The Mysterious Bell – Chapter 1294
"तुम्हारे पापा और मेरे पापा… दोनों ने एक ही मेज़ के सामने सिर झुकाया था।"
"हो सकता है," मैंने कहा। "हो सकता है वो मेज़ आज भी कहीं खड़ी हो। और हम दोनों उस काग़ज़ के दो अलग-अलग कोनों पर बैठे हों, ये सोचकर कि हम अलग-अलग जंग लड़ रहे हैं।"
उसने कुछ नहीं कहा। पर उसका चेहरा पहली बार ढीला पड़ा।
और फिर, अचानक, वो हँसी।
छोटी सी हँसी, जैसे किसी पुरानी बात पर हँसी आ जाए और आधी हँसी गले में ही रह जाए। उसने अपनी आँख के कोने पर उँगली रखी और पोंछा।
"तुम्हारी हिम्मत कैसे पड़ी मुझसे ये सब कहने की?" उसने कहा। "मैं तुम्हें जानती तक नहीं। मैं सिर्फ़ दो महीने से तुम्हारा नाम सुन रही हूँ — जिसके हाथ में घंटी है, जो लोगों से बात करवाता है, जिसे सर काला जादूगर कहते हैं। और तुम बैठे हो, चाय पी रहे हो, और अपने पापा का सबसे भारी सच उगल रहे हो, जैसे ये कोई मज़ाक हो।"
"हिम्मत नहीं," मैंने कहा। "साइकिल की घंटी ने भेजा है।"
"क्या?"
"मेरे पास एक घंटी है," मैंने कहा। "जब उसे लगता है कि अब किसी को कुछ कहना चाहिए, तो वो बजती है। और जब बजती है, तो मैं कुछ न कहूँ — ये मेरे बस में नहीं रहता। तुमने सुना नहीं? जब तुम मेरे पास आई थीं, तब भी उसने कुछ कहा था।"
वो एक पल सोचती रही। फिर उसकी आँखें थोड़ी बड़ी हुईं।
"वो मैंने सुना," उसने कहा। "मुझे लगा मेरे कान में पड़ा हुआ है।"
"नहीं। वो सिर्फ़ मुझे सुनती है।"
उसने अपना माथा माथे पर रखा, फिर हटा दिया। और जब वो फिर बोली, तो उसकी आवाज़ बदल गई थी। वो मज़ाक वाली आवाज़ नहीं थी। वो वकील की आवाज़ थी — धीमी, साफ़, और हर शब्द तौलकर रखने वाली।
"अंकुश," उसने कहा, "मैं तुम्हें एक बात बताती हूँ। दफ़्तार में एक सफ़ेद फाइल है। बड़ी, मोटी। उस पर कोई लिखा नहीं है — न नाम, न तारीख़। सिर्फ़ कोने पर एक नीला गोल निशान है, जो किसी मुहर का है। वो फाइल चंद्रेश सर कभी अपनी मेज़ पर नहीं छोड़ते। कभी नहीं। दिन भर में जब भी वो बाहर जाते हैं, वो उसे अपने साथ ले जाते हैं, या मेज़ के नीचे दराज़ में रखकर उसका ताला अपनी जेब में ले जाते हैं।"
मैंने उसकी तरफ़ सीधा देखा।
"कल," शालिनी ने कहा, "उन्हें शाम चार बजे बाहर जाना है। कलेक्टर के दफ़्तार में उनका काम है। वो कम से कम दो घंटे लेंगे। जब वो निकलते हैं, तो दरवाज़ा खुला छोड़ जाते हैं क्योंकि सफ़ाई वाली अंदर आती है, चपरासी चाय रखकर जाता है, और मुझे उनका कुछ काम वहीं रहता है। पर वो फाइल… वो फाइल तब भी साथ होती है। हर बार।"
"हर बार नहीं होगी," मैंने कहा।
"कैसे पता?"
"क्योंकि आदमी का कोई एक दिन ऐसा आता है जब वो भूल जाता है," मैंने कहा। "और वो दिन वो ही होता है जिस दिन उसे लगता है कि सब कुछ उसके हाथ में है।"
वो कुछ नहीं बोली। फिर उसने अपनी फाइल उठाई और उसे अपने सीने से लगाया।
"मुझे जाना होगा," उसने कहा। "इतनी देर में वो दो बार फोन कर चुके होंगे।"
वो उठी। मैं भी उठा। मैंने चाहा कि कुछ कहूँ — कुछ ऐसा जो उसकी हिम्मत बाँध सके, या कम से कम ये बता दे कि मैं समझ गया कि वो क्या कह रही है। पर तब तक मेरी जेब में घंटी गरम हो चुकी थी।
शबनम आपा चूल्हे के पास खड़ी थीं, चिमटी हाथ में। उन्होंने हमारी तरफ़ देखा और कुछ नहीं कहा। पर जब शालिनी गुमटी के कोने से बाहर निकलने लगी, तब उन्होंने कहा —
"बेटा।"
शालिनी रुकी।
"कटोरी छोड़ गई थी," आपा ने कहा और उसे उठाकर कपड़े से पोंछने लगीं। मुझे पता था कि उन्होंने ये बात सिर्फ़ इसलिए कही ताकि लड़की एक पल रुके और उसका चेहरा बाहर की धूप में जाने से पहले थोड़ा सँभल जाए।
शालिनी ने आपा की तरफ़ देखा और सिर हिलाया। फिर वो गली में निकल गई।
मैं उसके पीछे-पीछे गया, दो कदम पीछे।
धूप अब ढल रही थी। पीपल की छाया लंबी होकर गली के बीचोंबीच आ रही थी, और उस छाया में एक छोटा सा हिस्सा बचा था जहाँ बच्चे पतंग उड़ा रहे थे।
शालिनी गली के मोड़ तक पहुँची। फिर वो रुकी।
उसने पलटकर देखा। उसने अपनी फाइल को दोनों हाथों से पकड़ा और फिर उसकी आवाज़ इतनी धीमी थी कि मुझे सुनने के लिए एक कदम आगे जाना पड़ा।
"अगर…" उसने कहा, और रुक गई।
"अगर?"
