The Mysterious Bell – Chapter 1297
जैसे किसी ने हाँ कह दी हो।
॥
उस्ताद की मशीन ने एक टाँके जितनी आवाज़ की और चुप हो गई।
और उसके बाद जो चुप्पी आई, वो मशीन की नहीं थी। वो गली की थी।
मैंने मुड़कर देखा। फ़ैज़ अपने दादा के कंधे पर हाथ रखे खड़ा था। इलाही भाई की आँखें भरी हुई थीं, पर वो रो नहीं रहे थे। उस्ताद अपनी मशीन के चक्के पर हाथ रखे ऐसे खड़े थे जैसे कोई बूढ़ा अपने बेटे का हाथ पकड़कर खड़ा हो।
टिंकू ने मेरी कमीज़ खींची।
"उस्ताद," उसने धीरे से कहा। "दस बजकर इकतालीस हो गए।"
मैंने जेब से घंटी निकाली। वो चुप थी। पिछले कुछ दिनों से वो ज़्यादा बोलती नहीं, कभी एक शब्द कहती, कभी दो, और फिर चुप। जैसे कोई बूढ़ा आदमी सीढ़ी-सीढ़ी चढ़ते-चढ़ते साँस लेने के लिए रुक जाए।
"उन्नीस मिनट," मैंने कहा। "चलो।"
उस्ताद ने मशीन पर कपड़ा डाला। फिर मेरी तरफ़ देखा।
"तू घर जा," उन्होंने कहा। "माँ के पास बैठ। वो अकेली नहीं सुननी चाहिए।"
मैंने सिर हिलाया। और मैं निकल पड़ा।
उस्ताद की दुकान से हमारे घर तक चलने में चार मिनट लगते हैं। सीधी गली, पीपल, पत्थर की चबूतरी, नाली का पुल। चार मिनट।
उस दिन मुझे वो चार मिनट ज़िंदगी में सबसे लंबे लगे।
क्योंकि उन चार मिनट में मैंने अपनी गली को ऐसे देखा जैसे पहली बार देख रहा हूँ। हर घर का दरवाज़ा खुला था। हर दरवाज़े के भीतर एक ही नीली रोशनी काँप रही थी। एक ही आवाज़ आ रही थी। एक ही सफ़ेद कुर्ता हर स्क्रीन पर हिल रहा था।
भोला भाई की दुकान का शटर आधा उठा था और उन्होंने अपनी छोटी टीवी स्टूल पर रख दी थी। चार आदमी वहाँ खड़े थे। कोई चाय नहीं पी रहा था। कोई बात नहीं कर रहा था।
शबनम आपा अपनी गुमटी के दरवाज़े पर खड़ी थीं, हाथ में केतली थी, और केतली से भाप निकल रही थी, पर वो डाल नहीं रही थीं। उनकी गुमटी में एक छोटी टीवी है, मैं जानता हूँ। वो भी उसी चैनल पर थी।
मैं रुका नहीं। पर मेरे अंदर एक बात ठंडी होकर बैठ गई।
ये आदमी गली में आकर लोगों को डराता नहीं। ये गली में आकर हमारे घरों में घुसता है, हमारी टीवी के अंदर बैठ जाता है, हमारी चाय की भाप के साथ बैठ जाता है।
दरवाज़े पर माँ की आवाज़ आई।
"कौन?"
"मैं हूँ, माँ।"
अंदर जाते ही मुझे सब समझ आ गया। काजल ने टीवी निकालकर माँ के पलंग के सामने उसी पुराने लकड़ी के स्टूल पर रख दी थी, जिस पर माँ हिसाब की कॉपी रखती हैं। स्क्रीन पर रंग आ रहे थे और माँ पलंग पर आधी बैठी थीं। उनके बाल बँधे हुए थे। हाथ में वो स्टील का गिलास था जिसमें पानी है और जिसे वो कभी खत्म नहीं होने देतीं।
पापा कोने में बैठे थे। उनकी गोद में भूरी फाइल बंद पड़ी थी। वो स्क्रीन नहीं देख रहे थे। वो अपने जूतों के अगले हिस्से को देख रहे थे।
और मीरा — मीरा हमारे घर में थी। कैमरा उसके बैग में बंद था, और वो घुटनों के बल पलंग के पास बैठी थी। उसने मुझे देखा और बहुत धीरे से कहा, "मैंने कैमरा बंद कर दिया। ये घर है, स्टूडियो नहीं।"
मैंने उसका हाथ थोड़ी देर पकड़ा। फिर मैं काजल के बगल में बैठ गया।
घड़ी में दस बजकर पचास मिनट।
और फिर ग्यारह बजे।
स्क्रीन पर पहले पानी का गिलास आया। फिर माइक। फिर एक मेज़ जिस पर सफ़ेद कपड़ा बिछा था और किनारे पर एक छोटा गमला रखा था — वही गमला, वही फूल, जो उसकी हर तस्वीर में होता है।
और फिर वो आया।
सफ़ेद कुर्ता। सफ़ेद धोती जैसा पायजामा। हाथ जोड़े हुए। वो बैठा, और जब बैठा तो पहले मेज़ की तरफ़ देखा, फिर माइक की तरफ़, फिर कैमरे में आँखें डालकर मुस्कुराया।
