The Mysterious Bell – Chapter 1291
मैंने हल्का सा हँसकर कहा, "अरे, नया ताला लगाने वाला भी गलती कर गया।"
टिंकू ने पूछा, "क्या गलती?"
"उसे चाहिए था कि शटर उल्टा लगा दे। तब पूरा मज़ा आता। गली वाले सुबह आकर देखते कि उस्ताद की दुकान तो खुली है, बस अंदर घुसने की जगह नहीं है।"
टिंकू हँसा, पर हँसी आधी में रुक गई। क्योंकि उस्ताद ने उस वक़्त बोर्ड से हाथ नहीं हटाया था।
फ़ैज़ ने ताले से बँधा एक काग़ज़ देखा। पतली जूट की रस्सी से, तीन गाँठ लगाकर, ताले के छल्ले से बाँधा हुआ। उसने खोला, और पढ़ने लगा। वो पढ़ता रहा, और उसकी आवाज़ धीरे-धीरे कम होती गई, जैसे किसी के हाथ से पानी का लोटा फिसल रहा हो।
"पढ़ो, ज़ोर से," इलाही ने कहा।
फ़ैज़ ने गला साफ़ किया।
"नीलामी के कारण दुकान का क़ब्ज़ा नगर निगम को दिया जा रहा है। आज दोपहर बारह बजे तक सामान हटा लें। अन्यथा प्रशासनिक कार्रवाई की जाएगी।"
पूरी गली उस वक़्त चुप थी, और गली चुप हो तो आवाज़ ऐसी लगती है जैसे किसी ने धीरे से कुछ गिरा दिया हो।
उस्ताद ने बोर्ड से हाथ हटाया, फिर बहुत शांत आवाज़ में कहा, "बारह बजे तक सामान हटा लें। और सामान क्या है? एक सिलाई मशीन, एक कुर्सी, और पचास साल की टिक-टिक।"
इलाही ने काग़ज़ अपने हाथ में लिया और उसे उलटकर देखा, पलटकर देखा। "इस पर मेरा नाम कहाँ है? मेरी ज़मीन है तो मेरा नाम होना चाहिए न।"
"चाचा जी," मैंने कहा, "जिस काग़ज़ पर कोई नाम नहीं, उस काग़ज़ का काम ही नाम मिटाना है।"
तभी चप्पलों की आवाज़ आई — तेज़, बेपरवाह, जल्दबाज़। मीरा आ रही थी। उसके हाथ में कैमरा था, कंधे पर वही फटा बैग, और आँखों में वो चमक जो सिर्फ़ तब आती है जब उसे कोई ऐसी चीज़ मिले जिस पर सबकी नज़रें नहीं गईं।
"मुझे बुलाया था?" उसने कहा।
"तू कहाँ से आ रही है?" मैंने पूछा।
"नगर निगम के बाहर से। सुबह पाँच बजे कोई नहीं बैठता, पर मैंने वहाँ के बाहर वाले बोर्ड पर लगा सारा कुछ फोटो में उतार लिया है। और," उसने काग़ज़ मेरे हाथ से लिया, "एक बात बताऊँ?"
"बता।"
उसने काग़ज़ की तह को नाक के पास लाकर सूँघा। एक बार नहीं, दो बार। फिर उसने उसे रोशनी की तरफ़ उठाया और किनारे को नाखून से रगड़ा।
"ये काग़ज़ नगर निगम का नहीं है," उसने कहा।
"कैसे पता?"
"क्योंकि नगर निगम के काग़ज़ में जो स्याही लगती है, उसमें तेज़ गंध होती है, और शीट के किनारे मोटे होते हैं। यहाँ स्याही में हल्की कपूर जैसी महक है और किनारे इतने बराबर कटे हैं जैसे किसी दफ़्तर की मशीन ने काटे हों।" उसने मेरी तरफ़ देखा। "यही गंध चंद्रेश सक्सेना के दफ़्तार की फाइलों से आती है। मैं वहाँ जाती हूँ, याद है न?"
मैंने काग़ज़ को करीब से देखा। नीचे एक गोल मुहर थी, धुँधली, घिसी हुई।
"और ये मुहर?" मैंने पूछा।
"मुहर असली है," मीरा ने कहा। "पर मुहर असली होना काग़ज़ असली होना नहीं होता। तू किसी भी चीज़ पर असली मुहर लगा सकता है — यहाँ तक कि तेरे अपने हाथ पर भी।"
उस वक़्त पापा आगे आए।
वो अब तक पीछे खड़े थे, हाथ जेब में, आँखें ज़मीन पर। उन्होंने ताले को छुआ — पहले उँगली से, फिर पूरी हथेली से, और फिर उँगलियों को उसके भीतरी किनारे पर फेरा, जैसे कोई अंधा आदमी चीज़ें पहचानता है।
"ये… ये वैसा ही ताला है," उन्होंने कहा। बस इतना कहा, और फिर मुँह फेर लिया।
मैंने देखा कि उनकी आँखें भर आई थीं।
उस्ताद ने बिना कुछ कहे उनका हाथ पकड़ लिया। दोनों बूढ़े आदमी वहीं खड़े रहे — एक जिसकी दुकान बंद हो रही थी, दूसरा जिसने बाईस साल पहले किसी और के काग़ज़ पर अंगूठा लगाया था और तब से खुद को माफ़ नहीं किया था।
मेरी जेब में घंटी ने तीन शब्द कहे।
"दोनों हाथ खाली नहीं।"
मैंने पूछा, "क्या मतलब?"