"अगर उस फाइल की एक कॉपी मिल जाए," उसने कहा, "तो चंद्रेश सर के सारे काग़ज़ एक रात में उलट जाएँगे।"
मैं कुछ नहीं बोला।
"मैं जानती हूँ कि उस फाइल में क्या है," उसने कहा। "मैंने उसे एक बार आधा खुला देखा है। उसमें नाम हैं, तारीख़ें हैं, और हर नाम के आगे एक रकम है, जो किसी को नहीं दी गई। पर…"
वो रुकी। उसके होंठ हिले, पर आवाज़ नहीं निकली।
"पर?" मैंने कहा।
"पर तब मेरी नौकरी और मेरा नाम, दोनों चले जाएँगे।"
मैं उसकी आँखों में देखता रहा।
वो एक पल और खड़ी रही, जैसे कुछ और कहना चाहती हो। फिर वो मुड़ी और गली के मोड़ पर मुड़कर दफ़्तार की तरफ़ चली गई।
मेरे हाथ से घंटी निकली और मेरी हथेली पर बैठ गई।
उसने बहुत धीरे से, बहुत ही धीरे से, एक ही शब्द कहा।
"दो।"
॥
रात भर घंटी ने एक शब्द भी नहीं कहा। मैंने उसे तीन बार उठाया, तीन बार कान के पास ले जाकर हिलाया, और तीनों बार वो सिर्फ़ गुनगुनी रही, जैसे कोई बूढ़ा आदमी आँख बंद किए बैठा हो और जानता हो कि सामने वाला अब भी सवाल पूछेगा।
"दो।"
बस। दो। और उसके बाद पूरी रात चुप्पी।
मैं छत पर बैठा रहा। गली में देर रात तक एक कुत्ता भौंकता रहा, फिर बंद हो गया। पीपल की पत्तियाँ बिना हवा के भी हिलती रहीं, और मैं सोचता रहा कि "दो" का मतलब क्या है। दो सच? दो काग़ज़? दो आदमी? या वो दो जो अब तक हिसाब में नहीं जुड़े — मेरा और उसका?
सुबह चार बजे माँ ने खाँसा। मैं नीचे गया। काजल उनके पास बैठी हुई थी और उसकी आँखें सूजी थीं। माँ ने मेरा हाथ पकड़कर कुछ कहना चाहा, पर आवाज़ गले में ही रह गई। सिर्फ़ होंठ हिले — मत खोल।
"नहीं खोलूँगा, माँ," मैंने कहा। "आज नहीं।"
काजल ने मुझे बाहर तक छोड़ा। दरवाज़े पर वो रुकी और बोली, "भैया, वो तीन बार कह चुकी हैं। नींद में भी।"
"क्या?"
"मत खोल। और एक बात — वो कह रही थीं कि वो कुआँ नहीं है।"
मैं सीढ़ियों पर खड़ा रह गया। नीचे का पिछला दरवाज़ा, जो पाँच साल से बंद है, आज सुबह भी बंद ही था, पर उसकी कुंडी पर सुबह की ओस जमी हुई थी और उस पर उँगली का कोई निशान नहीं था। जो बंद है, वो बंद है। जो अंदर है, वो अंदर है।
मैं दुकान पहुँचा तो सूरज निकल चुका था। शटर उठाया, बाल्टी से सामने पानी डाला, और औज़ारों का ट्रंक खोलकर बैठ गया। दिन का पहला काम हमेशा यही होता है — ट्रंक की सफ़ाई। पुराने पेंच, मुड़ी कीलें, आधी घिसी रिंचें, और वो चीज़ें जिनका कोई नाम नहीं होता पर जिनके बिना एक भी साइकिल ठीक नहीं होती।
तभी गुमटी से चाय की गंध आई, और उसके पीछे-पीछे एक जानी-पहचानी आवाज़ आई।
"उस्ताद।"
मैंने सिर उठाया। शालिनी खड़ी थी। हाथ में एक भूरा लिफ़ाफ़ा था, मोटा, जिसका कोना मुड़ा हुआ था। उसकी आँखों के नीचे काली लकीरें थीं, जैसे रात भर सोई ही न हो। और वो हाथ…
हाथ काँप रहे थे। सच में काँप रहे थे, ऐसे जैसे कोई बहुत भारी चीज़ उठाकर रखी हो और अब उसका वज़न उठाने वाले से कह रहा हो — मैं तुम्हारी नहीं हूँ।
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