The Mysterious Bell1292 / 1504

The Mysterious Bell – Chapter 1292

7 min read November 5, 2026

कॉपी बंद करते वक़्त मेरी नज़र दूसरी मेज़ पर पड़ी।

वहाँ एक लड़की बैठी थी। उम्र करीब अट्ठाईस-तीस। काले रंग का सादा कुर्ता, गले में कोई ज़ेवर नहीं, बाल पीछे बँधे हुए, और सामने काग़ज़ों के दो ढेर — एक में मोटी फाइलें, दूसरे में कोरी शीटें।

वो काम नहीं कर रही थी। वो एक पुरानी तस्वीर को हाथ में लेकर उलट रही थी, पलट रही थी — जैसे बार-बार देखकर भी कुछ न मिल रहा हो और फिर भी देखना न छोड़ा जाए।

तस्वीर छोटी थी, किनारे से पीली पड़ी हुई। दूर से इतना ही दिख रहा था कि उसमें कोई दुकान थी — छोटी सी, आधा उठा हुआ शटर, और उसके नीचे बैठा कोई आदमी। दुकान की बाईं तरफ़ कुछ टँगा दिख रहा था, ठीक वैसे जैसे हमारी गली में दुकानों पर पुराने बोर्ड टँगे रहते हैं।

मैंने उसे देखना बंद नहीं किया, और वो मेरी तरफ़ नहीं देख रही थी।

तभी उसकी मेज़ पर रखा फ़ोन बजा। उसने एक बार देखा, नहीं उठाया। फिर दूसरी बार बजा, फिर तीसरी बार। तीसरी बार पर उसने उठाया और बोली, "पापा, मैं बात कर रही हूँ।"

फिर वो कुछ देर सुनती रही। उसका चेहरा नहीं बदला, पर उसकी उँगलियाँ उस काग़ज़ के कोने पर दबने लगीं, इतनी ज़ोर से कि किनारा मुड़ गया।

"मैंने साइन नहीं किया है," उसने कहा। "और नहीं करूँगी।"

उसने फ़ोन काट दिया और उसे उलटकर मेज़ पर रख दिया — मुँह नीचे।

तभी बगल वाले केबिन का दरवाज़ा खुला और एक मोटा सा आदमी निकला, जिसके हाथ में काग़ज़ों की फाइल थी। उसने उसकी तरफ़ देखा और सिर से इशारा किया — अंदर चलो, सर बुला रहे हैं।

वो उठी। कुर्सी पीछे सरकी, और मैंने देखा कि उसके हाथ में एक पुरानी कॉपी भी थी, जिसकी जिल्द उखड़ी हुई थी।

वो केबिन की तरफ़ चली। दरवाज़ा पूरा बंद नहीं हुआ — आधा खुला रह गया, और उसके भीतर से आवाज़ आने लगी।

चंद्रेश सक्सेना की आवाज़। मीठी, धीमी, जैसे कोई गरम दूध में मिश्री घोल रहा हो।

"बेटा, तुम इतनी परेशान क्यों होती हो? तुम्हारे पापा का काग़ज़ तो मैंने सँभाल लिया था।"

वो कुछ नहीं बोली, या इतने धीरे बोली कि मैं सुन नहीं पाया।

"देखो," चंद्रेश ने कहा, "जो काग़ज़ सँभाला हुआ है, वो तुम्हें तभी मिलेगा जब सब कुछ साफ़ हो जाएगा। तुम्हारे पापा की कंपनी का हिसाब, मज़दूरों की सूची, सब मेरे पास सुरक्षित है। तुम घर बैठकर आराम करो और अपनी माँ की दवा की तरफ़ ध्यान दो।"

फिर एक लंबी चुप्पी।

और फिर वही मीठी आवाज़, इस बार थोड़ी कम मीठी, "बस एक अंगूठा, बेटा। एक। और सब बात खत्म।"

बेंच के नीचे मेरा हाथ कस गया।

मुझे अचानक याद आया कि मैं तो यहाँ काग़ज़ लेकर आया था — उस्ताद की दुकान का। और अब मैं किसी दूसरे केबिन में चल रही बात सुन रहा था, जो शायद उसी चीज़ का दूसरा सिरा थी।

दरवाज़ा खुला।

वो बाहर निकली। उसके हाथ में वही फाइल थी, काँपती हुई। उसने दरवाज़ा बंद किया, बिना ज़ोर, बहुत धीरे — जैसे करने को कुछ न हो और अंदर कोई सुन रहा हो।

फिर उसने मेरी तरफ़ देखा।

वही चेहरा, वही आँखें, पर अब उनमें वो चीज़ नहीं थी जो भीतर जाने से पहले थी। अब वहाँ कुछ और था। गुस्सा नहीं, रोना नहीं। कोई चीज़ जो रोने से पहले आती है — जैसे कोई तय कर रहा हो कि अब तोड़ना है या नहीं।

मैं उठ गया।

वो मेरे पास आई। दो कदम रुकी, फिर एक और आगे बढ़ी। उसने मेरी जेब की तरफ़ नहीं देखा, मेरी कॉपी की तरफ़ नहीं देखा। उसने सिर्फ़ मेरी आँखों में देखा।

और फिर उसने इतनी धीमी आवाज़ में कहा कि अगर मैं वहाँ न होता तो बात हवा में ही रह जाती —

"तुम वही साइकिल वाले हो ना… जिसे चंद्रेश सर काला जादूगर कहते हैं?"

