The Mysterious Bell – Chapter 1287
तभी गली के मुँह से फिर आवाज़ आई।
भोला भाई की जीप की।
और इस बार उसकी आवाज़ में जल्दबाज़ी थी। कोई चिल्ला रहा था। जीप चबूतरी की तरफ़ आई, धूल उड़ाती हुई, और भोला भाई खुद उतरकर भागे — जो आमतौर पर भागते नहीं, चलते हैं।
"इलाही बक्श आ गए," उन्होंने कहा, साँस फूलती हुई। "पीछे बैठे हैं। पर —"
"पर क्या?"
भोला भाई ने हमारी तरफ़ देखा। और उनकी आवाज़ अचानक धीमी हो गई।
"पर उनके हाथ में ये पकड़ा हुआ है।"
और उन्होंने एक पीला लिफ़ाफ़ा आगे बढ़ा दिया।
वैसा ही पीला लिफ़ाफ़ा। वैसी ही मुहर। वैसी ही स्याही।
"यही तो… यही तो अभी आया," मैंने कहा।
"नहीं," भोला भाई ने कहा। "ये दूसरा है। इलाही बक्श ने खुद निकालकर मुझे दिया। कहा — ये उसके भाई के लिए है। और कहा — पहले वाला जो लिफ़ाफ़ा आया होगा, वो जाल था।"
मैंने उस्ताद की तरफ़ देखा।
"दो लिफ़ाफ़े," उस्ताद ने धीरे से कहा, जैसे कोई पुरानी गिनती कर रहे हों। "एक भेजने वाले ने भेजा, एक भाई ने भेजा।"
"कौन सच्चा है?" फ़ैज़ ने पूछा।
उस्ताद ने अपने हाथ में दोनों लिफ़ाफ़े पकड़े — एक जो चपरासी लाया था, एक जो भोला भाई लाए थे — और उन्हें पास-पास रखकर देखा।
"फ़र्क़ है," उन्होंने कहा। "इसमें पीली स्याही, उसमें नीली। इसमें धूप की गंध है, उसमें साबुन की। इसमें मुहर थोड़ी टेढ़ी, उसमें सीधी।"
"तो कौन सच्चा है?"
उस्ताद ने अपना हाथ ऊपर उठाया और शांत आवाज़ में कहा, "जिसमें इलाही का हाथ होगा।"
फिर वो जीप की तरफ़ मुड़े और उन्होंने गले से एक बार भरकर साँस ली — वैसे, जैसे पचास साल बाद पहली बार साँस ले रहे हों — और वो बोले, "भाई, मैं आ रहा हूँ।"
और फिर गली में सब कुछ रुक गया — पर ये चुप्पी पहले जैसी नहीं थी। ये वो चुप्पी थी जो किसी बड़े धमाके से पहले आती है।
मैंने पीली पर्ची को जेब में रखा — "भाई, अदालत में मत आना। यह जाल है" — और घंटी को हथेली में दबाया, जो अब फिर गरम हो रही थी, बर्फ़ जैसी ठंडी नहीं, बस गरम, जैसे किसी ने उसे हाथ में उठाकर धीरे से सहला दिया हो।
तभी चबूतरी पर रखा बक्सा — जो अब तक चुप था — एक बार हल्का-सा खड़का। जैसे किसी भी बात को सुनकर, किसी पुराने आदमी ने अपनी कुर्सी पर करवट बदली हो।
और मुझे यक़ीन हो गया कि आज इस चबूतरी पर सिर्फ़ दो लिफ़ाफ़े नहीं खुलने वाले।
आज कुछ और भी खुलेगा।
कुछ ऐसा, जो पचास साल से न सिर्फ़ बक्से में बंद है, बल्कि उन दो भाइयों के बीच भी — उस चुप्पी में, जिसे दोनों ने साथ-साथ ओढ़ रखा था, जैसे कोई सर्दी की रात एक ही कंबल में दो लोग सोएँ — पर एक-दूसरे की तरफ़ पलटकर न देखें।
मैंने फ़ैज़ की तरफ़ देखा, जो अपनी जेब से पुराना ताला निकाल रहा था। मैंने उस्ताद की तरफ़ देखा, जो अपनी स्टूल उठा रहे थे, जैसे वो इलाही के लिए रखी है। और मैंने पापा की तरफ़ देखा, जो एक कोने में खड़े, अपने होंठ हिला रहे थे — पता नहीं क्या, पर मुझे लगा कि वो अपने ही अंदर किसी से माफ़ी माँग रहे हैं। शायद अपने पिता से। शायद दादा जगदीश यादव से। या शायद अपने ही आप से, बाईस साल के उस लड़के से, जिसने एक स्याही की डिब्बी के सामने अपना अंगूठा दबा दिया था और फिर उम्र भर खुद को माफ़ नहीं कर पाया।
"चलो," मैंने कहा, और मेरी आवाज़ अपने कानों में भी थोड़ी भारी लगी। "भोला भाई, जीप रोक रखो। सब — सब यहीं रुको। पहले मैं और उस्ताद जाएँगे।"
"मैं भी आऊँगा," फ़ैज़ ने कहा।
"तू तो हर हाल में आएगा," मैंने कहा। "पर पहली बार नहीं। पहली बार उस्ताद जाएँगे। ये सफ़र उनका है। अगर मैं साथ गया, तो लोग कहेंगे कि मैंने उन्हें ले जाकर मिलवाया। मैं नहीं चाहता कि ये मेरी वजह से जुड़ा दिखे। ये उनका और उसका जोड़ है। मैं बाहर खड़ा रहूँगा।"