उसके बगल में चंद्रेश सक्सेना बैठा था। सफ़ेद कुर्ता, सोने के रंग का पेन, हाथ में फाइल। और वो मुस्कुरा रहा था — आधी मुस्कान, जैसे कोई बूढ़ा अपने होशियार बेटे की तरफ़ देखता है।
माँ ने गिलास पलंग के किनारे रख दिया। काँच की आवाज़ आई।
रणवीर ने साँस ली। और फिर वो बोला। आवाज़ बिल्कुल वैसी, जैसे गुमटी पर चाय पीते वक़्त होती है।
"भोपाल की पुरानी बस्ती," उसने कहा। "हम सबकी माँ है। वहाँ मेरा बचपन गया है, वहाँ मेरे पिता ने साइकिलों के पुर्ज़े बेचे हैं, और आज मैं उसी बस्ती की एक बात आपके सामने रखना चाहता हूँ।"
उसने रुककर सबको देखा। कैमरे के पीछे बैठे पत्रकार भी उसकी तरफ़ देख रहे थे। मुझे लगा ये आदमी अगर सड़क पर खड़ा होकर फल बेचता तो भी लोग खरीदते।
"पिछले कुछ महीनों में," वो फिर बोला, "वहाँ एक नौजवान उठा है। उम्र में छोटा, हौसले में बड़ा — मैं ये मानता हूँ, मैं उसकी उम्र का अपमान नहीं करूँगा। पर वो एक बात करता है जो मुझे रात को सोने नहीं देती।"
अब उसकी आवाज़ धीमी हुई। और जब आवाज़ धीमी होती है, तब आदमी सबसे ज़्यादा सुना जाता है।
"वो एक घंटी बजाता है," रणवीर ने कहा। "हाँ, घंटी। एक पुरानी साइकिल की घंटी। और उस घंटी के नाम पर वो लोगों से कहता है कि टूटी चीज़ें जुड़ जाएँगी, टूटे रिश्ते जुड़ जाएँगे, बिगड़े काम बन जाएँगे।"
उसने हाथ जोड़कर माथे से लगाए, जैसे कोई बुज़ुर्ग किसी बात पर शर्मिंदा हो।
"मैंने खुद देखा है," वो बोला। "मैंने खुद अपनी आँखों से देखा है कि वो अपने दोस्तों को, अपने मोहल्ले के बच्चों को, बूढ़ों को, बीमार लोगों को — उसी अंधविश्वास में फँसा रहा है। और मुझे ये कहने में कोई शर्म नहीं कि जो आदमी बीमार माँ के सामने घंटी बजाकर चमत्कार का वादा करे, वो समाजसेवी नहीं होता। वो… माफ़ कीजिएगा, मैं कोई कड़ा शब्द नहीं कहूँगा।"
चंद्रेश ने बगल से बहुत प्यार से एक शब्द जोड़ा।
"शोषण," उसने कहा। "सर, आप शोषण कहिए। कानून में उसका नाम यही है।"
"हाँ," रणवीर ने कहा। "शोषण।"
मेरी हथेली में पसीना आ गया। मैंने माँ की तरफ़ देखा।
माँ सीधी बैठी थीं। उनका चेहरा स्क्रीन की नीली रोशनी में साफ़ दिख रहा था। और उनके चेहरे पर डर नहीं था।
बिल्कुल नहीं।
काजल ने धीरे से अपना हाथ बढ़ाया और माँ का हाथ पकड़ लिया। माँ ने हाथ नहीं छुड़ाया। उन्होंने उलटकर काजल की उँगलियाँ दबा दीं।
स्क्रीन पर एक पत्रकार खड़ा हुआ।
"सर, आपने कहा कि आपने खुद देखा है। क्या आपने उस लड़के से बात की है?"
"मैंने उससे बात करने की कोशिश की," रणवीर ने कहा। "मैंने उसके घर तक आदमी भेजा। मैंने उसकी माँ के इलाज का खर्च उठाने की बात कही। मैंने उसे अपनी कंपनी में जगह दी। आप जानते हैं उसने क्या किया?"
पत्रकार चुप।
"उसने मेरे आदमी को दुकान से भगा दिया," रणवीर ने कहा। "क्योंकि मेरी बात मानने का मतलब था — उस घंटी का जादू खत्म। और जिसका जादू खत्म हो जाए, वो फिर कोई नहीं रहता।"
बात साफ़ थी। मुझे कोई गुस्सा नहीं आया। मुझे ठंड लगी। क्योंकि ये आदमी झूठ नहीं बोल रहा था — ये आदमी सच को इस तरह मोड़ रहा था कि सच भी उसका हो जाए।
फिर वो सीधा होकर बैठा। उसकी आवाज़ में पहली बार कोई बदलाव आया — थोड़ी ऊँची, थोड़ी तेज़, जैसे कोई घोषणा करता है।
"पूर्णिमा की शाम," उसने कहा।
मैं ठिठक गया।
"पूर्णिमा की शाम, सात बजे, नूर अस्पताल के खुले मैदान में — जनसुनवाई।"
मेरे कान के अंदर एक आवाज़ हुई। जेब में पड़ा घंटी का पुराना ताला एक पल के लिए गरम हुआ। सिर्फ़ एक पल।
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