मैंने कुछ नहीं कहा।

"मुझे तुमसे एक बात करनी है।"

और उस वक़्त मेरी जेब में घंटी ने धीरे से, बहुत धीरे से एक ही शब्द कहा।

"अब।"

॥

"मुझे तुमसे एक बात करनी है।"

उसने ये इतनी धीमी आवाज़ में कहा कि आसपास की गली की आवाज़ें भी उससे तेज़ लगीं। जैसे कोई बात नहीं, जैसे कोई काग़ज़ माँग रहा हो। पर उसकी उँगलियाँ उस फाइल के किनारे पर इतनी ज़ोर से दबी थीं कि किनारा सफ़ेद पड़ गया था।

मैंने चारों तरफ़ देखा। सीढ़ियों के नीचे जूते की दुकान से रबर और गोंद की बू आ रही थी। ऊपर पुराना पंखा अपनी ही धुन में खड़खड़ा रहा था। कोई सुन नहीं रहा था। पर मैं अब ये भी सीख चुका था कि दीवारों के भी कान होते हैं, और उनमें भी कुछ ज़ुबानें होती हैं जो किसी को दिखती नहीं।

"यहाँ नहीं," मैंने कहा।

वो एक पल रुकी, जैसे सोच रही हो कि मेरे साथ चलना समझदारी है या नहीं। फिर उसने फाइल अपने सीने से लगाई और सिर हिलाया।

"कहाँ?"

"चलो, चाय पिलाता हूँ।"

हम सीढ़ियों से उतरे। नीचे की गली में दोपहर की धूप सीधी गिर रही थी और छतों की टीन चटक रही थी, जैसे कोई दूर से बर्तन बजा रहा हो। एक ठेले पर नींबू और मिर्ची के हार टँगे थे, हवा से हिल रहे थे।

वो मेरे साथ-साथ चल रही थी, पर आधा कदम पीछे। उसकी चप्पलों की आवाज़ सीधी और तेज़ थी। जिस आदमी को कुछ छिपाना होता है, वो धीरे चलता है। जिसे कुछ कहना होता है, वो ऐसे ही चलता है।

"तुम्हारा नाम?" मैंने पूछा।

"शालिनी।"

"पूरा?"

एक पल रुकी। "शालिनी दीक्षित।"

मैंने कुछ नहीं कहा। नाम याद रख लिया। मेरी आदत है — नाम पहले, बात बाद में। नाम से पता चल जाता है कि आदमी खुद को कहाँ रखता है।

गुमटी पीपल के उस पार है, जहाँ से गली दो हिस्सों में बँट जाती है। आगे शबनम आपा का चूल्हा, उसके पीछे बर्तन धोने की जगह और उस जगह के पीछे चार फुट का एक कोना जहाँ पुरानी बेंच पड़ी है। वहाँ बैठकर पूरी गली की आवाज़ आती है, पर वहाँ से किसी को तुम्हारी आवाज़ नहीं आती। मैंने वो कोना इसलिए नहीं चुना था कि मैं बहुत होशियार हूँ। मैंने वो कोना इसलिए चुना था कि वहाँ दीवार से टिककर बैठने पर पीठ को लगता है कि कम से कम एक तरफ़ से तो कोई आ नहीं सकता।

शबनम आपा चूल्हे पर थीं। उन्होंने पलटकर देखा — पहले मुझे, फिर उसे, फिर उसके हाथ में पकड़ी फाइल को। उन्होंने कुछ नहीं पूछा। बस एक स्टूल खींचकर रख दिया और अपने हाथ की लोहे की चिमटी चूल्हे के किनारे टिका दी।

"दो कटोरी," मैंने कहा।

"तीन," उन्होंने कहा, "मेरी भी।"

फिर वो हमारे पीछे आईं, उस पुरानी बेंच पर दो कटोरियाँ रखीं और जाते-जाते मेरी तरफ़ आँख से इशारा किया — लड़की रो रही है।

मैंने देखा। सच में, उसकी आँखें सूखी थीं, पर उसकी नाक के पास वो हल्की लाली थी जो रोने के बाद ही आती है। और वो अपना होंठ बार-बार ज़ुबान से गीला कर रही थी, जैसे मुँह में कोई बात बैठी हो और नीचे न उतर रही हो।

मैंने कटोरी उसकी तरफ़ सरका दी।

"पहले पी लो।"

उसने कटोरी उठाई, फिर रख दी।

"तुम… तुम वही हो ना?" उसने कहा। "जिसे सर काला जादूगर कहते हैं?"

"हाँ।"

"और तुम ये सब करते हो? लोगों के रिश्ते जोड़ते हो, काग़ज़ ठीक करते हो, घंटी बजाते हो?"

"काग़ज़ नहीं ठीक करता," मैंने कहा। "काग़ज़ तो सिर्फ़ लिखता है जो हो चुका है। मैं वो ठीक करता हूँ जो काग़ज़ के पीछे टूट गया है।"

वो एक पल मेरी तरफ़ देखती रही। फिर बोली, बहुत सीधा, बिना घुमाए —

"क्या मैं तुम पर भरोसा कर सकती हूँ?"

मैं रुक गया।

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