The Mysterious Bell – Chapter 1299
"मेरे पास एक घंटी है," मैंने कहा। "और एक गली है।"
शबनम आपा ने तब कुल्हड़ उठाया और मेरी तरफ़ बढ़ाया।
"ले," उन्होंने कहा। "चाय ठंडी हो गई, पर पी ले। कल से मेरी गुमटी पर जो भी आए, उसे मैं यही बताऊँगी — सात बजे मैदान में। और हाँ, सात बजे से पहले मेरा चूल्हा बंद रहेगा। मैं भी चलूँगी।"
रात के करीब दस बजे मैं दुकान के पीछे वाले कमरे में आया।
बल्ब गुनगुना रहा था। चारपाई पर मेरा पुराना कंबल मुड़ा पड़ा था। औज़ारों का ट्रंक खुला था और उसके ऊपर नई रिंच पड़ी थी, जिसे टिंकू रोज़ छूना चाहता है और रोज़ मना कर दिया जाता है।
मैंने जेब से घंटी निकाली और मेज़ पर रख दी।
मेज़ बहुत पुरानी है। एक टाँग में से कील निकल आई है, इसलिए जब भी उस पर कुछ भारी रखो तो वो हल्का सा झुक जाती है।
घंटी रखते ही मेज़ झुकी और फिर सीधी हो गई।
मैं बैठ गया। मेरे हाथ में आज का दिन उतर आया था — सुबह की वो मशीन की आवाज़, गली के खुले दरवाज़े, हर स्क्रीन पर वही सफ़ेद कुर्ता, माँ का वो वाक्य, और आख़िर में वो शब्द — पूर्णिमा।
मैंने अपनी कॉपी खोली। जिसमें मैंने आज का जोड़ लिखा था। ऊपर मैंने लिखा था — माँ का नाम। फिर उस्ताद और इलाही भाई। फिर शकील भाई।
और उसके नीचे मैंने पेंसिल उठाकर लिखा —
सात बजे। मैदान। सबके सामने।
मैंने पेंसिल रखी। फिर मैंने उँगली बढ़ाकर घंटी को छुआ।
वो हल्की गरम थी।
गरम, पर जलती नहीं। जैसे किसी ने उसे थोड़ी देर हाथ में पकड़ा हो और फिर रख दिया हो।
मैंने उँगली नहीं हटाई। मैंने कहा, "घंटी।"
कोई जवाब नहीं।
"घंटी, मुझे पता है तू सुन रही है। आज बहुत कुछ हो गया।"
और फिर, मेरे हाथ के नीचे, वो पीतल एक बार हिला — जैसे कोई बूढ़ा सिर हिलाता हो।
और आवाज़ आई।
बहुत धीमी। पहले से ज़्यादा धीमी। जैसे पीतल के भीतर से नहीं, पीतल के बहुत पीछे से कोई बोल रहा हो।
"अंकुश।"
"हाँ।"
"पूर्णिमा वाली सभा में मैं पूरी नहीं बोलूँगी।"
मैं सीधा हो गया।
मेरे हाथ से कॉपी खिसककर चारपाई पर गिर गई और उसकी पेंसिल लुढ़ककर फ़र्श पर चली गई, पर मैंने उसे उठाया नहीं।
"क्या मतलब?" मैंने कहा। "तू नहीं बोलेगी? उसने पूरी गली के सामने, छह कैमरों के सामने कह दिया कि मैं घंटी बजाऊँगा। और अगर तू चुप रही तो—"
"तो वो जीत जाएगा," घंटी ने कहा। "मुझे पता है।"
"फिर?"
"फिर भी मैं पूरी नहीं बोलूँगी।"
मैं उठ खड़ा हुआ। कमरे में घूमने लगा। दो कदम इधर, दो कदम उधर। यही कमरा है — छह फुट चौड़ा और आठ फुट लंबा। दो कदम से ज़्यादा चलने की जगह नहीं।
"घंटी, तू मुझे आज तक कभी ऐसे नहीं मिली। तू छोटी बातें करती है, आधी बातें करती है, फिर चुप हो जाती है। पर आज तू ऐसा कह रही है जैसे कोई आदमी अपनी बीमारी बता रहा हो।"
"क्योंकि ये बीमारी नहीं है," घंटी ने कहा। "ये हिसाब है।"
मैं रुक गया।
"कैसा हिसाब?"
