The Mysterious Bell – Chapter 1288
सुबह की धूप उस वक़्त चबूतरी पर ऐसे गिर रही थी जैसे किसी ने पीला कपड़ा बिछा दिया हो। पीपल की पत्तियों के बीच से आती रोशनी में धूल के कण ऐसे तैर रहे थे जैसे हवा में कोई पुरानी कहानी घुल रही हो।
उस्ताद का हाथ हवा में था।
और सामने, भोला भाई की जीप के खुले दरवाज़े से, एक बूढ़ा हाथ बाहर आ रहा था — काँपता हुआ, पतला, नसों से भरा, जैसे सूखी लकड़ी पर उभरी हुई लकीरें। उस उँगली में पीतल की वो पतली अँगूठी थी, जिस पर छोटा सा फूल खुदा था।
मैंने उस्ताद का चेहरा देखा।
वो रो नहीं रहे थे। वो बस खड़े थे, और उनका चेहरा ऐसा था जैसे कोई पुराना मकान अंदर से खिसक रहा हो, और बाहर से कुछ न दिख रहा हो।
फिर इलाही बक्श जीप से उतरे।
पहले उनका एक पैर ज़मीन पर आया — पतला, सूखा, घुटने से थोड़ा मुड़ा हुआ, और पुराने सफ़ेद कपड़े की नाली में लिपटा हुआ। फिर दूसरा। फिर उनका पूरा शरीर।
वो बहुत दुबले थे। सफ़ेद कुर्ता, जिस पर दो जगह पैबंद लगे थे और तीसरी जगह धागा उधड़ा हुआ था। कमर झुकी हुई, पर उसमें भी एक अजीब सी सीधी लकीर थी — जैसे आदमी झुका हो, पर टूटा न हो।
और उनकी आँखें।
उस्ताद की आँखें जैसी, पर कुछ ज़्यादा नरम। जैसे उसी साँचे में ढली हों, बस उस पर पचास साल की हवा चल गई हो।
वो चार कदम चले। भोला भाई ने हाथ बढ़ाया, पर उन्होंने नहीं पकड़ा। वो अपने आप चले — धीरे, पर सीधे, चबूतरी की तरफ़।
और फिर वो रुक गए।
उस्ताद से बस एक हाथ की दूरी पर।
चबूतरी पर पड़ा बक्सा, टिंकू के पैर के पास, चुप था। चारों बच्चे — सानिया, गुड्डू, रफ़ीक़ और चिंटू — पत्थर की मूरत जैसे बैठे थे। चिंटू की नाक बह रही थी और वो उसे पोंछ भी नहीं रहा था।
शबनम आपा गुमटी के बाहर खड़ी थीं, हाथ में लोहे की चिमटी, और चिमटी उनके हाथ में धीरे-धीरे काँप रही थी।
मीरा ने अपना कैमरा नीचे कर लिया था। मैंने देखा — उसने बटन दबाकर रिकॉर्डिंग रोक दी।
पापा पीछे खड़े थे, चश्मा हाथ में, और उनका अंगूठा चश्मे के किनारे को ऐसे रगड़ रहा था जैसे कोई पुराना दाग मिटा रहा हो।
और फिर, उस सुबह की सबसे बड़ी आवाज़ आई।
आवाज़ नहीं।
चुप्पी।
पचास साल की चुप्पी एक जगह खड़ी थी और वो इतनी भारी थी कि पीपल की पत्तियों की खड़खड़ाहट भी उसमें दब गई।
मुझे लगा मेरी साँस भी सुनाई दे रही है।
तुम सोच रहे होगे कि इतने सारे लोग, एक बूढ़ा बक्सा, और दो बूढ़े भाई — इसमें ऐसा क्या था जो सब रुक गए?
सुनो।
रुकने वाली बात ये थी कि दोनों भाई एक-दूसरे को देख रहे थे और दोनों की आँखों में एक ही सवाल था — तू अब भी मुझे चोर समझता है?
