The Mysterious Bell – Chapter 1289
"सच। पर एक साथ।"
मैंने बक्सा उठाकर उनके बीच रख दिया। इलाही थोड़ा झुके, उस्ताद भी।
"अलग-अलग तो आप दोनों बोल ही चुके हैं," मैंने कहा। "अब एक साथ बोलिए। जो भीतर है, वो पूरी बात सुनेगा। अधूरी नहीं।"
उस्ताद ने इलाही को देखा। इलाही ने उन्हें। फिर कुछ देर दोनों की साँसें रुकीं, और फिर — एक साथ, वैसे ही जैसे तीस साल पहले पाठशाला की घंटी दोनों ने एक साथ बजाई होगी।
"हम दोनों ने एक-दूसरे को कुछ नहीं कहा," उस्ताद बोले, "और हमने दोनों ने खुद को सज़ा दी।"
इलाही ने वही दोहराया, धीरे से, हर शब्द पर रुकते हुए।
और दूसरा ताला खुला।
इस बार धीमा नहीं। इस बार उसमें से एक सीधी, साफ़ आवाज़ आई — टक — जैसे किसी ने खुल कर कह दिया हो कि हाँ, चलेगा।
बच्चे उठ खड़े हुए। सानिया ने मुँह पर हाथ रख लिया। चिंटू ने ऐसी चीख निकाली जैसे कोई उसे लुका-छिपी में मिल गया हो।
उस्ताद ने बक्से का ढक्कन उठाया।
उसमें से पहले गंध आई।
पुरानी, मीठी, थोड़ी बासी — जैसे किसी पुराने संदूक में कपड़ों के बीच कपूर रखा हो और वो बरसों में कपड़ों से बात करने लग गया हो।
फिर मैंने वो तीन चीज़ें देखीं।
एक — पीली जिल्द वाला मोटा रजिस्टर, जिसके किनारे उखड़े हुए और जिसकी जिल्द पर एक भी अक्षर नहीं, बस ज़मीन के रंग का एक टुकड़ा चिपका हुआ।
दो — छोटी लोहे की चाबी, हथेली भर से भी छोटी, जिसके दाँते घिस गए थे और जिसके छल्ले में रस्सी का एक काला टुकड़ा लिपटा था।
तीन — कपड़े की पोटली, मोटे खादी में लिपटी, रस्सी से दो बार बँधी, और उसके ऊपर किसी ने उँगली से खुरचकर वही दो लकीरें और बिंदु वाला निशान बनाया था।
मैंने पोटली को हाथ नहीं लगाया।
उसका वक़्त अभी नहीं आया था।
मैंने रजिस्टर उठाया और उस्ताद के हाथ में रखा। उनके हाथ काँप रहे थे, पर जैसे ही उनकी उँगली जिल्द पर लगी, कंपन थम गया।
"ये हमारी पाठशाला का हिसाब है," उन्होंने कहा। "मैंने ये जिल्द हर महीने के आख़िर में खोलकर देखा था। पचास साल से नहीं देखा।"
उन्होंने पहला पन्ना पलटा।
उस पर सिर्फ़ एक लाइन थी, भूरी स्याही में, घुमाते अक्षरों में —
जो जोड़ता है, उसका हिसाब कभी बराबर नहीं होता।
मैंने देखा, मीरा ने कॉपी निकाली और उसे उलटी तरफ़ से लिखने लगी। उसकी कलम तेज़ चल रही थी — जैसे सब कुछ पकड़ लेना चाहती हो।
उस्ताद ने पन्ने पलटने शुरू किए।
बीच के पन्नों पर रोज़ की एंट्री थी — किसकी साइकिल आई, किसका ताला आया, किसकी सिलाई हुई, क्या मरम्मत हुई और किसने कितना दिया। कोई दाम नहीं। सिर्फ़ इतना — "कपड़ा वाला भाई, दो रुपये बाक़ी"; "किराने वाला, एक रुपया"; "बढ़ई, मरम्मत के बदले स्कूल की बेंच"।
"पैसा लिखा है?" चिंटू ने पूछा। "कहाँ है पैसा?"
"यही है," मैंने कहा। "ये रजिस्टर पैसा नहीं, भरोसा है। जिसे जितना मिला, उसने उतना ही लौटाया — पर रुपये में नहीं, हाथ में।"
उस्ताद ने आख़िरी पन्ना पलटा।
और वहीं सब रुक गए।
उस पन्ने पर ऊपर की तरफ़ साफ़ लिखे हुए तीन नाम थे, बराबर की लकीर से अलग किए हुए, और हर नाम के आगे एक ही बात — "हिस्सा बराबर"।
पहला नाम — उस्ताद अली बक्श।
दूसरा नाम — इलाही बक्श।
तीसरा नाम — शिवनारायण यादव।
मैंने देखा बिना आवाज़ पढ़ते हुए। मेरे परदादा का नाम। वो नाम जो मैंने पहली बार पीतल की टूटी पट्टी पर पढ़ा था, गड्ढे से निकली हुई।
पापा ने पीछे से कहा, "जगदीश यादव के पिता?"