घंटी कुछ देर चुप रही। मैंने उसे फिर छुआ। वो अब भी गरम थी, पर गरमाहट बदल रही थी — जैसे अंगीठी की आख़िरी गरमाहट।
फिर उसने कहा। बहुत छोटा वाक्य। सिर्फ़ सात शब्द।
"क्योंकि तेरा एक हिस्सा अभी भी टूटा है।"
मैंने साँस रोक ली।
और उसने आख़िरी बात कही। धीमी। इतनी धीमी कि मुझे लगा मैंने सुना नहीं, मैंने महसूस किया।
"और वो हिस्सा तेरे ही घर में रहता है।"
चुप्पी।
बल्ब गुनगुनाता रहा।
मैं धीरे-धीरे मुड़ा और खुले दरवाज़े से बाहर आँगन की तरफ़ देखा। पापा के कमरे की बत्ती अभी जल रही थी। उसकी परछाईं परदे पर नहीं थी — यानी वो बैठे नहीं थे। वो खड़े थे। बस खड़े थे, बीच कमरे में, कुछ किए बिना।
और मेरे हाथ के नीचे मेज़ पर पड़ी घंटी एक बार और हल्की गरम हुई — जैसे किसी ने बहुत दूर से आँख मार दी हो।
मैंने कॉपी उठाई, पेंसिल उठाई, और उस पन्ने पर जहाँ मैंने आज का हिसाब लिखा था, सबसे नीचे मैंने एक नई लाइन जोड़ी।
घर का सबसे चुप आदमी।
और मैं बाहर आँगन में चला गया, नंगे पैर, ठंडी मिट्टी पर, उस जलती बत्ती की तरफ़ जिसके भीतर मेरा पापा बिना कुछ किए खड़े थे।
॥
नंगे पैर आँगन की मिट्टी पर चलते वक़्त मुझे अपने ही पैरों की आवाज़ सुनाई दे रही थी। ऐसी ठंडी मिट्टी थी, जैसे रात भर किसी ने उसे पानी से धोया हो। और पापा के कमरे का बल्ब — वही पुराना, ऊपर से काला पड़ चुका बल्ब — पीली रोशनी में पूरे दरवाज़े को ऐसे रंग रहा था जैसे कोई पुरानी तस्वीर हो।
मैंने दरवाज़े के चौखट पर हाथ रखा।
पापा भीतर खड़े थे। बीच कमरे में। बिना कुछ किए। भूरी जिल्द वाली फाइल उन्होंने दोनों हाथों से सीने से लगाई हुई थी, और उस फाइल के कोने से उनकी उँगलियाँ ऐसे सफ़ेद पड़ी थीं जैसे उन्होंने उसे बहुत ज़ोर से पकड़ा हो।
उन्होंने मेरी तरफ़ नहीं देखा।
मैंने कहा, "पापा।"
उन्होंने बस एक बार साँस ली। फिर बोले, "आ जा।"
मैं गया। दरवाज़े से चारपाई तक, चारपाई से उनके पास तक। मेरे पैरों के नीचे फ़र्श ठंडा था। कमरे में उनकी पुरानी औज़ारों वाली गंध थी — लोहे, तेल और धूल की। और उसके ऊपर हल्की सी कपूर की महक, जो माँ की संदूकची से आती है और जो बरसों से इस घर की दीवारों में बस गई है।
"तूने सुना?" पापा ने पूछा।
"क्या?"
"घंटी ने जो कहा। घर में एक हिस्सा टूटा है।"
मैंने उनकी तरफ़ देखा। उनकी आँखें फाइल पर थीं, मेरे ऊपर नहीं।
मैंने कहा, "आपने सुना?"
"मैंने नहीं सुना। मैंने समझा। तेरे कमरे की बत्ती जल रही थी, और तू बार-बार उठकर बैठ रहा था। इतनी रात को इंसान ऐसे ही नहीं उठता, अंकुश। इंसान तभी उठता है जब उसके अंदर कोई चीज़ जगा दे।"
मैं चुप रहा।
वो फाइल को मेज़ पर रखने ही वाले थे, फिर रखी नहीं।
"मैं ये फाइल नहीं छिपा रहा था," उन्होंने कहा। "मैं इसे खोलने से डर रहा था। दोनों में फ़र्क़ है।"
"अब?"
"अब डर खत्म नहीं हुआ।" उन्होंने फाइल मेरी तरफ़ बढ़ा दी। "पर मैंने सोच लिया है।"
मैंने फाइल ली। हल्की थी — इतनी हल्की कि हैरान रह गया। बाईस साल का डर इतने काग़ज़ों में होता है, ये मुझे पता नहीं था।
"अंकुश," पापा ने कहा। अब उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। उनका चश्मा टेप से बँधा था, और टेप की एक परत उखड़कर कान पर लटक रही थी। "घंटी ने जो कहा, वो सच कहा। पर वो टूटा हिस्सा मैं नहीं हूँ।"
मैं रुका।
"और माँ भी नहीं है।"
"तो?"
वो चुप हो गए। मुझे लगा वो कुछ कहेंगे, कोई नाम लेंगे, कोई पुरानी बात खोलेंगे। मगर उन्होंने मेरे कंधे पर हाथ रखा। उनका हाथ पतला था, और उसमें ज़रा भी ताक़त नहीं थी — जैसे किसी पुराने औज़ार का हत्था, जो पहले मज़बूत था और अब सिर्फ़ आदत से पकड़ा जाता है।
"तू खुद पहचानेगा," उन्होंने कहा। "कल। और मैं तुझे बता दूँ — जब तू उसे पहचानेगा, तू मुझसे नाराज़ होगा।"
"आपसे क्यों?"
"क्योंकि हर टूटा हिस्सा किसी के हाथ से जुड़ा होता है, बेटा। हमारे घर का टूटा हिस्सा भी किसी के हाथ से जुड़ा है। और वो हाथ मेरा है।"
मैंने कुछ कहना चाहा। वो बोलने नहीं दिया।
"कल मैं मंच पर तेरे साथ खड़ा रहूँगा," उन्होंने कहा। "तेरे पीछे नहीं। साथ। और जो मैंने बाईस साल में नहीं किया, वो करूँगा — अपना नाम अपनी ज़ुबान से लूँगा। ज़ुबान अटकेगी, हाथ काँपेंगे, पर नाम मेरा होगा।"
फिर उन्होंने बल्ब बुझा दिया।
अंधेरे में उनकी आवाज़ आई, "अब जा। सो जा। कल सुबह तेरे पास बहुत काम है।"
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