और वो सवाल किसी ने ज़ुबान से नहीं पूछा।
फिर इलाही बक्श ने अपना हाथ नीचे किया। उन्होंने अपनी जेब से रूमाल निकाला — फटा, धुला हुआ, किनारे से फीका पड़ा हुआ — और उसे हाथ में मरोड़ते हुए बोले, बहुत धीरे, ऐसे जैसे हर शब्द उनके अंदर से तोड़कर निकल रहा हो।
"मैंने तुझे कभी चोर नहीं कहा था।"
उस्ताद ने कुछ नहीं कहा।
"बारह रुपये," इलाही बोले, "बारह रुपये मैंने नहीं लिए थे। पर मैंने एक बात और नहीं कही थी — और वो बात ज़्यादा भारी थी।"
उन्होंने रूमाल को हाथ में दबाया।
"मैंने खुद को कायर कहा था, भाई। उस रात से रोज़ कहा। तेरे दरवाज़े तक आया, तीन बार आया। पहली बार तेरी दुकान का शटर गिरा था, दूसरी बार तेरे बुढ़ापे की आहट सुनी और लौट गया, तीसरी बार तेरे मुँह से अपने बारे में कुछ सुन लिया और — बस।"
उनकी आवाज़ लड़खड़ाई।
"तेरे मुँह से सुना था, भाई। उस दिन तेरे दरवाज़े पर खड़ा था, और तूने किसी से कहा था — मेरा कोई भाई नहीं है।"
मैंने उस्ताद की तरफ़ देखा।
उनका पूरा शरीर एक कदम पीछे हटा, बिना पैर हिले।
"मैंने कहा था?" उनकी आवाज़ फट गई, जैसे किसी पुराने कपड़े को ज़ोर से खींचा गया हो।
"कहा था," इलाही ने कहा। "और मैं उसी दिन लौट गया। पचास साल के लिए।"
उस्ताद ने अपना हाथ उठाया — नहीं, नहीं, वो हाथ नहीं उठाया। वो अपनी छाती पर रखा और बोले, इतनी धीमी आवाज़ में कि मुझे सुनने के लिए आगे झुकना पड़ा।
"उस रात मैंने तुझे गरीब नहीं कहा था।"
वो रुके।
"मैंने तुझे पराया कहा था।"
और जैसे ही ये शब्द हवा में गिरे, इलाही का हाथ ऊपर आया।
ये वो हाथ नहीं था जो जीप से बाहर आया था। ये थोड़ा और ऊपर था, थोड़ा और तेज़।
उस्ताद ने उसे पकड़ा।
और फिर दूसरा हाथ आया। फिर दूसरा। चार हाथ। दो बूढ़े आदमी, चबूतरी के सामने, एक-दूसरे का हाथ पकड़े, और कोई कुछ नहीं बोल रहा था।
रोने की आवाज़ नहीं आई।
बस कंधे हिल रहे थे। दोनों के। एक ही लय में, जैसे पचास साल बाद दोनों की साँस ने एक साथ चलना सीख लिया हो।
और मैं वहीं खड़ा था, और मुझे अपनी जेब में घंटी की गरमाहट महसूस हुई — धीमी, स्थिर, जैसे कोई बूढ़ी औरत चूल्हे पर रोटी बेलते-बेलते रुक जाए और सुन ले कि बेटा आ गया।
मैंने पीछे मुड़कर बच्चों को देखा।
सानिया ने गुड्डू का हाथ पकड़ रखा था। रफ़ीक़ ने अपना टूटा चश्मा उतारकर आँखों पर हाथ रख लिया था, जैसे चश्मे के बिना दुनिया ज़्यादा साफ़ दिखती हो। चिंटू रो रहा था — बिना आवाज़, बस होंठ काँप रहे थे और वो उन्हें दाँतों से दबाए हुए था।
और टिंकू?
टिंकू ने अपना सिर झुका लिया था, और मैंने उसे पहली बार ऐसे देखा — बिलकुल चुप, बिलकुल छोटा, जैसे वो भी उन दो हाथों में कुछ अपना ढूँढ रहा हो। उसका अपना पापा छह महीने पहले चला गया था, और उसने आज तक उस पर एक आँसू नहीं बहाया था — कम से कम मेरे सामने तो नहीं।
मैंने उसके कंधे पर हाथ रखा। उसने हाथ नहीं हटाया।
तभी शबनम आपा की चप्पलों की आवाज़ आई।
वो आईं, हाथ में पीतल की थाली, उस पर चार कुल्हड़ — भाप उठती हुई। उन्होंने थाली चबूतरी के किनारे उस जगह रखी जहाँ कोई नहीं बैठा था, और बिना एक शब्द बोले पलटकर चल दीं।
मैंने देखा — उन्होंने जाते वक़्त अपनी आँख का कोना अपनी साड़ी के पल्लू से छुआ।
शबनम आपा। जिनकी ज़ुबान से आज तक किसी ने नहीं जीता था। जो पंद्रह साल से अपनी बहन से नहीं बोली थीं।
वो चुपचाप आईं और चुपचाप गईं, और उनकी चुप्पी में सबसे ज़्यादा आवाज़ थी।
अब मैं तुम्हें वो बात बताता हूँ जो उस सुबह सबसे अजीब थी।
जब उस्ताद और इलाही ने एक-दूसरे का हाथ पकड़ा, तब मैंने देखा — चबूतरी के बीच में रखा बक्सा, हल्का हिला।
नहीं, हिला नहीं। काँपा।
और फिर उसके पहले ताले से एक आवाज़ आई — ठीक वैसी आवाज़ जैसी पुरानी कुंडी के भीतर कोई चाबी घूमती हो, धीरे-धीरे, जैसे खुद से घूम रही हो।
टिंकू ने सिर उठाया।
"उस्ताद —"
"देख रहा हूँ," मैंने कहा।
पहले ताले का छल्ला घूमा। फिर उसका कुंडा उठा — ज़ंग से भरी साँस छोड़ता हुआ, छी… जैसे उसने पचास साल की हवा एक साथ बाहर निकाली हो।
और ताला खुलकर बक्से के किनारे लटक गया।
मैंने उस्ताद की तरफ़ देखा। उन्होंने इलाही की तरफ़। इलाही ने उनकी तरफ़।
"मैंने इसे नहीं छुआ," फ़ैज़ ने कहा, पीछे से।
"कोई नहीं छू रहा, बेटा," मैंने कहा। "ये खुद खुला है। और अब दूसरा बाकी है।"
दूसरा ताला वहीं था — वही जुड़वाँ, वही आकार, पर ज़रा भी नहीं हिला।
मैंने उस्ताद से कहा, "उस्ताद, ये ताला सिर्फ़ हाथ पकड़ने से नहीं खुला। वो पहला था। ये दूसरा है।"
"तो क्या चाहिए?" उन्होंने पूछा।
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