The Mysterious Bell – Chapter 1290
ऊपर नीला गोल निशान। नीचे तारीख़। और सबसे नीचे, साफ़, मोटी स्याही में एक नाम — चंद्रेश सक्सेना।
"ये अदालत का काग़ज़ नहीं है," मीरा ने तुरंत कहा। "ये दफ़्तार की मुहर है।"
"दफ़्तार की मुहर हो या अदालत की," आदमी ने कहा, "काम एक ही करती है। इस काग़ज़ के मुताबिक़ इस ज़मीन पर दुकान का हक़ खत्म हो चुका है। आज दोपहर बारह बजे तक सामान हट जाए, वरना हम हटाएँगे।"
और फिर उसने अपनी उँगली काग़ज़ पर रखी — ठीक उस जगह, जहाँ मोहर के नीचे एक आधा अक्षर बना था।
वो आधा अक्षर मैंने पहले भी देखा था।
बहुत पहले।
उसी पीली फाइल के पहले पन्ने पर, जिसे शुक्ला बाबू ने छाती से लगाया था।
मैंने इलाही की तरफ़ देखा।
उनका चेहरा पीला पड़ गया था। उनकी आँखें उस काग़ज़ पर टिकी थीं, और उनका हाथ — जो अभी तक उस्ताद का हाथ पकड़े था — छूट गया।
और उनकी वो उँगली, जिसमें उस्ताद की माँ की पीतल की अँगूठी थी, काँपने लगी।
पहले धीरे। फिर तेज़। इतनी तेज़ कि अँगूठी उस उँगली पर खड़ी हो गई और फिर लुढ़ककर चबूतरी के पत्थर पर गिर पड़ी — टिन।
गेंद की तरह लुढ़कती हुई वो रुकी मेरे पैर के पास।
मैंने उसे उठाया। पीतल ठंडा था। बर्फ़ जैसा ठंडा, और उस पर खुदा फूल मेरी हथेली में ऐसे दबा जैसे किसी ने उँगली से मेरा हाथ पकड़ लिया हो।
"इलाही चाचा?" मैंने कहा।
वो नहीं बोले।
उन्होंने काग़ज़ की तरफ़ देखा, फिर उस्ताद की तरफ़, फिर उस आदमी की तरफ़, और फिर बहुत धीरे से, ऐसे जैसे अपने आप से बोल रहे हों —
"ये मुहर मैं जानता हूँ।"
सफ़ेद शर्ट वाला आदमी मुस्कुराया।
"अच्छी बात है। फिर तो सब आसान हो जाएगा।"
"क्यों?" इलाही ने पूछा।
"क्योंकि जो इस मुहर को जानता है," आदमी ने कहा, "वो इसके नीचे का नाम भी जानता होगा।"
और फिर उसने काग़ज़ को पलट दिया।
पीछे, नीले धागे से सिली हुई एक पतली पर्ची चिपकी थी, और उस पर मेरे सामने, रोशनी में, साफ़ पढ़ा जा सकता था —
"दुकान सात। हस्तांतरण। हस्ताक्षरकर्ता — इलाही बक्श।"
चारों बच्चे एक साथ बोले, "क्या?"
मैंने एक कदम आगे बढ़ाया।
"उस्ताद," मैंने कहा, बिना उनकी तरफ़ देखे, "ये काग़ज़ कह रहा है कि आपकी दुकान इलाही चाचा ने बेची है।"
उस्ताद ने एक शब्द भी नहीं कहा।
इलाही बक्श ने अपना रूमाल मुँह पर रख लिया और फिर वो दो शब्द बोले, जो पूरे चौक में गूँज गए —
"मैंने कब?"
आदमी ने कंधे उठाए।
"तारीख़ लिखी है। देख लीजिए।"
और मैं वहीं खड़ा रह गया, हाथ में उस्ताद की माँ की अँगूठी, जेब में एक खुला बक्सा, एक अनखुली पोटली, और सामने एक ऐसा काग़ज़ जिस पर उस सुबह की सबसे बड़ी झूठ लिखी थी।
मेरी जेब में घंटी ने एक बार हल्का सा टन किया — बिलकुल वैसे, जैसे कोई बूढ़ी औरत सिर हिलाकर कहे — "देखा? मैंने कहा था न।"
और मैंने अपनी कॉपी निकाली, उसमें एक नई लाइन लिखी, और उस लाइन के नीचे सिर्फ़ चार शब्द लिखे —
अब चौथा नाम बोलेगा।
क्योंकि अगर ये दुकान किसी ने बेची थी, तो बेचने वाले का नाम काग़ज़ पर था, और जो नाम काग़ज़ पर है, वो नाम मिट भी सकता है — पर उसका हिसाब नहीं।
और हिसाब, मेरी जान, इस गली में कभी अकेला नहीं चलता।
वो हमेशा किसी के साथ चलता है।
कभी किसी भाई के साथ। कभी किसी बहन के साथ। कभी किसी ऐसे आदमी के साथ जिसने पचास साल पहले अपना नाम आख़िर में लिखने की ज़िद की थी, ताकि पहले उसका काम बोले।
मैंने अँगूठी उस्ताद की तरफ़ बढ़ाई।
उन्होंने उसे देखा, फिर इलाही को देखा, और फिर अपना हाथ आगे किया — बहुत धीरे, जैसे कोई उसे छूने से डर रहा हो।
"उस्ताद," मैंने कहा, "ये अँगूठी आपकी माँ की है। इसे पहनने वाला भी आपके ही खून का है। और जिसने इसे भेजा है, वो भी शायद आपके ही खून का है।"
उन्होंने अँगूठी ली और उसे अपनी हथेली में बंद कर लिया।
"तो अब?" उन्होंने पूछा।
मैंने उस सफ़ेद शर्ट वाले आदमी की तरफ़ देखा, जो अब भी काग़ज़ हिला रहा था, जैसे उसे हवा से भी ज़्यादा ज़रूरत हो किसी चीज़ को हिलाने की।
"अब?" मैंने कहा। "अब हम बारह बजे का इंतज़ार नहीं करेंगे। हम अभी चलेंगे। और जिसने ये काग़ज़ बनाया है, उससे पूछेंगे कि इलाही बक्श का हस्ताक्षर उसने किस रात बनाया था — और उस रात इलाही बक्श कहाँ थे।"
मैंने उस्ताद की तरफ़ देखा।
"उस्ताद, वो छोटी लोहे की चाबी जो बक्से में मिली है — वो किसकी है?"