फ़ैज़ ने कुछ कहना चाहा, फिर रुक गया, फिर सिर हिला दिया।
उस्ताद ने मेरी तरफ़ देखा।
"अंकुश," उन्होंने कहा, "मैं पचास साल से इस रास्ते पर नहीं चला। अगर आज मेरे पैर काँपे, तो मुझे शर्म नहीं आएगी — पर उसे देखकर शर्म आएगी।"
"नहीं आएगी," मैंने कहा। "वो भी काँपेगा। और दोनों का काँपना मिलकर एक ही कंपन बनेगा। वो कंपन डर का नहीं होगा, उस्ताद। वो वो कंपन होगा जो पचास साल पुराने जुड़ाव में आज पहली बार आ रहा है। जाओ।"
उस्ताद ने एक बार फिर घंटी को छुआ — मेरी जेब में पड़ी घंटी को, अपनी हथेली से, हवा में ही — और फिर मुड़े और जीप की तरफ़ चल पड़े।
और मैंने देखा कि जैसे-जैसे वो जीप के करीब पहुँच रहे थे, उनकी कमर सीधी होती जा रही थी। एक-एक कदम में कुछ साल पीछे लौट रहे थे।
फ़ैज़ उनके पीछे-पीछे चला।
और चबूतरी पर, जब वो दोनों जीप की तरफ़ जा रहे थे, मीरा ने मेरे कान में धीरे से कहा, "अंकुश — वो पीली पर्ची, जो अभी आई। उस पर स्याही अभी ऊपर से सूखी हुई थी।"
"हाँ, तो?"
"तो ये जाल वाले लिफ़ाफ़े से निकली है, और उसमें इलाही की स्याही नहीं है। किसी और ने इलाही की लिखाई की नकल की है। और वो कोई ऐसा है जो इलाही के हाथ को इतना जानता है कि पचास साल पुरानी लिखाई तक नकल कर सके।"
"मतलब?"
"मतलब — जाल भेजने वाला कोई बाहर का नहीं है, अंकुश। वो इलाही का अपना आदमी है।"
और मेरी जेब में घंटी — बिना बजे, बिना हिले — दो शब्द कह गई।
"आठवाँ नाम।"
मैं रुक गया।
"क्या?"
पर घंटी चुप हो चुकी थी।
और सामने, भोला भाई की जीप के दरवाज़े पर, एक बूढ़ा हाथ बाहर की तरफ़ आ रहा था — काँपता हुआ, पतला, नसों से भरा, और उसकी उँगली में पीतल की एक पतली अँगूठी थी, जिस पर कोई फूल खुदा था।
उस्ताद ने वो हाथ देखा।
और उनका पूरा शरीर एक पल के लिए सख़्त हो गया, जैसे किसी ने उनके अंदर की सारी हड्डियाँ एक साथ पकड़ ली हों।
"वो अँगूठी," उन्होंने धीरे से कहा, "माँ की अँगूठी है।"
फिर उन्होंने एक कदम और बढ़ाया, और अपना हाथ उस हाथ की तरफ़ बढ़ा दिया — वैसे ही जैसे पचास साल पहले, इसी चबूतरी पर, किसी दोपहर में उन्होंने अपने छोटे भाई की तरफ़ हाथ बढ़ाया था, ये जाने बिना कि ये हाथ अब पचास साल बाद फिर उसी जगह लौट रहा है — बस इस बार, थोड़ा और झुका हुआ, थोड़ा और थका हुआ, पर पूरा, और बिलकुल अकेला नहीं।
उसी पल मैंने अपनी जेब से पीली पर्ची निकाली और उसे एक बार फिर पढ़ा।
"भाई, अदालत में मत आना। यह जाल है।"
और अब, इलाही का हाथ अपनी आँखों के सामने देखकर, मुझे समझ आने लगा कि ये पर्ची अदालत से डराने के लिए नहीं लिखी गई थी।
ये पर्ची किसी और चीज़ से डराने के लिए लिखी गई थी।
किसी ऐसी चीज़ से, जो अदालत के काग़ज़ के भीतर बैठी है और जो आज तक सिर्फ़ एक ही नाम से जानी जाती है — तीसरा भाई।
मैंने पर्ची को मोड़कर जेब में रखा और अपनी जगह से आगे बढ़ा — धीरे, पर पूरे यक़ीन के साथ।
क्योंकि अब सिर्फ़ उस्ताद और इलाही का मामला नहीं था।
अब बात उस आदमी की थी, जिसने इलाही की लिखाई में धमकी भेजी थी — और मुझे लगा, वो आदमी आज इसी गली में कहीं है, किसी खिड़की के पीछे, किसी दरवाज़े की दरार से, हम सबको देख रहा है, और ये भी देख रहा है कि उसकी चेतावनी का हम क्या करते हैं।
पर वो एक बात भूल गया था।
वो ये भूल गया था कि जब दो भाई पचास साल बाद एक-दूसरे का हाथ पकड़ते हैं, तो उस वक़्त कोई जाल काम नहीं करता।
क्योंकि उस पकड़ में जो गरमाहट होती है, वो हर स्याही से पुरानी होती है।
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