The Mysterious Bell – Chapter 1286
"अदालत का नोटिस है," उसने धीरे से कहा, जैसे खुद से बहस कर रहा हो। "अदालत का नोटिस है, पर मुहर भारद्वाज की। ये कैसे हो सकता है?"
मीरा ने कैमरा बंद किया और अपना बैग खोला।
"हो सकता है," उसने कहा। "अगर अदालत से पहले ये काग़ज़ भारद्वाज के दफ़्तार में बनाया गया हो। और अगर इसमें हमें सच मिले, तो ये नोटिस हमारा हथियार है, उनका नहीं।"
"पर ये तो नोटिस है," पापा ने कहा, पहली बार बोलते हुए। "नोटिस का मतलब है कि मामला अदालत तक जा चुका है। और अदालत में जाने का मतलब है — सारी गली को बुलाया जाएगा, गवाही माँगी जाएगी, काग़ज़ माँगे जाएँगे। और जिसके पास काग़ज़ नहीं, वो हार जाएगा।"
"नहीं," मीरा ने कहा। उसकी आवाज़ में वो कड़कपन आ गया था, जो तब आता था जब वो किसी बात पर पूरी तरह यक़ीन करती थी। "अगर अदालत तक सिर्फ़ यह काग़ज़ गया, तो सिर्फ़ सच बचा सकता है। और सच हमारे पास है — टुकड़ों में, अधूरा, बिखरा, पर हमारे पास है।"
"कितना सच?" शबनम आपा ने पूछा। "मैंने गली में पंद्रह साल में इतने झूठ सुने हैं कि अब सच भी सुनकर मुझे शक होता है। बता, तेरे पास कितना सच है?"
मीरा ने अपनी कॉपी खोली।
"सात अंगूठों वाला पन्ना नगर निगम में। एक हिस्सा भवन की दीवार में। एक हिस्सा —" उसने मेरी तरफ़ देखा — "मंसूर चाचा के पास। एक हिस्सा गुमटी की ज़मीन के काग़ज़ में। और एक हिस्सा उस काग़ज़ में जिसे रणवीर आज अपनी जेब में ले गया। पाँच हिस्से। और जब पाँचों जुड़ेंगे, तब सच को मोड़ना मुश्किल होगा।"
"और अदालत तक जो पहुँचेगा, वो कौन पहुँचाएगा?" उस्ताद ने पूछा।
"हम," मीरा ने कहा। "अगर हम खुद पहुँचाएँगे, तो पहले पहुँचेंगे। नहीं तो वो पहले पहुँचाएगा और सच को वहीं दबा देगा।"
चबूतरी पर एक पल के लिए चुप्पी छा गई।
मैंने उस चुप्पी में सबको देखा। सानिया के हाथ में अभी भी वो लाल कवर कॉपी थी जिसमें वो ट्रकों की तारीख़ें लिखती थी। गुड्डू के होंठ हिल रहे थे, जैसे वो अंदर ही अंदर कुछ गिन रहा हो। चिंटू की आँखें मेरे ऊपर टिकी थीं, मानो पूछ रही हों — अब आगे क्या, उस्ताद? टिंकू ने अपना थैला सीने से लगा लिया था।
और रफ़ीक़ — रफ़ीक़ ने अचानक कहा, "उस्ताद जी, मेरे अब्बा कहते हैं कि अदालत में जो पहले रोता है, वो जीत जाता है।"
मैं हँस पड़ा — ये हँसी मेरी ज़रूरत की हँसी थी, सोच की नहीं।
"रफ़ीक़," मैंने कहा। "अब्बा की बात सही है। पर इस बार कोई रोने वाला नहीं है। इस बार सिर्फ़ काग़ज़ बोलेगा।"
तभी कुछ हुआ।
मैंने देखा कि उस्ताद अपनी स्टूल से उठकर खड़े हुए। बिना छड़ी के। बिना सहारे के। उन्होंने अपना हाथ आगे बढ़ाया — और फ़ैज़ की तरफ़।
फ़ैज़ ने पहले उनका हाथ नहीं पकड़ा।
दो पल हवा में उस्ताद का हाथ वैसे ही रहा।
फिर फ़ैज़ ने, बिना कुछ कहे, अपना हाथ आगे किया।
और दोनों हाथ जुड़ गए।
मैंने मीरा की ओर देखा। उसकी आँखें भरी हुई थीं, पर वो मुस्कुरा रही थी। पापा ने अपना चश्मा उतारा और उसे अपनी कमीज़ से पोंछने लगे — वो पोंछना नहीं था, छुपाना था।
शबनम आपा ने अपना चेहरा दूसरी तरफ़ घुमा लिया, और मैंने सुना कि उन्होंने अपने होंठ भींचकर कुछ कहा — पता नहीं क्या, पर मुझे लगा कि वो अपनी बहन रज़िया से जुड़ी कोई बात कह रही थीं, अपने ही अंदर।
तो मैंने घंटी निकाली।
"उस्ताद," मैंने कहा। "अब?"