उन्होंने रजिस्टर उठाया, उसके नीचे रखी चाबी उठाई, और उसे रोशनी में देखा।
उनका चेहरा बदला।
"ये," उन्होंने कहा, "ये मंसूर की दुकान की है।"
और मेरी जेब में घंटी ने दो शब्द कहे, जो उस सुबह सबसे भारी थे।
"वो ज़िंदा है।"
॥
सुबह चार बजे की गली ऐसी होती है कि जैसे किसी ने पूरी बस्ती की आवाज़ उतारकर किसी पुराने ताले में बंद कर दी हो। हवा भी नहीं चल रही थी। पीपल के पत्ते इतने धीरे हिल रहे थे कि लगे कोई बूढ़ा नींद में करवट बदल रहा हो। और उस वक़्त, उस्ताद अली बक्श की दुकान के शटर पर, एक भारी लोहे का ताला झूल रहा था।
वो ताला उनका नहीं था।
हम सब वहीं खड़े थे। मैं, उस्ताद, इलाही बक्श, फ़ैज़ और पापा। चबूतरी से उठकर सीधे यहीं आए थे, क्योंकि उस्ताद ने बक्से से चाबी उठाते वक़्त सिर्फ़ एक बात कही थी — "मुझे अपनी दुकान देखनी है। अपनी आँखों से।"
अब वो अपनी आँखों से देख रहे थे, और उनका हाथ जेब में चाबी पर जमा हुआ था, जैसे कोई बच्चा अपनी मिठाई छिपाकर रखता है और डरता है कि कहीं कोई छीन न ले।
उस्ताद ने चाबी निकाली। छोटी, घिसी, पीतल के छल्ले में बँधी। उन्होंने ताले के छेद में डाली। चाबी आधी तक गई, फिर अटक गई — जैसे कोई बूढ़ा आदमी सीढ़ी पर आधे पैर रखकर रुक जाए और सोचे कि ऊपर जाना है या नहीं।
"नहीं खुला," फ़ैज़ ने धीरे से कहा।
"खुलेगा क्यों?" मैंने कहा। "ताला ही उनका नहीं है।"
उस्ताद ने चाबी निकाल ली, और फिर वो जो किया, वो मैं कभी नहीं भूलूँगा। उन्होंने हाथ बढ़ाया और शटर के ऊपर टँगे उस पुराने लकड़ी के बोर्ड को छुआ, जिस पर बड़े-बड़े घिसे अक्षरों में लिखा था — अली बक्श, दर्ज़ी। पचास साल की धूल, पचास साल की बारिश, और उनका पूरा नाम। वो बोर्ड छूकर वैसे ही खड़े रह गए, जैसे कोई अपने ही घर का दरवाज़ा खटखटाने से पहले सोच रहा हो कि अंदर कौन सो रहा है।
पीछे से पैरों की आवाज़ आई। टिंकू, सानिया, गुड्डू, रफ़ीक़ और चिंटू — पाँचों दौड़ते हुए आए, हाँफते हुए।
"उस्ताद!" टिंकू ने कहा। "हमें शबनम आपा ने भेजा। वो कह रही थीं कि गली के मुँह पर एक टेम्पो रुका था और उसमें से कोई भारी चीज़ उतारी गई।"
"भारी चीज़?" मैंने कहा।
"लोहे जैसी आवाज़ थी," सानिया ने कहा। "और टेम्पो का नंबर मैंने याद कर लिया। मेरी कॉपी में लिख भी लिया।"
चिंटू ने ताला देखा और उसका मुँह खुला रह गया। "अंकुश भैया, इसे तोड़ दें? मेरे पास चप्पल है, और चप्पल से…"
"चप्पल से ताला नहीं टूटता, चिंटू," मैंने कहा। "चप्पल से आदमी टूटते हैं, और वो भी तब, जब वो बहुत ज़्यादा बोलने लगे।"
मैं ताले के पास गया। मोटा, काला, ऊपर से तेल की पतली परत चढ़ी हुई। कहीं कोई नाम नहीं, कोई मुहर नहीं। बस एक चिकनी, चुप्पी सी चीज़, जो शटर के हैंडल और बोर्ड के कुंडे दोनों को एक साथ पकड़े हुए थी — यानी जिसने भी लगाया था, उसने सिर्फ़ दुकान नहीं बंद की थी, उसने नाम भी बंद कर दिया था।
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