"हाँ," उस्ताद ने कहा। "वही। जो साइकिल के पुर्ज़े और ताले बनाते थे, और जिन्होंने कभी किसी से दाम नहीं माँगा।"
मैं चुप हो गया।
और फिर उस्ताद की उँगली उसी पन्ने पर नीचे की तरफ़ सरकी।
तीन नामों के नीचे, एक लकीर खींची हुई थी। और उस लकीर के नीचे, अलग स्याही में, छोटे अक्षरों में, एक चौथा नाम लिखा था।
मंसूर।
और उसके आगे — "हिस्सा बराबर नहीं। हिस्सा बराबर करने वाला।"
मैंने उस्ताद की तरफ़ देखा।
वो उस नाम को देख रहे थे जैसे कोई अपने ही घर की दीवार पर अनजान आदमी की तस्वीर देख रहा हो।
"मंसूर?" मैंने कहा। "वही मंसूर? ताले-चाबी वाला?"
"हाँ," उस्ताद ने कहा।
"उस्ताद, आपने कहा था ताले मंसूर के बनाए हैं। पर आपने ये नहीं कहा था कि वो हमारा चौथा हिस्सेदार है।"
"क्योंकि मुझे खुद नहीं पता था," उन्होंने कहा। "मैंने उसे सिर्फ़ कारीगर समझा था। जो चाबी बनाता था, ताला बनाता था और चाबी के बदले कहानी सुनता था।"
इलाही ने रजिस्टर की तरफ़ झुककर देखा और धीरे से बोले, "ये मेरी लिखाई नहीं है।"
"मेरी भी नहीं," उस्ताद ने कहा।
"तो?" मीरा ने पूछा।
"तो इसे भी किसी ने यहाँ जोड़ा है," उस्ताद ने कहा। "बाद में।"
उन्होंने पन्ने को करीब लाकर देखा और मुझे दिखाया।
"देख, इस नाम के नीचे लकीर की स्याही और ऊपर के नामों की स्याही अलग है। ऊपर वाली भूरी है, पुरानी है, बैठ गई है। और ये नीली है।"
"कितनी नई?" मैंने पूछा।
मीरा ने पास आकर झाँका और बोली, "दो दिन से ज़्यादा पुरानी नहीं।"
मेरे अंदर कुछ ठंडा हुआ।
कोई दो दिन पहले इस बंद बक्से में, दो तालों के पीछे, एक नाम जोड़ गया था।
और उसी वक़्त मेरी जेब में घंटी गरम हुई। गरम, बहुत गरम, और फिर उसने बोला — इस बार बिना लड़खड़ाए, बिना टूटे, पूरी और साफ़ आवाज़ में।
"एक ताला खुला। एक नाम बचा।"
मैंने उसे जेब से निकाला। वो हथेली में रखी थी और उसकी सतह पर पुराने निशान के नीचे एक नई पतली लकीर उभर आई थी।
"एक नाम बचा मतलब?" मैंने पूछा।
घंटी चुप।
"उस्ताद," मैंने कहा, "ये मंसूर का नाम — ये असली है या जोड़ा हुआ?"
"असली," उस्ताद ने कहा। "मंसूर हमारे साथ था। हिसाब रखता था। जोड़ता था। मरम्मत करता था। वो हमारा चौथा हाथ था।"
"तो फिर ये नाम जोड़ने की क्या ज़रूरत थी?"
"क्योंकि," उस्ताद ने कहा, और उनकी आवाज़ भारी हो गई, "पाठशाला के काग़ज़ों में मंसूर का नाम कभी नहीं था। हम तीन के नाम थे। वो चौथा था, पर काग़ज़ पर नहीं।"
"क्यों?"
"क्योंकि उसने कहा था — जो हाथ जोड़ता है, उसका नाम आख़िर में आता है। पहले वो जोड़ता है, फिर नाम।"
मैं कुछ कहने ही वाला था कि गली के मुँह से आवाज़ आई।
चप्पलों की नहीं। जूतों की।
सख़्त, साफ़, और बहुत तेज़ — जैसे कोई पत्थर पर पत्थर मार रहा हो।
सबने मुँह उठाया।
गली के मुँह से एक आदमी आ रहा था। सफ़ेद शर्ट, नीली पैंट, हाथ में काग़ज़ों का बंडल — और वो काग़ज़ों को ऊपर उठाए हुए हिला रहा था, जैसे कोई झंडा लेकर आ रहा हो।
उसके पीछे दो और थे। एक के हाथ में मोटी फाइल थी। दूसरे के हाथ में — मैंने गौर से देखा — स्याही की डिब्बी और एक मोहर।
सफ़ेद शर्ट वाला आदमी चौक के बीच आया, रुका, और इतनी ऊँची आवाज़ में बोला कि गुमटी की केतली की आवाज़ भी उसमें दब गई।
"ये दुकान उस्ताद अली बक्श की नहीं रही!"
शबनम आपा की चिमटी हाथ से छूटकर थाली पर गिरी — टन।
बच्चे खड़े हो गए। भोला भाई जीप के बोनट से हट गए। मीरा ने कैमरा उठा लिया और उसका लाल बत्ती जल गई।
उस्ताद ने धीरे से रजिस्टर बंद किया और उसे सीने से लगाया।
"क्या कहा तुमने?" उन्होंने पूछा, बिलकुल शांत आवाज़ में।
"कहा नहीं, दिखा रहा हूँ," आदमी ने कहा और काग़ज़ आगे बढ़ा दिया।
काग़ज़ ठीक मेरी आँखों के सामने आया।
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