उन्होंने फ़ैज़ का हाथ नहीं छोड़ा। मेरी तरफ़ देखा और सिर हिलाया।
मैंने घंटी बजाई।
पहली बार — पूरी तरह, बिना रुकावट के, बिना झिझक के। जो आवाज़ निकली, वो एक नहीं थी। दो थीं। जैसे एक ही जगह से दोनों घंटियाँ एक साथ बजी हों — एक मोटी, एक पतली, एक पुरानी, एक नई — पर दोनों एक ही सुर में।
और फिर आवाज़ आई।
"अब मरम्मत शुरू हो सकती है।"
चबूतरी पर सबने सिर उठाया।
"पहला जोड़ — हाथ जुड़ा। दूसरा जोड़ — शक जुड़ा। तीसरा जोड़ — अब वो चीज़ जुड़ेगी जिसे तूने अपने हाथ से छुआ नहीं, पर जो तेरे ही घर में बंद है।"
"कौन सी चीज़?" मैंने पूछा।
"वो चीज़ जिसे बक्से ने अभी पुकारा है," घंटी ने कहा। और फिर दोनों आवाज़ें अलग हो गईं — एक ने पूरा वाक्य कहा, दूसरी ने सिर्फ़ दो शब्द। "सात पन्ने। तीन हाथ।"
"क्या मतलब?"
पर घंटी चुप हो गई।
मैंने देखा कि उस्ताद के हाथ से वो नोटिस अभी भी झूल रहा था — वो उसे पूरी तरह छोड़ नहीं पाए थे। तभी नोटिस के नीचे से, उसकी तह में से, कुछ फिसलकर नीचे आ गया और सीधे मेरे पैर के पास गिरा।
एक पीली पर्ची।
छोटी। मुड़ी हुई। उस पर से उँगली फेरने पर लगा कि ज़्यादा पुरानी नहीं — महीने-दो महीने की होगी, बस मुड़ी हुई और दबी हुई थी।
मैंने उसे उठाया और खोला।
दो लाइनें थीं। नीली स्याही में, टेढ़ी-मेढ़ी पुरानी लिखाई में — वैसी ही लिखाई, जैसी उस्ताद की मशीन की दराज़ से निकले उस पीले काग़ज़ पर थी। पर यहाँ लिखाई और भी झुकी हुई थी, और भी बूढ़ी।
मैंने पढ़ा।
"भाई, अदालत में मत आना। यह जाल है।"
मैंने पढ़कर उस्ताद को दिया। उन्होंने पढ़ा। उनका चेहरा पहले सफ़ेद हुआ, फिर लाल, फिर पीला, मानो तीन अलग-अलग लोग लगातार उनके चेहरे पर उतरते-चढ़ते हों।
फ़ैज़ ने झपटकर काग़ज़ लिया।
"ये — ये दादा की लिखाई है," उसने कहा। आवाज़ फटी हुई, हकलाती हुई। "ये दादा की लिखाई है। मैं पहचानता हूँ। दादा जब सिफ़ारिश का काग़ज़ लिखते थे, तो भैया की लिखाई की नकल करते थे — क्योंकि भैया की लिखाई से काम हो जाता था। कोई मना नहीं करता था। पर उनका हाथ भैया जैसा कभी नहीं हुआ। ये वो ही हाथ है। ये दादा का है।"
उस्ताद ने फ़ैज़ के हाथ से पर्ची दोबारा ली।
"इलाही," उन्होंने धीरे से कहा, जैसे नाम भी अब पहली बार ले रहे हों। "इलाही, तूने ये कब लिखा?"
कोई उत्तर नहीं आया।
"ये लिखाई ताज़ी है," मीरा ने कहा, पर्ची को गौर से देखते हुए। "काग़ज़ पुराना है, पर स्याही नई है। स्याही अभी ऊपर से सूखी है, अंदर से गीली। दो-तीन दिन पुरानी से ज़्यादा नहीं।"
"मतलब इलाही बक्श ने ये दो-तीन दिन में लिखा है," पापा ने कहा।
"या कोई और," उस्ताद ने कहा। उनकी आवाज़ में कुछ बदल गया था — जो पहले डरी हुई थी, अब सख़्त थी। "कोई और, जो इलाही की लिखाई की नकल कर सकता है।"
चबूतरी पर चुप्पी छा गई।
फिर सानिया ने कहा — धीरे, पर साफ़, "उस्ताद जी — ये नोटिस किसने भेजा?"
"भारद्वाज का दफ़्तार," मीरा ने कहा।
"और ये पर्ची?"
"वही भेजने वाला," उस्ताद ने कहा। "भेजने वाला एक ही है। नोटिस में धमकी, और नोटिस के अंदर छिपी पर्ची में चेतावनी। दोनों एक ही आदमी के हाथ के हैं — पर दोनों अलग आवाज़ों में।"
मैंने घंटी फिर उठाई। इस बार वो बजी नहीं। मैंने उसे हिलाया, पर वो चुप रही।
"घंटी," मैंने कहा। "ये जाल क्या है?"
कोई आवाज़ नहीं।
"घंटी — क्या मैं अदालत जाऊँ या नहीं?"
चुप्पी।
"घंटी — अगर वो चेतावनी सच है, तो फ़ैज़ को क्या करना चाहिए?"
और तब, कुछ देर बाद, घंटी बोली। आवाज़ धीमी, पर थी।
"जो ताले में है, वही बताएगा।"
मैंने उस्ताद की तरफ़ देखा।
"बक्सा," उस्ताद ने कहा। "बक्सा जवाब देगा।"
"पर बक्सा तो अभी खुला नहीं।"
"तो अब खुलेगा," उस्ताद ने कहा। "दो चाबियाँ आ चुकी हैं। दोनों भाई खड़े हैं। और अब वो चीज़ भी आ गई है जो पचास साल से उस बक्से में बंद है। बस एक चीज़ की कमी है —"
"क्या?"
"इलाही का हाथ," उस्ताद ने कहा। "जो उसने ख़ुद यहाँ आकर रखना है। हमारे हाथ से नहीं।"
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