पर घंटी चुप हो गई। जब वो चुप होती है, तो मुझे लगता है कि वो भी सोच रही है। बूढ़ी औरतें भी ऐसे ही करती हैं — बात कहकर चुप हो जाती हैं और तुम्हें खुद ही समझना पड़ता है।
इलाही ने काग़ज़ फाड़ने के लिए हाथ बढ़ाया।
"मत," मैंने कहा।
"क्यों नहीं? ये झूठ है।"
"झूठ है इसलिए मत फाड़ो। जो झूठ काग़ज़ पर लिखा है, वो काग़ज़ ही सबूत है। फाड़ दिया तो हम भी उन्हीं की तरह हो जाएँगे — जो सबूत मिटाते हैं।"
मैंने काग़ज़ मोड़कर अपनी जेब में रखा, ताला के नीचे से रस्सी खोली और उसे भी जेब में डाला। कोई चीज़ छोड़नी नहीं थी। इस गली में एक टुकड़ा भी छूटे तो किसी न किसी रात आकर वही टुकड़ा तुम्हारे खिलाफ़ बोलने लगता है।
सूरज निकलने लगा था। गली के मुँह पर चाय की गुमटी की पहली लौ जल उठी थी और उसकी गंध आ रही थी। शबनम आपा दौड़ती हुई आईं, हाथ में चिमटी, और उसे देखकर ही चिल्लाईं, "ताला? मेरी गुमटी से दो कदम पर ताला? अंकुश, ये तुम्हारा काम है क्या?"
"आपा," मैंने कहा, "अगर मेरा काम होता तो मैं ताले के साथ एक चिट्ठी भी छोड़ जाता, जिस पर लिखा होता — माफ़ी, चाय बाद में।"
वो हँसीं, फिर ताला देखकर उनकी हँसी भी उसी जगह रुक गई जहाँ टिंकू की रुकी थी।
"लेकिन ये तो नया है," उन्होंने कहा। "नया ताला। मतलब किसी ने रात में खरीदा है। रात में दुकान खुली कहाँ रहती है?"
"कहीं नहीं," मीरा ने कहा। "इसलिए ताला खरीदने वाले के पास या तो दुकान है, या दुकान खरीदने का हौसला है।"
मैंने पापा की तरफ़ देखा।
"पापा, आप घर जाइए। माँ अकेली हैं।"
उन्होंने सिर हिलाया। फिर एक कदम चले, फिर रुके, और बिना पलटे बोले, "अंकुश।"
"हाँ?"
"ये ताला… मैंने एक बार देखा है।" और फिर वो चल दिए, बिना और कुछ कहे।
मैं कुछ देर उनके पीछे देखता रहा। उनकी कमीज़ की पीठ पर पसीना था, और वो काँप रहे थे — सुबह की ठंड से नहीं।
मैंने सबको वहीं इकट्ठा किया।
"अब सुनो सब। दुकान का ताला तोड़ना नहीं है। काग़ज़ फाड़ना नहीं है। कोई गुस्सा नहीं करेगा। हम आज वो करेंगे जो कोई नहीं करता — पूछेंगे।"
"किससे?" फ़ैज़ ने कहा।
"उससे जिसने काग़ज़ बनाया है।"
"और अगर उसने जवाब नहीं दिया?" इलाही ने कहा।
"तो हम उसके जवाब का इंतज़ार करेंगे। जवाब भी थक जाते हैं, चाचा जी। देर से आते हैं, और जब आते हैं तो बिना बुलाए आते हैं।"
दोपहर के करीब बारह बजे मैं नए बाज़ार की दूसरी मंज़िल पर पहुँचा।
ये वही इमारत थी जहाँ चंद्रेश सक्सेना का दफ़्तार था। बाहर से देखो तो सीधी-सादी — नीचे जूते की दुकान, ऊपर काँच के दरवाज़े। पर अंदर घुसते ही हवा बदल जाती थी। वहाँ जो हवा थी, उसमें काग़ज़ और स्याही के साथ बहुत महीन सी मिठास थी, जैसे किसी ने कई चीज़ें मीठी ज़ुबान से कहकर खत्म की हों।
मैंने मेज़ पर काग़ज़ रखा।
"चंद्रेश सक्सेना से मिलना है।"
मेज़ पर बैठा आदमी बिना आँख उठाए बोला, "नाम?"
"अंकुश यादव। साइकिल गली। मरम्मत करता हूँ।"
उसने पहली बार ऊपर देखा, और देखते ही उसका ढंग बदल गया — न कड़वा, न मीठा, बस सावधान, जैसे किसी के कहने पर उसने मेरा चेहरा पहले से याद कर रखा हो।
"सर व्यस्त हैं। बैठिए।"
मैं बाहर की लकड़ी की बेंच पर बैठ गया। बेंच ऊपर से चिकनी थी और नीचे से टेढ़ी — ऐसी कि आदमी जितनी देर बैठे, उतना ही असहज होता जाए।
मैंने जेब से कॉपी निकाली और उसमें आज की तारीख़ के नीचे लिखा — "ताला उन्नीस की दुकान जैसा।" फिर लिखा — "पापा ने इससे पहले देखा है। कहाँ?"
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