैंने कहा।
"हाँ।"
"तू डरी नहीं?"
माँ ने मेरी तरफ़ देखा। और उन्होंने वो किया जो वो बहुत कम करती हैं — हल्का सा मुँह बनाकर मुस्कुराईं।
"मैं बाईस साल से एक काग़ज़ से डर रही हूँ," उन्होंने कहा। "अब उससे ज़्यादा किसी चीज़ से क्या डरूँगी?"
और फिर, बहुत हल्की आवाज़ में, जैसे कोई अपने आप से बोल रहा हो —
"और वो घंटी बजाने की बात… उसका जवाब मैं नहीं दूँगी। तू देगा। पर तू अकेला मत देना।"
बाहर दरवाज़े पर खटखट हुई।
फ़ैज़ खड़ा था, साँस फूली हुई। उसके पीछे टिंकू और सानिया।
"चाचा," फ़ैज़ ने कहा। "उस्ताद कह रहे हैं — अभी आ जाओ। और… और गली के लोग आ रहे हैं।"
"कौन?"
"बहुत लोग," टिंकू ने कहा। उसकी आँखों में वो चमक थी जो डर में भी आ जाती है। "भोला भाई, नसीमा बाई, किशनलाल काका, और… और गुड्डू की अम्मी भी आई हैं।"
मैं उठा। माँ ने मेरा हाथ पकड़ा।
"जा," उन्होंने कहा। "पर सुन — जो आज डरकर आया है, उसे मत झिड़कना। डरा हुआ आदमी सबसे पहले अपनी इज़्ज़त बचाना चाहता है। उसे इज़्ज़त देकर बात करना।"
मैंने सिर हिलाया और निकल पड़ा।
गुमटी के बाहर तीस-चालीस लोग खड़े थे।
शबनम आपा ने बेंच पर एक बड़ी केतली रखी थी और कुल्हड़ भी। पर किसी ने चाय नहीं छुई थी। जब मैं आया तो सब एक साथ बोल पड़े और मुझे कुछ समझ नहीं आया — आवाज़ें ऊपर-नीचे हो रही थीं, कोई कह रहा था कि हमें सभा में जाना चाहिए, कोई कह रहा था कि हमें बिल्कुल नहीं जाना चाहिए।
फिर शबनम आपा ने थाली उठाई और पीतल की थाली पर चिमटी पटक दी।
"चुप," उन्होंने कहा। "एक-एक करके।"
भोला भाई ने पहले कहा। उनकी आवाज़ हल्की थी।
"बेटा, मैं सीधी बात करूँ? मेरी दुकान है। मेरा बेटा उसकी साइट पर सीमेंट ढोता है। अगर मैं उस सभा में तेरे साथ खड़ा दिख गया, तो सुबह मेरा शटर बंद मिलेगा।"
कुछ लोगों ने सिर हिलाया। कोई बोला, "हाँ भाई, यही तो बात है।"
मैंने देखा कि नसीमा बाई अपनी बाल्टी हाथ में पकड़े खड़ी हैं, और किशनलाल काका अपना चना मुँह के पास ले जाकर फिर नीचे रख रहे हैं, और सबसे पीछे — सबसे पीछे गुड्डू की अम्मी खड़ी थीं, जिन्होंने एक बार स्कूल के गेट पर कहा था कि उन्होंने गुड्डू का रास्ता बदल दिया है।
मैंने सबको देखा। फिर मैंने कहा।
"भोला भाई, आप सभा में मेरे साथ मत खड़े होइए।"
वो चौंके।
"आप अपनी दुकान पर खड़े रहिए," मैंने कहा। "शटर उठाकर। और टीवी ऑन रखिए। अगर उस दिन आपका शटर बंद मिले तो पूरी गली जान जाएगी कि किसने बंद कराया।"
भोला भाई की आँखें झपकीं।
"और नसीमा बाई," मैंने कहा, "आप अपनी दुकान पर रहिए। आपके यहाँ जो भी राशन लेने आए, उसे बता दीजिए कि सात बजे मैदान में क्या होने वाला है।"
"मैं बताऊँगी," नसीमा बाई ने कहा। फिर उन्होंने बाल्टी नीचे रखी। "पर तू एक बात का जवाब दे — वो घंटी सच में बजेगी?"
सब चुप हो गए।
मैंने जेब से घंटी निकाली। वो ठंडी थी। मैंने उसे हथेली पर रख लिया।
"मैं नहीं जानता," मैंने सच बोला। और जब मैंने सच बोला, तो मुझे अंदर हल्का लगा। "मैं सिर्फ़ इतना जानता हूँ कि वो मुझसे झूठ नहीं बोलती। और आज वो बहुत देर से चुप है।"
शबनम आपा ने तब कहा, जो सबसे ज़रूरी बात थी।
"देख, बेटा," उन्होंने कहा, "वो आदमी तुझे घंटी बजाने को इसलिए नहीं कह रहा कि वो घंटी से डरता है। वो इसलिए कह रहा है कि उसने पहले से तय कर लिया है कि उस दिन घंटी बजेगी या नहीं बजेगी — और दोनों में उसका फ़ायदा है। बज गई तो वो कहेगा, देखो, इसने जादू किया। नहीं बजी तो कहेगा, देखो, झूठा है।"
"तो फिर क्या करें?" किसी ने पीछे से कहा।
"हमें सभा में जाना है," मैंने कहा।
सब फिर बोल पड़े। मैंने हाथ उठाया।
"सुनो। हम सभा में जाएँगे, पर भीख माँगने नहीं। हम किसी से ये नहीं कहेंगे कि हम पर भरोसा करो। हम सिर्फ़ अपनी बात कहेंगे — जो हुआ, जैसा हुआ, जितना हुआ। और जिसे भरोसा करना हो वो करे, जिसे न करना हो वो न करे। मैं किसी का नाम अपने साथ नहीं घसीटूँगा।"
भोला भाई ने कुछ सोचा। फिर बोले, "पर तेरे पास काग़ज़ क्या है? उसके पास तो फाइल है, वकील है, कलेक्टर है।"
वेबसाइट पर अपनी पसंदीदा कहानियाँ मुफ्त पढ़ें और Story FM App पर उन्हीं कहानियों का शानदार Audio Experience लें।
यह कहानी Story FM app पर ऑडियो में भी सुनें — आगे के एपिसोड सबसे पहले वहीं आते हैं।
Audio mein suno